पुरानी पटरी पर अतिक्रमण, नई पटरी पर मुआवजा का मामला, पचपदरा रिफाइनरी तक रेल लाइन पर फंसा पेच
News In Short
- पचपदरा रिफाइनरी को जोड़ने के लिए रेलवे की योजना में उलझन।
- रिफाइनरी के लिए रेलवे को दो विकल्पों का करना पड़ रहा है सामना।
- पुरानी पटरी पर अतिक्रमण, नई पटरी के लिए मुआवजा की चुनौती।
- स्थानीय विधायक अरुण चौधरी ने ने पेश किया तिलवाड़ा फॉर्मूला।
- रेलवे को जल्द फैसले की जरूरत, प्रधानमंत्री के दौरे से जुड़ा महत्व।
News In Detail
राजस्थान के पचपदरा में बन रही रिफाइनरी अब एक नई समस्या से जूझ रही है। रिफाइनरी तक रेल लाइन पहुंचाने का मामला एक दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। एक तरफ रेलवे पुराने ब्रिटिशकालीन रेल मार्ग को दोबारा जीवित करने की तैयारी में है, तो वहीं स्थानीय विधायक नई पटरी बिछाने की मांग को लेकर दिल्ली में रेल मंत्री के दरवाजे खटखटा चुके हैं। यह सिर्फ रेल लाइन का मसला नहीं है, बल्कि अतिक्रमण, मुआवजा और सियासत का ऐसा संगम बन गया है जिसमें रेलवे भी उलझा हुआ है।
अंग्रेजों के जमाने की पटरी, बाढ़ ने काट दिया था कनेक्शन
यह कहानी करीब 35 साल पुरानी है। अंग्रेजों के समय में जब पचपदरा नमक उद्योग का केंद्र हुआ करता था, तब यहां रेलवे स्टेशन तक था। बालोतरा से पचपदरा जोड़ने वाली यह रेल लाइन शहर के बीचों-बीच से गुजरती थी। आजादी के बाद भी यहां एक चार कोच की गाड़ी दौड़ती थी, जिसे पव्वा कहते हैं। लेकिन वर्ष 1989-90 की भीषण बाढ़ ने यहां सब कुछ बदल दिया। पानी में डूबी पटरियों को देख रेलवे ने ट्रेन को उलटा वापस बालोतरा खींच लिया और फिर कभी उस तरफ मुड़कर नहीं देखा।
रेलवे ने पटरियां तो उखाड़ दीं, लेकिन अपनी जमीन की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया। देखते ही देखते इस जमीन पर अतिक्रमण शुरू हो गया। लोगों ने मकान बना लिए, दुकानें खड़ी कर लीं। यह मान लिया गया था कि अब पचपदरा कभी रेल से नहीं जुड़ेगा।
रिफाइनरी ने जगाई नई उम्मीद, पुरानी जमीन बना संकट
अब जब पचपदरा में विशाल रिफाइनरी बन रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके उद्घाटन के लिए कभी भी आ सकते हैं, तो रेलवे फिर से सक्रिय हो गया। रिफाइनरी तक परिवहन सुविधा के लिए रेल लाइन की दरकार है। रेलवे ने अपनी उसी पुरानी जमीन को अवाप्त (अधिग्रहित) करके पुराने मार्ग से ही पचपदरा को जोड़ने का प्रस्ताव बनाया।
लेकिन यहीं पर 'पेच' उलझ गया। अब उस जमीन पर सैकड़ों अतिक्रमणकारी कब्जा जमाए बैठे हैं। उन्हें हटाना रेलवे के लिए सिरदर्द बन गया है। साथ ही, यह रेल लाइन शहर को दो हिस्सों में बांट देगी, जिसका स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं।
स्थानीय विधायक अरुण चौधरी ने रचा नया 'तिलवाड़ा' फॉर्मूला
इस मुश्किल घड़ी में स्थानीय विधायक अरुण चौधरी ने एक नया 'तिलवाड़ा' फॉर्मूला पेश किया है। वे बीते दिनों दिल्ली पहुंचे और रेलमंत्री अश्वनी वैष्णव से मिलकर एक अलग विकल्प रखा। उनकी मांग है कि रिफाइनरी को जोड़ने के लिए तिलवाड़ा गांव से नई रेल पटरी बिछाई जाए। इससे तीन फायदे होंगे। पहला अतिक्रमणकारियों से जूझना नहीं पड़ेगा। दूसरा शहर दो हिस्सों में नहीं बंटेगा और तीसरा नई पटरी सीधे रिफाइनरी तक पहुंच जाएगी।
नई पटरी के लिए मुआवजे का झंझट
लेकिन जहां पुरानी पटरी पर अतिक्रमण की मशक्कत है, वहीं नई पटरी का रास्ता भी आसान नहीं है। तिलवाड़ा से नई रेल लाइन बिछाने के लिए नई जमीन अवाप्त करनी होगी, जिसके लिए रेलवे को भारी मुआवजा अदा करना पड़ेगा। यानी रेलवे के सामने दो विकल्प हैं। पहला पुराना रास्ता है, जहां जमीन तो रेलवे की अपनी है, लेकिन अतिक्रमणियों का किला है। दूसरा नया रास्ता है यहां अतिक्रमण से तो निजात मिलेगी, लेकिन नई जमीन के लिए खजाना खाली करना पड़ेगा।
क्या है रेलवे का मूड?
रेलवे के लिए पचपदरा रिफाइनरी का प्रोजेक्ट बेहद अहम है। यहां सिर्फ रिफाइनरी ही नहीं, बल्कि आगे चलकर पेट्रोकेमिकल हब भी विकसित होना है। प्रधानमंत्री के संभावित दौरे को देखते हुए रेलवे जल्द से जल्द इस परियोजना को हरी झंडी दिखाने के मूड में है। अब देखना यह है कि रेलवे अतिक्रमणियों से जूझने का रास्ता चुनता है या मुआवजा देकर नई पटरी बिछाने का। ये तो अभी भविष्य के गर्भ में है।
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