अंधेरा होते ही बिजली का गहराता संकट, पावर ग्रिड के लिए क्यों सिरदर्द बनी रातों की तपिश?
News In Short
- देश में पड़ रही भीषण गर्मी ने ऊर्जा प्रबंधकों की नींद उड़ाई।
- ऊर्जा प्रबंधक अभी तक दिन की डिमांड पूरा करने को लेकर चिंतित थे।
- अब गर्म होती रातों ने छीनी ऊर्जा प्रबंधकों की नींद, नाइट टाइम पावर गैप बढ़ा।
- तापमान की स्थिति यह कि 27 अप्रैल को सोलापुर का न्यूनतम तापमान 41.9°C था।
- संकट के पीछे मुख्य कारण सोलर पावर और डिमांड के बीच का असंतुलन।
News In Detail
Jaipur: जैसे-जैसे देश भीषण गर्मी की चपेट में आ रहा है, देश के ऊर्जा प्रबंधक एक नई और खतरनाक चुनौती का सामना कर रहे हैं। समस्या अब सिर्फ दिन की चिलचिलाती धूप और पीक डिमांड की नहीं रही, बल्कि असली संकट सूरज ढलने के बाद शुरू हो रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत में नाइट-टाइम पावर गैप (रात के समय बिजली की कमी) इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि इसने ग्रिड की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूरज ढला और संकट बढ़ा
अप्रैल के महीने में जब तापमान ने रिकॉर्ड तोड़ना शुरू किया तो ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया (Grid India) के डेटा ने चौंकाने वाले तथ्य पेश किए। अप्रैल के मध्य में 15 दिन के दौरान 10 दिन ऐसे थे, जब दिन में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर थी।
लेकिन चिंताजनक बात यह है कि इन्हीं 15 दिन में से 13 दिन रात के समय बिजली की भारी किल्लत दर्ज की गई। रात के समय यह कमी 5.4 गीगावाट (GW) तक जा पहुंची। यह इतनी बिजली है जिससे लगभग 27 लाख ग्रामीण घरों को रोशन किया जा सकता है।
ग्रिड मैनेजरों की नींद क्यों उड़ी है?
इस संकट के पीछे मुख्य कारण सोलर पावर और डिमांड के बीच का असंतुलन है। भारत ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है।
दिन के समय जब एसी (AC) का लोड चरम पर होता है, तब सोलर पावर उसे काफी हद तक संभाल लेती है। लेकिन जैसे ही शाम होती है और सोलर उत्पादन शून्य हो जाता है, ग्रिड पर अचानक दबाव बढ़ जाता है।
सूरज ढलने के बाद लोग घरों को लौटते हैं, जिससे इलेक्ट्रिक कुकिंग, ईवी (EV) चार्जिंग और रात भर चलने वाले एयर कंडीशनर्स का लोड ग्रिड पर एक साथ आता है। रिपोर्ट के अनुसार 24 अप्रैल को जब रात की कमी 5.4 GW पर थी, उसी समय कोयला और परमाणु आधारित लगभग 23.8 GW क्षमता के प्लांट फोर्स्ड आउटेज (तकनीकी खराबी या ईंधन की कमी) के कारण बंद थे।
तपते शहर और पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी
तापमान के आंकड़े डरावनी हकीकत बयां करे हैं। दुनिया के 50 सबसे गर्म शहरों की सूची में सभी शहर भारत के थे। 27 अप्रैल को सोलापुर का न्यूनतम तापमान 41.9°C था। यूरोप के मानकों के हिसाब से इसे पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दिया जाता।
इतनी गर्मी का मतलब है कि बिजली की मांग 24 घंटे बनी रहती है। अप्रैल में बिजली की मांग 256 GW के ऐतिहासिक स्तर को छू गई। राजस्थान में भी अप्रैल और मई के पहले सप्ताह में रातें बहुत अधिक गर्म रही हैं।
समाधान की राह में क्या है रोड़ा?
पावर विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रिड को स्थिर करने के लिए देश को बेसलोड कैपेसिटी (कोयला या परमाणु ऊर्जा) और एनर्जी स्टोरेज (बैटरी) की जरूरत है। लेकिन यहां एक बड़ा अंतर (Gap) दिखाई दे रहा है। अप्रैल 2023 से जनवरी 2026 के बीच जहां 43 GW रिन्यूएबल ऊर्जा जुड़ी, वहीं बेसलोड क्षमता में केवल 16.5 GW का इजाफा हुआ।
भारत की वर्तमान स्थापित बैटरी स्टोरेज क्षमता मात्र 0.27 GW है, जो रात की मांग को पूरा करने के लिए 'ऊंट के मुंह में जीरा' समान है।
आगे की चुनौती
राजस्थान कैडर के सीनियर IAS अजिताभ शर्मा ने सोशल मीडिया पर केंद्रीय बिजली नियामक आयोग के एक ताजा पेपर के हवाले से महत्वपूर्ण बात लिखीं। उन्होंने कहा कि अब चुनौती केवल अधिक मेगावाट क्षमता जोड़ने की नहीं रह गई है। अब सही समय पर उपलब्धता, लचीलेपन और भंडार को सुनिश्चित करने के बारे में है।
मई का महीना अभी बाकी है, जिसे प्री-मानसून गर्मी का चरम माना जाता है। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और हिमालयी राज्यों में तापमान और बढ़ने के आसार हैं। टेरी (TERI) के विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक हमारे पास पर्याप्त मात्रा में बिजली भंडारण (Storage) की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक रात के समय ग्रिड को संतुलित करना एक 'असंभव मिशन' जैसा बना रहेगा।
हमें केवल सूरज से बिजली बनाना ही नहीं, बल्कि उसे रात के लिए बचाना भी सीखना होगा।
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