क्या हैं वो जल समझौते, जिसके आधार पर पंजाब मांग रहा 1.44 लाख करोड़ की वाटर रॉयल्टी

Jinesh Jain | Mar 21, 2026, 14:01 IST
Photograph: (the sootr)
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पानी के बदले राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की वाटर रॉयल्टी मांगी है। हालांकि, राजस्थान ने इस मांग को ठुकरा दिया है। दरअसल, यह विवाद 1920 के समझौते, 1960 सिंधु जल संधि और 1981 के समझौते से जुड़ा है।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पानी के बदले राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की वाटर रॉयल्टी मांगी है। उनका कहना है कि 1920 के पुराने जल समझौते के तहत राजस्थान को इस पानी का भुगतान करना है। इस बयान ने फिर से नदी जल से जुड़े ऐतिहासिक समझौतों और राज्य-स्तरीय जल आवंटन को लेकर चल रहे लंबे विवाद को ताजा कर दिया है।



1920 का वो शाही समझौता

इस विवाद की जड़ें लगभग 100 साल पुरानी हैं। 1920 के दशक में बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह, तत्कालीन अविभाजित पंजाब और ब्रिटिश शासन के बीच एक कमर्शियल एग्रीमेंट हुआ था। इसी समझौते के तहत फिरोजपुर से गंग नहर निकाली गई थी। बीकानेर रियासत उस समय पानी के बदले रॉयल्टी या उपयोग शुल्क देती थी। यह सिलसिला 1960 में आई सिंधु जल संधि से पहले तक तक चला।



1960 की सिंधु जल संधि और शुल्क समाप्ति

1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई संधि के बाद भारत को पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) पर पूरा अधिकार मिल गया। इस समझौते के बाद भारत सरकार ने पानी के वितरण को रॉयल्टी मॉडल से हटाकर राज्य-स्तरीय आवंटन में बदल दिया। इसके बाद राजस्थान ने भुगतान करना बंद कर दिया, क्योंकि अब यह दो राज्यों के बीच का व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जल नीति का हिस्सा बन चुका था।



इंदिरा गांधी और 1981 का त्रिपक्षीय समझौता

1981 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की मौजूदगी में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच समझौता हुआ। इस समझौते के तहत राजस्थान को सबसे ज्यादा 8.6 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) पानी आवंटित किया गया, ताकि इंदिरा गांधी नहर के जरिए थार मरुस्थल को हरा-भरा किया जा सके। पंजाब इसे गैर-रिपेरियन (वह राज्य जहां से नदी नहीं बहती) राज्य को दिया गया अन्यायपूर्ण हक मानता है। 1987 में इराडी ट्रिब्यूनल की सिफारिश में राजस्थान के 8.6 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) पानी आवंटन को सही ठहराया था।



पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट्स एक्ट 2004 और सर्वोच्च न्यायलय

वर्ष 2004 में पंजाब राज्य ने पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट्स एक्ट लागू किया। इसका उद्देश्य राज्य के जल-बंटवारे से संबंधित पुराने समझौतों को समाप्त करना था। इस कानून का प्रमुख उद्देश्य था कि पंजाब को सही हिस्सेदारी मिले और विशेष रूप से सतलुज-यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) के मामले में अपने अधिकारों की रक्षा की जाए, जो लंबे समय से पंजाब और हरियाणा के बीच जल-बंटवारे को लेकर विवाद का कारण बना हुआ था।



हालांकि, इस कानून में यह भी कहा गया कि मौजूदा उपयोग को सुरक्षित रखा जाएगा, जिसका मतलब था कि पहले से स्थापित नहर प्रणालियों, खासकर राजस्थान को जल आपूर्ति की व्यवस्था को प्रभावित नहीं किया जाएगा।



इस अधिनियम को लागू करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में यह फैसला दिया कि कोई भी राज्य एकतरफा तरीके से अंतर-राज्यीय समझौतों को समाप्त नहीं कर सकता, जिससे पहले की कानूनी स्थिति बहाल हो गई।



पंजाब का क्या है तर्क

पंजाब का तर्क है कि अत्यधिक खेती और पानी के बंटवारे के कारण उसका भूमिगत जल स्तर खतरनाक रूप से गिर गया है। 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार पंजाब में जल निकासी दर 156.36 प्रतिशत है, जो देश में सबसे अधिक है। इसी संकट को ढाल बनाकर पंजाब अब राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये की मांग कर रहा है।



क्या कहता है कानून?

कानूनी विशेषज्ञों और पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि यह मामला इतना सीधा नहीं है, जितना प्रतीत होता है। 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि कोई भी राज्य एकतरफा तरीके से अंतर-राज्यीय समझौतों को खत्म नहीं कर सकता। अतः राज्य अकेले इस मुद्दे पर निर्णय नहीं ले सकते हैं



संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित है। यह संसद को अधिकार देता है कि वह अंतर-राज्यीय नदियों के जल वितरण से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए कानून बना सके। इसके अलावा केंद्र सरकार एक नदी जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना कर सकती है, जो उस विशेष नदी जल विवाद को सुलझाने के लिए कार्य करेगा। इस न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम और अनिवार्य होगा।



राजस्थान के लिए चुनौती

पंजाब का यह दांव राजस्थान के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि पश्चिम राजस्थान की प्यास और खेती पूरी तरह इसी नहर प्रणाली पर टिकी है। 1.44 लाख करोड़ का यह आंकड़ा भविष्य में होने वाली वार्ताओं में पंजाब की स्थिति मजबूत करने की एक रणनीति भी हो सकती है।



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