जॉब के नाम पर विदेश भेजकर बनाते थे साइबर गुलाम, 5 आरोपियों गिरफ्तार
समझें क्या है पूरा मामला
- राजस्थान में इंटरनेशनल साइबर स्लेवरी गैंग का खुलासा।
- जॉब के बहाने युवाओं को विदेश भेजकर ठगी कराई।
- लाओस-कंबोडिया समेत चार देशों से जुड़े तार।
- पासपोर्ट छीनकर युवाओं को बनाया जाता था बंधक।
- पुलिस ने 5 आरोपियों को किया गिरफ्तार।
राजस्थान पुलिस ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय गैंग का पर्दाफाश किया है। यह गैंग जॉब दिलाने के नाम पर भारतीय युवाओं से विदेश में साइबर ठगी करवाता था। पुलिस ने इस मामले में 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। गैंग युवाओं को विदेश ले जाकर उनके पासपोर्ट और पहचान-पत्र छीन लेता था। यह पूरा नेटवर्क लाओस, कंबोडिया, वियतनाम और म्यांमार के साइबर स्कैम सेंटर से जुड़ा हुआ था।
पुलिस ने सोमवार रात इस अंतरराष्ट्रीय साइबर स्लेवरी गिरोह का खुलासा किया। इसमें साइबर फ्रॉड के साथ मानव तस्करी के भी सबूत मिले हैं।
किन आरोपियों को किया गिरफ्तार
पुलिस ने सबसे पहले ब्यावर से दो आरोपियों को पकड़ा। इनके नाम राजकरण उर्फ रॉनी और सागर सिंह हैं। इसके बाद तीन और आरोपियों को कोलकाता से गिरफ्तार किया गया। इनके नाम जीतूराज फुलवारी उर्फ जेम्स, रवि कुमार उर्फ माही और अनिल कुमार उर्फ डेविल हैं।
जांच में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। आरोपी जीतूराज ने करीब 10 भारतीय युवाओं के पासपोर्ट और निजी दस्तावेज चीनी हैंडलर्स को सौंप दिए थे।
I4C की जांच में मिला बड़ा सुराग
एडीजी साइबर क्राइम विजय कुमार सिंह ने इस मामले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि I4C यानी भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के डाटा विश्लेषण से बड़ा खुलासा हुआ। राजस्थान के 500 से ज्यादा लोगों की पहचान हुई है।
इन सभी को जॉब का लालच देकर कंबोडिया, वियतनाम, म्यांमार और लाओस भेजा गया था। इनमें से कई अब तक भारत नहीं लौट सके हैं। जो पीड़ित वापस लौटे, उन्होंने भी अपनी आपबीती बताई। उनके अनुसार वहां उनके साथ मारपीट और मानसिक प्रताड़ना होती थी। उन्हें जबरन साइबर फ्रॉड करने पर मजबूर किया जाता था।
फर्जी प्रोफाइल से करोड़ों की ठगी
एडीजी विजय कुमार सिंह ने आगे बताया कि ब्यावर में दबिश देकर राजकरण और सागर सिंह को पकड़ा गया। इनके मोबाइल, पासपोर्ट और डिजिटल सबूतों से कई अहम सुराग मिले। इनमें विदेशी हैंडलर्स, वीपीएन, फेक जीपीएस और पूरे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की जानकारी शामिल थी।
पूछताछ के बाद पुलिस ने कोलकाता से तीन और आरोपियों को पकड़ा। यह तीनों टूरिस्ट वीजा पर म्यांमार जाने की तैयारी में थे।
आरोपियों ने पूछताछ में ठगी का पूरा तरीका बताया। साइबर स्कैम सेंटर में उन्हें पहले ट्रेनिंग दी जाती थी। इसके बाद फेक प्रोफाइल बनाकर सोशल मीडिया पर भारतीयों से दोस्ती की जाती थी। धीरे-धीरे उनका विश्वास जीता जाता था। इसके बाद क्रिप्टोकरेंसी और निवेश में भारी मुनाफे का लालच दिया जाता था। इसी झांसे में पीड़ित लाखों रुपए निवेश कर देते थे। यह पूरी रकम म्यूल अकाउंट्स से निकालकर क्रिप्टोकरेंसी में बदली जाती थी। आखिर में यह रकम चीन और कंबोडिया के हैंडलर्स तक पहुंचाई जाती थी।
पासपोर्ट छीनकर बनाया जाता था बंधक
जांच में एक और गंभीर बात सामने आई। गिरोह युवाओं को हर महीने 800 से 1000 अमेरिकी डॉलर सैलरी का लालच देता था। इसी लालच में युवा कंबोडिया, वियतनाम, म्यांमार और लाओस जाने को तैयार हो जाते थे।
विदेश पहुंचते ही असली खेल शुरू होता था। युवाओं के पासपोर्ट और पहचान-पत्र तुरंत जब्त कर लिए जाते थे। इसके बाद उन्हें डिजिटल अरेस्ट, फेक इन्वेस्टमेंट और क्रिप्टो फ्रॉड जैसे साइबर अपराध करने पर मजबूर किया जाता था। उनसे रोजाना सुबह 9 बजे से रात साढ़े 11 बजे तक काम कराया जाता था। अगर कोई काम छोड़ना चाहता, तो उसे हजारों डॉलर जुर्माने और मारपीट की धमकी दी जाती थी।
पांचों आरोपियों की अलग-अलग भूमिका
हर आरोपी की गैंग में अलग जिम्मेदारी थी। राजकरण उर्फ रॉनी कंबोडिया के पोइपेट स्थित स्कैम कंपाउंड में एचआर की भूमिका निभाता था। वह चार महीने पहले भारत लौटा था। इसके बाद उसने ब्यावर के कई युवाओं को अधिक सैलरी का लालच देकर कंबोडिया भेजा। बदले में उसे भारी कमीशन मिलता था।
सागर सिंह की भूमिका भी अहम थी। वह पोइपेट में फेसबुक पर फर्जी महिला प्रोफाइल बनाकर लोगों से दोस्ती करता था। कुछ दिनों की चैटिंग में ही वह पीड़ितों की गोपनीय जानकारी हासिल कर लेता था। इसके बाद वह पूरी जानकारी अपने टीम लीडर को सौंप देता था।
जीतूराज उर्फ जेम्स का काम पैसों के लेन-देन से जुड़ा था। वह क्रिप्टो एक्सचेंज बायनेन्स पर अकाउंट चलाता था। इसके जरिए वह ठगी की रकम USDT में बदलकर आगे भेजता था। वह भारत से फर्जी सिम कार्ड और मूल अकाउंट भी साइबर सेंटर तक पहुंचाता था।
रवि कुमार उर्फ माही साल 2023 से ही कंबोडिया में सक्रिय था। वह वहां नए लोगों को फर्जी प्रोफाइल बनाने की ट्रेनिंग देता था। बाद में वह म्यांमार के नए स्कैम सेंटर में शिफ्ट होने की तैयारी में था।
अनिल कुमार उर्फ डेविल, जीतूराज का भाई है। वह 2024 में कंबोडिया गया था और करीब एक साल तक स्कैम सेंटर में सक्रिय रहा। उसे म्यांमार के एक स्कैम सेंटर में निर्माण सुपरवाइजर बनाकर भेजा जा रहा था। पुलिस ने उसे म्यांमार की उड़ान से ठीक पहले कोलकाता से पकड़ लिया।
अभी भी जारी है तलाश
पुलिस ने आरोपियों से पासपोर्ट, विदेशी वीजा दस्तावेज, मोबाइल और डिजिटल सबूत जब्त किए हैं। इन सबूतों के आधार पर पूरे नेटवर्क की जांच की जा रही है। पुलिस अब गिरोह के अन्य सदस्यों की तलाश में जुटी है।
ये खबर भी पढे़:-
हाई कोर्ट ने आसाराम को दी 20 दिन की पैरोल, सरकार का विरोध खारिज
केंद्र ने कहा- मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्मारक के योग्य नहीं, जानिए क्या दिए तर्क
अलवर में जासूसी नेटवर्क का खुलासा, सेना की जानकारी पाकिस्तान भेजने का आरोप
फंड था, मरीज भी थे... फिर क्यों सरेंडर किए 54 करोड़? पढ़ें आयुष विभाग की रिपोर्ट