जंगलों से महकेगी होली, पलाश के फूलों से तैयार किया 5 क्विंटल हर्बल गुलाल

Ashish Bhardwaj | Feb 26, 2026, 12:11 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान का अलवर शहर इस बार अपनी होली को नई पहचान देगा। यहां वन विभाग करीब 5 क्विंटल ऑर्गेनिक हर्बल गुलाल तैयार करवा रहा है। यह गुलाल जंगल के पलाश के फूलों से बन रहा है।

News In Short

  • राजस्थान के अलवर शहर में होली को खुशनुमा बनाने के लिए हो रही नई पहल।
  • वन विभाग तैयार करवा रहा करीब 5 क्विंटल ऑर्गेनिक हर्बल गुलाल।
  • यह गुलाल अलवर के जंगलों से एकत्रित किए पलाश के फूलों से हो रहा तैयार।
  • हर्बल गुलाल बनाने के काम को 11 महिलाओं की हर्बल गुलाल समिति दे रही अंजाम।
  • गुलाल पूरी तरह केमिकल रहित, त्वचा या आंखों पर नहीं होगा कोई दुष्प्रभाव।

News In Detail

सुनील जैन@अलवर



राजस्थान में रंगों के त्योहार होली की आहट शुरू हो गई है। प्रदेश के अलवर शहर में इस बार होली न केवल खास होगी, बल्कि सेहत और पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद सुरक्षित होगी। दरअसल, वन विभाग इस होली पर अलवर में करीब 5 क्विंटल ऑर्गेनिक हर्बल गुलाल तैयार करवा रहा है, जो यहां के चूहड़ सिद्ध और अमृतवास के घने जंगलों के पलाश के फूलों से तैयार की गई है।



​पलाश के फूलों से 'टेसू' का जादू

कभी राजस्थान के उदयपुर में बनने वाली हर्बल गुलाल की चर्चा हुआ करती थी, लेकिन 2022 में तत्कालीन वन अधिकारी अपूर्व श्रीवास्तव की एक सोच ने अलवर की किस्मत बदल दी। चूहड़ सिद्ध के जंगलों में पलाश (टेसू) के पेड़ों पर लदे केसरिया फूलों को देखकर उन्हें हर्बल गुलाल बनाने का विचार आया।



शुरुआत में वन कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण के लिए उदयपुर भेजा गया। वहां से बारीकियां सीखकर लौटे कर्मियों ने साल 2022 में महज 1 क्विंटल गुलाल से इस सफर का आगाज किया। आज तीन साल बाद वर्तमान वन अधिकारी राजेंद्र कुमार हुड्डा के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से यह मात्रा बढ़कर 5 क्विंटल तक पहुंच गई है।



11 महिलाओं की 'हर्बल गुलाल समिति'

​इस पूरी मुहिम की सबसे खूबसूरत कड़ी है हर्बल गुलाल समिति। अलवर के शाहपुर डेहरा की 11 महिलाओं ने मिलकर इस समिति का गठन किया है। यह गुलाल किसी बड़ी फैक्ट्री या मशीनों में नहीं, बल्कि इन महिलाओं के हाथों की मेहनत और ममता से तैयार हो रही है। ​शाहपुर डेहरा के वनपाल मदनलाल ने बताया कि इस प्रक्रिया में शुद्धता का पूरा ध्यान रखा जाता है। यह महिलाएं चूहड़ सिद्ध और अमृतवास के जंगलों से पलाश के फूल और नीम की पत्तियां इकट्ठा करती हैं।



​कैसे बनती है यह जादुई गुलाल

​फूलों का चयन: मार्च-अप्रैल के दौरान खिलने वाले पलाश के फूलों को सुखाया जाता है।



​उबालने की प्रक्रिया: सूखे फूलों को पानी में अच्छी तरह उबाला जाता है, जिससे उनका प्राकृतिक रंग निकल आए।



​मिश्रण: तैयार रंगीन पानी में 'अरारोट' मिलाया जाता है।



​प्राकृतिक शेड्स: गुलाबी और केसरिया रंग के लिए पलाश के फूलों का उपयोग होता है, जबकि हरे रंग के लिए नीम की पत्तियों का अर्क मिलाया जाता है।





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​बाजार में मांग और कीमत

​महंगाई के इस दौर में भी वन विभाग ने इसकी कीमत को आम जनता की पहुंच में रखा है। पहले 200 ग्राम का पैकेट 50 रुपये में मिलता था, लेकिन उदयपुर के मानकों और लागत को देखते हुए इस बार इसे 60 रुपये प्रति पैकेट तय किया गया है। यह गुलाल पूरी तरह केमिकल रहित है, इसलिए इसका त्वचा या आंखों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। ​अलवर वासियों के लिए यह हर्बल गुलाल 27 फरवरी से 1 मार्च तक शहर के प्रमुख केंद्रों पर उपलब्ध होगी।



​सेहत और पर्यावरण का 'सुरक्षा कवच'

​बाजार में मिलने वाली मिलावटी और रासायनिक गुलाल में अक्सर कांच का चूरा, लेड और खतरनाक डाई होती है। यह त्वचा को नुकसान पहुंचाती है। इसके विपरीत वन विभाग की यह पहल न केवल लोगों की त्वचा को सुरक्षित रख रही है, बल्कि स्थानीय महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रही है।



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