राजस्थान में साइबर ठगी का बड़ा नेटवर्क, 50% से ज्यादा रकम विदेश तक पहुंचने का दावा
समझें क्या है पूरा मामला
- साइबर ठगी की रकम पहले भारतीय बैंक खातों में पहुंचाई जाती है।
- इसके बाद रकम कई म्यूल अकाउंट में बांट दी जाती है।
- कैश निकालने और दूसरे खातों में जमा कराने का काम अलग लोग करते हैं।
- रकम को USDT में बदलकर Telegram पर मिले क्रिप्टो एड्रेस पर भेजा जाता है।
- पुलिस अब बैंकिंग और डिजिटल ट्रेल के जरिए इस नेटवर्क की आगे की कड़ियां तलाश रही है।
जयपुर: राजस्थान में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। अब इन मामलों की जांच में यह भी सामने आया है कि ठगी करने वाले सिर्फ भारत में बैठकर काम नहीं कर रहे, बल्कि विदेश में बैठे हैंडलर्स से भी उनका कनेक्शन है।
जांच के मुताबिक, साइबर ठगी से मिलने वाली रकम का बड़ा हिस्सा अलग-अलग भारतीय बैंक खातों में पहुंचाया जाता है। इसके बाद पैसे को कई खातों में घुमाया जाता है। आखिर में इसे USDT यानी क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर विदेश में बैठे हैंडलर्स तक पहुंचाने का काम किया जाता है। जयपुर के सेंट्रल साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन की जांच में साइबर ठगी के पैसे के इस पूरे नेटवर्क का तरीका सामने आया है।
पहले ठगी, फिर शुरू होता है पैसे का खेल
पुलिस के मुताबिक साइबर ठगी चाहे डिजिटल अरेस्ट, बॉस स्कैम या इन्वेस्टमेंट फ्रॉड के नाम पर हुई हो, उसके बाद पैसे को एक खाते में रखकर नहीं छोड़ा जाता।
ठगी की रकम पहले भारतीय लोगों के नाम पर खुले बैंक खातों में पहुंचती है। इसके बाद इसे दूसरे खातों में भेज दिया जाता है। कई बार रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया जाता है। इससे पैसे का असली स्रोत पता करना मुश्किल हो जाता है।
भारतीय सिम और बैंक खाते बन रहे बड़ी कड़ी
जांच में सामने आया है कि ठग भारतीय लोगों के नाम पर जारी मोबाइल सिम और बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं। इन खातों को उपलब्ध कराने वाले लोगों को इसके बदले कमीशन दिया जाता है। ऐसे खातों को आमतौर पर म्यूल अकाउंट कहा जाता है। यानी जिस व्यक्ति का खाता इस्तेमाल हो रहा है, जरूरी नहीं कि वही पूरी ठगी कर रहा हो। कई बार वह सिर्फ कमीशन के लिए अपना खाता उपलब्ध कराता है।
Telegram से USDT तक पहुंचती है रकम
पुलिस के मुताबिक ठगी की रकम को आखिर में क्रिप्टोकरेंसी में बदलने का काम भी अलग टीम करती है। इसके लिए Telegram के जरिए USDT का क्रिप्टो एड्रेस भेजा जाता है। इसके बाद रकम को USDT में बदलकर उस एड्रेस पर ट्रांसफर कर दिया जाता है। यहीं से पैसा विदेश में बैठे कथित हैंडलर्स तक पहुंच जाता है।
कॉर्पोरेट बैंक अकाउंट का भी इस्तेमाल
जांच में यह भी सामने आया है कि साइबर ठग सिर्फ सामान्य बैंक खातों तक सीमित नहीं हैं। बड़ी रकम के लिए कंपनियों या फर्मों के नाम पर खोले गए कॉर्पोरेट बैंक अकाउंट का भी इस्तेमाल किया जाता है।
आरोप है कि अकाउंट होल्डर से इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी लेकर उसका इस्तेमाल किया जाता है। कई मामलों में अकाउंट से जुड़ी सिम भी अपने पास रखने की कोशिश की जाती है। इससे खाते में आने वाली रकम और होने वाले ट्रांजैक्शन पर नजर रखना आसान हो जाता है।
मोबाइल का कंट्रोल भी लेने की कोशिश
जांच में मोबाइल फोन के जरिए अकाउंट होल्डर पर नजर रखने का तरीका भी सामने आया है। आरोप है कि कुछ मामलों में मोबाइल में संदिग्ध APK या रिमोट एक्सेस एप्लीकेशन इंस्टॉल करवाए जाते हैं। इसके बाद फोन को दूर बैठकर ऑपरेट करने की कोशिश की जाती है। इससे मोबाइल पर आने वाले मैसेज और दूसरी जानकारी तक पहुंच बनाई जा सकती है।
पैसे को कई हिस्सों में बांटकर निकालते हैं
साइबर ठगी की रकम एक खाते में आने के बाद उसे छोटे-छोटे हिस्सों में कई खातों में भेजा जाता है। इसके बाद रकम ATM, चेक, POS मशीन, आधार आधारित सेवाओं या कैश डिपॉजिट मशीन के जरिए आगे बढ़ाई जा सकती है। कई बार कैश निकालकर उसे दूसरे बैंक खाते में जमा कराया जाता है। इस तरह पैसे की सीधी कड़ी को तोड़ने की कोशिश की जाती है।
हर काम के लिए अलग टीम
जांच में यह भी पता चला है कि इस पूरे नेटवर्क में हर व्यक्ति का काम अलग हो सकता है। कोई सिम उपलब्ध कराता है, कोई बैंक खाता देता है, कोई अकाउंट संभालता है तो कोई कैश निकालने या उसे दूसरे खाते में जमा कराने का काम करता है। इसके बाद एक टीम रकम को USDT में बदलती है। पुलिस के मुताबिक इस पूरे काम के बदले अलग-अलग लोगों को कमीशन दिया जाता है।
40 से 50 फीसदी तक कमीशन में जाने का दावा
जांच के मुताबिक सिम और बैंक अकाउंट उपलब्ध कराने वाले लोगों को करीब 5-5 फीसदी तक कमीशन दिया जा सकता है। अकाउंट मैनेज करने वाली टीम का हिस्सा करीब 5 से 7 फीसदी बताया गया है। इसके अलावा कैश निकालने और जमा कराने वाले लोगों को भी कमीशन दिया जाता है।
पुलिस की जांच में दावा किया गया है कि इस तरह स्थानीय नेटवर्क में कुल रकम का करीब 40 से 50 फीसदी हिस्सा बंट जाता है। बाकी रकम USDT के जरिए विदेश में बैठे कथित हैंडलर्स तक पहुंचाई जाती है।
विदेश से जुड़े IP एड्रेस भी मिले
साइबर मामलों की तकनीकी जांच में कुछ मामलों में विदेश से जुड़े IP एड्रेस मिलने की बात सामने आई है। जांच में कंबोडिया, थाईलैंड, लाओस, वियतनाम और सिंगापुर जैसे देशों से जुड़े IP एड्रेस का जिक्र किया गया है। कुछ मामलों में पाकिस्तान से जुड़े IP एड्रेस की जानकारी भी सामने आने की बात कही गई है।
हालांकि सिर्फ IP एड्रेस मिलना किसी व्यक्ति के अपराध में शामिल होने का अंतिम सबूत नहीं माना जा सकता। इसके लिए पुलिस को दूसरे डिजिटल और वित्तीय सबूत भी जोड़ने होते हैं।
विदेश में बैठे लोग, भारत में अलग नेटवर्क
जांच के मुताबिक साइबर ठगी का एक हिस्सा विदेश में बैठे कथित ऑपरेटर संभालते हैं, जबकि भारत में मौजूद लोग सिम, बैंक अकाउंट और पैसों से जुड़े काम संभालते हैं।
यानी पूरा नेटवर्क अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है। किसी एक व्यक्ति के पास पूरी जानकारी नहीं होती, जिससे जांच एजेंसियों के लिए पूरे नेटवर्क तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
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