सुशासन की कसौटी पर रसूखदार, भ्रष्टाचार के जाल में फंसी टॉपर और रेगिस्तान का नया सूरज
Jaipur: राजस्थान की इस सप्ताह की सुर्खियां केवल समाचार मात्र नहीं हैं, बल्कि ये प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी, राजनीतिक नैतिकता और सामाजिक संघर्षों का एक आईना हैं। एक ओर सरकार जीरो टॉलरेंस के दावों से अपनी छवि चमकाने में जुटी है, तो दूसरी ओर रसूखदारों के कारनामे और सुरक्षा में कटौती जैसे फैसलों ने नई बहस को जन्म दे दिया है। सरकार के सुशासन का दावा तभी सार्थक होगा, जब कानून प्रमोद शर्मा जैसे रसूखदारों और काजल मीणा जैसे भ्रष्ट अधिकारियों पर समान रूप से और कठोरता से लागू होगा।
सीएम के फर्जी रिश्तेदार, सुशासन की चुनौती
जयपुर के मानसरोवर से आई प्रमोद शर्मा की खबर ने सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। खुद को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का साला बताकर जमीनों पर कब्जा करने और अफसरों पर धौंस जमाने वाले प्रमोद का फरार होना कई सवाल खड़े करता है।
यह घटना उस पुरानी बीमारी का प्रतीक है, जहां सत्ता के केंद्र के पास रहने वाले बिचौलिए खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। प्रमोद शर्मा ने न केवल मुख्यमंत्री के नाम का दुरुपयोग किया, बल्कि प्रशासन की आंखों में धूल झोंककर भ्रष्टाचार का एक समानांतर ढांचा तैयार किया।
सवाल यह है कि एक साल से जांच लंबित क्यों थी? क्या प्रमोद को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था? यदि मुख्यमंत्री वास्तव में जीरो टॉलरेंस के प्रति गंभीर हैं तो प्रमोद शर्मा की गिरफ्तारी से इसकी मजबूत शुरुआत होनी चाहिए। उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जो उसके साला होने के दावे से दब जाते थे।
सुरक्षा में कटौती या राजनीतिक संदेश?
शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी की सुरक्षा में अचानक की गई कटौती इस सप्ताह की सबसे चर्चित राजनीतिक खबर रही। 4 सुरक्षाकर्मियों के स्थान पर अब केवल 1 पीएसओ का तैनात रहना बाड़मेर की राजनीति में उबाल ला रहा है।
प्रशासन ने इसे इंटेलिजेंस इनपुट और नियमों का हवाला देकर जायज ठहराया है, लेकिन राजनीति में टाइमिंग का बहुत महत्व होता है। भाटी एक निर्दलीय विधायक हैं जिनकी लोकप्रियता और युवाओं में पकड़ सरकार के लिए अक्सर चुनौती बनती रही है। इस फैसले को तनोट से जयपुर तक की उनकी ओरण बचाओ पदयात्रा से जोड़कर देखा जा रहा है।
सुरक्षा एक व्यक्ति का अधिकार है, विशेषकर तब जब उसे पूर्व में धमकियां मिल चुकी हों। यदि इस कटौती के पीछे राजनीतिक प्रतिशोध है तो यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। हालांकि, यदि यह वास्तव में संसाधनों के सही वितरण का हिस्सा है, तो सरकार को सभी विधायकों पर इसे समान रूप से लागू करना चाहिए।
विधायक पुत्र का प्रकरण
भाजपा विधायक हरिसिंह रावत के पुत्र रणजीत सिंह रावत पर एक महिला द्वारा लगाए गए यौन शोषण और संपत्ति हड़पने के आरोप सत्ताधारी दल के लिए नैतिक संकट पैदा कर रहे हैं। 2014 से 2017 तक लिव-इन रिलेशनशिप, शादी का झांसा और फिर मुकर जाना-ये आरोप यदि सत्य हैं तो यह समाज के रसूखदार वर्ग की उस मानसिकता को दर्शाता है जहां महिलाओं को उपभोग की वस्तु समझा जाता है।
इस मामले में एफआईआर और निष्पक्ष जांच अनिवार्य है। अक्सर ऐसे मामलों में राजनीतिक दबाव के कारण पीड़िता को चुप करा दिया जाता है। राजसमंद एसपी को यह सुनिश्चित करना होगा कि विधायक पुत्र होने के नाते जांच की दिशा प्रभावित न हो। यह मामला भाजपा के बेटी बचाओ के नारे की भी परीक्षा लेगा।
आरएएस टॉपर का रिश्वत कांड
नादौती एसडीएम काजल मीणा की गिरफ्तारी इस सप्ताह की सबसे शर्मनाक घटना रही। आरएएस- 2023 की एसटी वर्ग की टॉपर रहीं काजल अपनी पहली ही पोस्टिंग में 60 हजार की रिश्वत लेते पकड़े जाना शिक्षा और प्रशासनिक चयन प्रक्रिया पर बड़े सवाल उठाता है।
काजल मीणा का केस यह साबित करता है कि उच्च शैक्षणिक योग्यता और ईमानदारी का कोई अनिवार्य संबंध नहीं है। बैग से अतिरिक्त 4 लाख रुपए मिलना यह बताता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी जम चुकी थीं।
यह उन युवाओं के चेहरे पर तमाचा है जो वर्षों तक लाइब्रेरी में बैठकर मेहनत करते हैं। जब सिस्टम का हिस्सा बनते ही युवा अधिकारी ऐसी गतिविधियों में लिप्त होते हैं, तो जनता का विश्वास टूटता है। एसीबी की यह कार्रवाई काबिले तारीफ है, लेकिन सजा ऐसी होनी चाहिए जो नजीर बने।
रेगिस्तान का चमकता सितारा
निराशा के बीच आशा की किरण बाड़मेर के दिनेश विश्नोई लेकर आए हैं। आरपीएससी द्वारा घोषित आरएएस-2024 के परिणामों में दिनेश ने पूरे राजस्थान में प्रथम स्थान प्राप्त किया है।
एक ओर जहां काजल मीणा जैसे लोग प्रशासनिक सेवा को कलंकित कर रहे हैं, वहीं दिनेश विश्नोई जैसे युवा संघर्ष और ईमानदारी की मिसाल पेश कर रहे हैं। भलीसर जैसे छोटे गांव से निकलकर प्रदेश का टॉपर बनना यह सिद्ध करता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।
दिनेश की सफलता राज्य के लाखों अभ्यर्थियों के लिए प्रेरणा है। सरकार को चाहिए कि वह ऐसे ईमानदार और मेहनती युवाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपे ताकि प्रदेश का भविष्य सुरक्षित हाथों में रहे।
भिवाड़ी का औद्योगिक असंतोष
भिवाड़ी में श्रमिकों का उग्र प्रदर्शन और कई कंपनियों में कामकाज ठप होना राजस्थान की इज ऑफ डूइंग बिजनेस की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है। वेतन वृद्धि और बुनियादी सुविधाओं (जैसे खाने में कीड़े मिलना) को लेकर उपजा यह असंतोष गहराता जा रहा है।
मजदूरों की मांगें (18-20 हजार न्यूनतम वेतन) महंगाई के दौर में अनुचित नहीं लगतीं। सबसे दुखद पहलू कैंटीन के खाने की गुणवत्ता है।
औद्योगिक शांति के बिना विकास संभव नहीं है। यदि श्रमिकों को बुनियादी मानवीय सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तो उनका सड़क पर उतरना स्वाभाविक है। राज्य सरकार के श्रम विभाग को तुरंत हस्तक्षेप कर प्रबंधन और श्रमिकों के बीच संवाद स्थापित करना चाहिए, वरना यह आंदोलन अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी फैल सकता है।
अगले सप्ताह फिर मिलेंगे नई चिट्ठी के साथ !
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