मानसून सत्र 20 अगस्त से, पंचायत-निकाय चुनाव की रहेगी छाया, हंगामेदार के आसार
समझें क्या है पूरा मामला
- राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र 20 अगस्त से।
- राज्यपाल की मंजूरी के बाद सत्र के लिए अधिसूचना जारी।
- मानसून सत्र पर पंचायत और निकाय चुनावों की छाया रहेगी।
- खेजड़ी संरक्षण विधेयक सदन में पेश किए जाने की संभावना।
राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र 20 अगस्त से शुरू होने जा रहा है। राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े की मंजूरी के बाद इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है।
यह सत्र लगभग एक सप्ताह चलने की संभावना है। पंचायत और निकाय चुनाव की सरगर्मी के बीच हो रहे इस सत्र के हंगामेदार रहने के आसार हैं।
संवैधानिक बाध्यता
संविधान के प्रावधानों के अनुसार दो विधानसभा सत्रों के मध्य 6 माह से अधिक का अंतराल नहीं हो सकता।
चूंकि पिछला विधानसभा सत्र 10 मार्च को समाप्त हुआ था, इसलिए 9 सितंबर से पहले नया सत्र बुलाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य था।
इसी बाध्यता को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने अगस्त के तीसरे सप्ताह से सत्र शुरू करने का फैसला किया है।
खेजड़ी संरक्षण और ट्री एक्ट बिल मुख्य एजेंडा
इस सत्र के दौरान राज्य सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण विधायी कार्य निपटाए जाने की उम्मीद है। इनमें सबसे प्रमुख खेजड़ी संरक्षण विधेयक (ट्री एक्ट बिल) है।
राज्य सरकार ने पिछले सत्र के दौरान खेजड़ी के संरक्षण हेतु एक विशेष कानून लाने की घोषणा की थी। संबंधित विभाग द्वारा इस विधेयक का ड्राफ्ट पूरी तरह तैयार कर लिया गया है।
इस बिल को इसी सत्र में सदन के पटल पर रखा जाएगा। इसका उद्देश्य प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना और खेजड़ी के वृक्षों की अंधाधुंध कटाई पर कड़ा अंकुश लगाना है।
पंचायत व निकाय चुनाव के बीच गर्माएगा राजनीतिक माहौल
यह सत्र पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों की सरगर्मी के बीच हो रहा है। इसलिए इस सत्र में विपक्ष सरकार को घेरने की पूरी रणनीति बना रहा है।
सदन के भीतर मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दे हावी रह सकते हैं:
पेपर लीक प्रकरण: प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक के मामलों को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर रहेगा।
युवा व छात्र कल्याण: युवाओं के रोजगार, छात्र संघ चुनावों और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर गरमा-गरम बहस होने की संभावना है।
कानून व्यवस्था व स्थानीय मुद्दे: प्रदेश की कानून व्यवस्था और आगामी निकाय चुनावों को लेकर पक्ष-विपक्ष आमने-सामने होंगे।
सरकार के सामने कम समय में अध्यादेशों को पारित कराने, नए विधेयकों को पटल पर रखने और जनहित के मुद्दों पर चर्चा कराने की दोहरी चुनौती रहेगी।
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