अवैध पटाखों के सील कारखाने में क्यों लग रही बार-बार आग, जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी
News In Short
- भिवाड़ी में अवैध पटाखों के सील कारखाने में 15 दिन में लगी दो बार आग।
- यह कारखाना कुछ महीने पहले 9 मजदूरों की मौत के बाद सील हुआ था।
- सवाल यही कि जब कारखाने पर 24 घंटे पुलिस का पहरा तो आग कैसे लगी
- आग क्या सिर्फ संयोग या सबूतों का खत्म करने का कोई बड़ा खेल।
- फिलहाल आग को लेकर अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहे सवाल।
News In Detail
सुनील जैन@भिवाड़ी
राजस्थान के सबसे बड़ी उद्योग नगरी भिवाड़ी में दमकल की गाड़ियां जब खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्रकी तरफ दौड़ती हैं तो इलाके के लोग सहम जाते हैं। यह डर बेवजह नहीं है। पुलिस के कड़े पहरे और अदालती सील के बावजूद 15 दिन के भीतर अवैध पटाखों की एक ही फैक्ट्री में दो बार आग लग चुकी है।
सवाल सीधा है, जब फैक्ट्री पूरी तरह सील है, 24 घंटे संगीनों का साया है तो फिर अंदर आग कौन लगा रहा है? क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है या फिर खाकी और बारूद के उस खूनी खेल के सबूतों को मिटाने की सोची-समझी साजिश, जिसने कुछ ही महीने पहले 9 बेकसूर मजदूरों को जिंदा दफन कर दिया था?
सुरक्षा या सिर्फ छलावा?
दमकलकर्मी राकेश कुमार के अनुसार हाल ही में खुशखेड़ा की इस सील फैक्ट्री की दूसरी मंजिल में अचानक आग भड़क उठी। करीब डेढ़ घंटे की भारी मशक्कत के बाद दमकल की गाड़ियों ने इस आग पर काबू पाया।
कहने को तो वहां केवल प्लास्टिक के बोर्ड और पटाखों के खाली डिब्बे जले, लेकिन इस आग ने प्रशासन के दावों को पूरी तरह जलाकर राख कर दिया। आग बुझाने के लिए दमकलकर्मियों को दूसरे फ्लोर के शीशे तोड़ने पड़े।
तिजारा डीएसपी शिवराज सिंह का कहना है कि फैक्ट्री कोर्ट के आदेश पर सील थी। बाहर कांस्टेबल तैनात थे। पुलिस का तर्क है कि अंदर कोई कर्मचारी नहीं था, इसलिए बड़ा नुकसान नहीं हुआ। लेकिन सवाल यह है कि अगर अंदर कोई नहीं था तो शार्ट सर्किट की थ्योरी के अलावा क्या कोई गुपचुप तरीके से अंदर दाखिल हो रहा है?
क्या यह आग अवैध पटाखे बनाने के बचे-कुचे सबूतों को नष्ट करने के लिए लगाई जा रही है? या फिर कोर्ट में चल रहे मामले को कमजोर करने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेजों को स्वाहा किया जा रहा है?
16 फरवरी का वो काला दिन
इस पूरी कहानी के तार जुड़ते हैं 16 फरवरी 2026 से। इसी मालिक की एक अन्य अवैध पटाखा फैक्ट्री में भीषण आग लगी और फिर विस्फोट हुआ था। बारूद के उस अवैध ढेर में 9 मजदूरों की जिंदा जलकर मौत हो गई थी। वह दर्दनाक मंजर आज भी भिवाड़ी के जेहन में ताजा है।
जांच आगे बढ़ी तो जो सच सामने आया, उसने सबको चौंका दिया। जिस कारखाने में ब्लास्ट हुआ, कागजों में वहां रेडीमेड कपड़ों की फैक्ट्री चल रही थी। रेडीमेड ज़ोन के नाम पर अंदर मौत का सामान यानी अवैध बारूद का भंडारण किया जा रहा था।
इस खूनी खेल के पीछे सिर्फ कारोबारी नहीं, बल्कि कानून के रखवाले भी शामिल थे। भिवाड़ी पुलिस के तत्कालीन डीएसटी इंचार्ज मुकेश कुमार और कॉन्स्टेबल योगेश शर्मा की भूमिका संदिग्ध पाई गई। इसके बाद कॉन्स्टेबल के भाई हेमंत कुमार शर्मा और फैक्ट्री संचालक हेमंत सचदेवा को गिरफ्तार किया गया। लेकिन कहानी में ट्विस्ट यहीं खत्म नहीं होता।
असली मालिक कौन? किराएनामे के पीछे छिपे चेहरे
स्थानीय सूत्रों और जांच के मुताबिक हेमंत सचदेवा तो महज एक मुखौटा है। वह खाली फैक्ट्रियों को किराए पर लेकर काम करता था। इन फैक्ट्रियों का असली मालिक कोई और ही है।
दिलचस्प बात यह है कि सचदेवा जो किरायानामा बनवाता था, वह भी कॉन्स्टेबल के भाई हेमंत शर्मा के नाम पर होता था। स्थानीय स्तर पर पूरे रसूख और अवैध धंधे को यही कॉन्स्टेबल का भाई संभालता था।
यह खेल नया नहीं है। इससे पहले साल 2024 में चौपानकी में चल रही इसकी अवैध पटाखा फैक्ट्री को तत्कालीन एसडीएम ने सील किया था। लेकिन मजाल है कि नियमों का असर इन रसूखदारों पर हो।
सील के बावजूद फैक्ट्री धड़ल्ले से चलती रही, और नतीजा? 21 अक्टूबर 2024 को वहां भी अचानक रहस्यमयी आग लग गई और सब कुछ खाक हो गया। चौपानकी में जब बदनामी हुई, तो रातों-रात इस मौत के कारोबार को खुशखेड़ा इलाके में शिफ्ट कर दिया गया।
3000 फैक्ट्रियों का 'दिखावा' और ठंडे बस्ते में व्यवस्था
9 मजदूरों की मौत के बाद जब जनाक्रोश भड़का तो सोए हुए प्रशासन की नींद खुली। रीको प्रथम, रीको द्वितीय, प्रदूषण नियंत्रण मंडल, फैक्ट्री एवं बॉयलर्स विभाग, श्रम विभाग और नगर परिषद की संयुक्त टीमों ने करीब 3,000 औद्योगिक इकाइयों का ताबड़तोड़ निरीक्षण किया।
इस सर्वेक्षण में जो आंकड़े आए, वो डराने वाले थे। लगभग अधिकांश इकाइयों में नियमों और सुरक्षा मानकों का सरेआम उल्लंघन पाया गया।
कागजों का पेट भरने के लिए धड़ाधड़ नोटिस जारी किए गए। लेकिन आज, जब मजदूरों की मौत का मामला थोड़ा ठंडा पड़ा है, तो व्यवस्था फिर से उसी ढर्रे पर लौट आई है।
काम कुछ और, नाम कुछ और भिवाड़ी का नया नॉर्मल
भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र में आजकल एक नया ट्रेंड चल पड़ा है-फैक्ट्री किराए पर देने का चलन। मालिक कोई और होता है, संचालक कोई और। बाहर बोर्ड किसी रेडीमेड गारमेंट या केमिकल का लगा होता है, और भीतर अवैध बारूद पीसा जा रहा होता है।
खुशखेड़ा की सील फैक्ट्री में एक के बाद एक लग रही यह आग कई गंभीर सवाल छोड़ जाती है कि क्या पुलिस की सुरक्षा सिर्फ कागजी है, जिसके नीचे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं? अगर कोई अंदर नहीं जा सकता, तो क्या आग अदृश्य हाथों से लग रही है?
क्या कोर्ट में चल रहे मुकदमे को प्रभावित करने के लिए सबूतों की यह आग की होली खेली जा रही है?
भिवाड़ी की जनता और कानून अब इन सुलगते सवालों के जवाब का इंतजार कर रहे हैं। देखना यह है कि प्रशासन इस रहस्यमयी आग के पीछे के चेहरों को बेनकाब करता है या फिर एक और बड़े ब्लास्ट का इंतजार कर रहा है।
FAQ
- खुशखेड़ा की सील फैक्ट्री में बार-बार आग क्यों लग रही है?
सील फैक्ट्री में बार-बार आग लगने के पीछे दो संभावनाएं हैं: अवैध पटाखों के सबूत नष्ट करना या कोर्ट में चल रहे मामलों को प्रभावित करना। - क्या उद्योग नगरी भिवाड़ी में सुरक्षा पर्याप्त नहीं है?
फैक्ट्री पर पुलिस और संगीन तैनात हैं, आग लगने की घटनाएं यह सवाल उठाती हैं कि सुरक्षा केवल कागज़ी और दिखावटी है।
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