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Photograph: (the sootr)
News In Short
- विधायक कोठारी ने उठाए सुरक्षा व अन्य मुद्धे,भाजपा विधायक गोपाल शर्मा ने किया समर्थन
- पत्रकारों के हितों के लिए उच्च स्तरीय कमेटी गठन करने की मांग
- पत्रकार और सैनिक दोनों राष्ट्रसेवा को समर्पित
- संविधान में ही है व्यवस्था
News In Detail
राजस्थान विधानसभा में शुक्रवार को पत्रकारों के हित के कई मुद्दों को जोरशोर से उठाया गया। भीलवाड़ा से निर्दलीय विधायक अशोक कुमार कोठारी ने पर्ची के माध्यम से पत्रकारों की सुरक्षा,सम्मान और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। इस पर सिविल लाइंस विधायक गोपाल शर्मा ने भी इसका पुरजोर समर्थन किया।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ है
कोठारी ने कहा कि पत्रकार समाज में महत्वपूर्ण दायित्व निभाते हैं। वे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में जनहित के मुद्दों को सामने लाते हैं। इसलिए उनके लिए प्रोटेक्शन एक्ट, सम्मान निधि में बढोतरी,आरजीएचएस में ओपीडी सुविधा तथा आवासीय भूखंड या कॉलोनी योजना लागू की जानी चाहिए।
उच्च स्तरीय कमेटी हो गठित
सिविल लाइंस विधायक गोपाल शर्मा ने अशोक कोठारी के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण और जनहित से जुड़ा विषय है। उन्होंने पत्रकारों के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित करने और आवासीय व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की। शर्मा ने कहा कि अधिस्वीकृत और गैर-अधिस्वीकृत पत्रकारों के बीच बनी खाई को समाप्त किया जाना चाहिए। साथ ही, फर्जी अधिस्वीकृति की प्रवृत्ति पर भी रोक लगनी चाहिए।
पत्रकार और सैनिक दोनों राष्ट्रसेवा में समर्पित
विधायक गोपाल शर्मा ने कहा कि पत्रकार और सैनिक दोनों ही राष्ट्र सेवा में समर्पित हैं। सैनिक जहां सीमा पर देश की रक्षा करता है, वहीं पत्रकार समाज के बीच रहकर सत्य और जनहित की रक्षा करता है। इसलिए चिकित्सा सुविधाओं या अन्य कल्याणकारी योजनाओं में दोनों के बीच भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकार मजबूत होंगे, मीडिया संस्थान मजबूत होंगे और मीडिया संस्थान मजबूत होंगे तो भारत भी मजबूत होगा।
योग्य पत्रकारों को मिले अधिकार
विधायक शर्मा ने समर्पित पत्रकार मुक्ति नाथ का उदाहरण देते हुए कहा कि कई योग्य पत्रकार वर्षों से सक्रिय होने के बावजूद अधिस्वीकृति से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि पूर्व में ऐसी गौरवशाली परंपरा रही है जब लगभग 18 पत्रकारों ने भूमि के लिए आवेदन नहीं किया था,फिर भी तत्कालीन सरकार ने उनकी पात्रता को मानते हुए उन्हें लाभ प्रदान किया था। ऐसी संवेदनशीलता फिर से दिखाई जानी चाहिए।
संविधान में ही है व्यवस्था
शर्मा ने कहा कि संविधान ने 1950 में ही मीडिया संस्थानों और पत्रकारों के हितों की रक्षा की भावना व्यक्त की है। जब संविधान संस्थानों को पत्रकारों के हितों का ध्यान रखने का निर्देश देता है तो यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह स्पष्ट नीति और ठोस व्यवस्था के माध्यम से इसका समाधान सुनिश्चित करे।
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