20 महीने से नहीं बनीं जन शिकायतों के लिए समितियां, सुशासन के दावे हो रहे हवा-हवाई
राजस्थान में सरकार बदलती है, नीतियां बदलती हैं और दावों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स भी बदलते हैं। लेकिन अगर कुछ नहीं बदलता तो वह है यहां की अफसरशाही का लापरवाह रवैया।
प्रदेश में सुशासन, पारदर्शिता और त्वरित न्याय के जो ढोल पीटे जा रहे हैं, उनकी जमीनी हकीकत पर एक बार फिर ऐसा करारा तमाचा लगा है जिसे देखकर न्याय प्रणाली भी हैरान है।
हाई कोर्ट की लगातार तीखी फटकार और तत्कालीन मुख्य सचिव सुधांश पंत के सख्त आदेशों के बावजूद राजस्थान के सरकारी महकमों के आला अफसरों ने कान में तेल डाल रखा है।
जनता की शिकायतों और कर्मचारियों के जायज मामलों को समय पर सुलझाने के लिए जिस बेहद महत्वपूर्ण अभ्यावेदन निस्तारण परामर्शदात्री समिति (Representation Disposal Advisory Committee) का गठन होना था, उसे नौकरशाही ने पूरी तरह से ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया है।
7 दिन का था अल्टीमेटम, बीत गए 20 महीने
मामले की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि तत्कालीन मुख्य सचिव ने 8 अक्टूबर, 2024 को राज्य के सभी प्रशासनिक विभागों को एक कड़ा परिपत्र (Circular) जारी किया था। इस आदेश में साफ लिखा था कि 7 दिन के भीतर हर विभाग में राज्य स्तरीय अभ्यावेदन निस्तारण समिति का गठन हो जाना चाहिए।
उद्देश्य बेहद साफ और जनहितैषी था- आम जनता या किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा दिए गए किसी भी ज्ञापन (Representation) या शिकायत पर अधिकतम 30 दिन के भीतर सकारण आदेश (Speaking Order) जारी कर उसका निपटारा किया जाए।
आज इस आदेश को जारी हुए करीब 20 महीने (लगभग पौने दो साल) बीत चुके हैं। हकीकत यह है कि अधिकांश विभागों ने इस समिति का ढांचा तक खड़ा नहीं किया।
प्रशासनिक ढिलाई और लापरवाही की पराकाष्ठा तो देखिए कि आज जब कई विभागीय प्रमुखों (ACS, प्रमुख सचिव और सचिवों) से इस बारे में बात की जाती है, तो उन्हें यह याद तक नहीं है कि ऐसा कोई परिपत्र कभी जारी भी हुआ था।
सरकार की त्वरित न्याय की मंशा को अफसरों ने फाइलों के ऐसे मकड़जाल में उलझाया है कि सुशासन का दम घुटने लगा है।
आखिर हाईकोर्ट को क्यों दिखाना पड़ा रौद्र रूप?
दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट ने अलग-अलग मामलों की सुनवाई के दौरान सरकार के काम करने के तरीके पर बेहद गहरी नाराजगी और असंतोष व्यक्त किया था।
कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि सरकारी विभागों में समय पर न तो आम नागरिकों की सुनवाई होती है और न ही कर्मचारियों के ज्ञापनों का निपटारा किया जाता है। जब थक-हारकर पीड़ित व्यक्ति के सामने सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तो वह भारी मानसिक तनाव और आर्थिक नुकसान झेलते हुए मजबूरन कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है।
सरकारी विभागों की इसी अकर्मण्यता के कारण आज अदालतों में लाखों ऐसे मुकदमे लंबित हैं, जिन्हें प्रशासनिक स्तर पर महज एक टेबल पर बैठकर सुलझाया जा सकता था।
अदालतों पर बढ़ता यह अतिरिक्त बोझ न्याय की गति को धीमा कर रहा है, जो कि किसी भी कल्याणकारी राज्य की सुशासन नीति के पूरी तरह खिलाफ है।
दो बड़े केस, जिन्होंने हिला दी थी सरकार की चूलें
पवन मीणा बनाम राज्य सरकार: इस मामले में हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 2 फरवरी, 2024 को कड़ा आदेश पारित किया था। कोर्ट की इस सख्ती के बाद मुख्य सचिव ने सभी विभागों को पूरी संवेदनशीलता के साथ काम करने और मुकदमों को विभाग स्तर पर ही निपटाने की हिदायत दी। लेकिन अफसरों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
बलराज बनाम राज्य सरकार व अन्य: जब पहली हिदायत का कोई असर नहीं हुआ, तो जोधपुर मुख्य पीठ में इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आदेशों की अवहेलना और समय पर निर्णय न लेने की ढर्रेबाज नीति पर प्रचंड असंतोष व्यक्त किया।
कोर्ट का रुख इतना कड़ा था कि उन्होंने सीधे राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) को तलब कर लिया। कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार इस संबंध में तुरंत प्रभावी कदम उठाए और इसकी पूरी रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश करे।
इसी अदालती दबाव के बाद आखिरकार 8 अक्टूबर, 2024 को मुख्य सचिव को नई त्रिस्तरीय समिति व्यवस्था लागू करने के निर्देश जारी करने पड़े थे।
क्या थी यह त्रिस्तरीय समिति और इसका फॉर्मूला?
मुख्य सचिव के आदेश के मुताबिक सरकार में जवाबदेही तय करने के लिए बेहद मजबूत और तकनीकी रूप से सक्षम समिति का खाका खींचा गया था।
इसे संभाग (Division) और जिला स्तर पर भी गठित करने की छूट दी गई थी ताकि जयपुर बैठे बिना ही जिलों में फैसले हो सकें।
राजधानी में राज्य स्तर पर इस समिति का स्वरूप कुछ इस तरह तय किया गया था:
पद / जिम्मेदारी समिति में शामिल होने वाले अधिकारी मुख्य कार्य
संयोजक / नोडल अधिकारी विभाग के संयुक्त सचिव या उप
सचिव पूरे विभाग और अधीनस्थ कार्यालयों के मामलों की मॉनिटरिंग करना।
सदस्य विभाग के वरिष्ठतम लेखा अधिकारी वित्तीय और बजट से जुड़े मामलों का तकनीकी परीक्षण करना।
सदस्य सचिव विभाग के वरिष्ठतम विधि अधिकारी कानूनी अड़चनों को दूर करना और कोर्ट के नियमों के तहत ड्राफ्ट तैयार करना।
टाइमलाइन का कड़ा नियम: इस समिति को कानूनी रूप से पाबंद किया गया था कि यदि हाईकोर्ट ने किसी मामले में निर्णय के लिए कोई समय सीमा (Time-bound Window) तय की है, तो उसी अवधि में काम पूरा करना होगा। यदि कोर्ट ने कोई समय सीमा नहीं दी है तो अधिकतम 30 दिनों के भीतर अभ्यावेदन पर अंतिम निर्णय लेना अनिवार्य होगा।
क्या होता है स्पीकिंग ऑर्डर?
इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ था- स्पीकिंग ऑर्डर। आम तौर पर सरकारी दफ्तरों में नौकरशाही का एक तय ढर्रा होता है। जब कोई पीड़ित अपनी अर्जी लेकर जाता है तो महीनों चक्कर कटवाने के बाद फाइल पर लाल पेन से लिख दिया जाता है— अस्वीकार या नियम सम्मत नहीं। पीड़ित को कभी पता ही नहीं चलता कि उसका हक क्यों मारा गया।
कानूनी परिभाषा में 'Speaking Order' का सीधा मतलब यह है कि अधिकारी की फाइल या आदेश खुद बोले। यानी, यदि किसी व्यक्ति की अर्जी को स्वीकार किया जा रहा है या खारिज किया जा रहा है, तो अफसर को स्पष्ट, सरल और कानूनी भाषा में उसका कारण लिखना होगा।
इससे आवेदक को यह पूरी जानकारी मिलती है कि उसका काम किस नियम के तहत हुआ या फिर किस तकनीकी खामी के कारण रोका गया। यह व्यवस्था प्रशासनिक पारदर्शिता की सबसे बड़ी मिसाल बन सकती थी, लेकिन अफ़सोस। अफसरों ने इस बोलने वाले आदेश को गूंगा बना कर रख दिया।
अदालती अवमानना का डर भी बेअसर
समितियों के न बनने का खामियाजा केवल जनता ही नहीं, बल्कि खुद सरकार और उसकी छवि भी भुगत रही है। आए दिन राजस्थान सरकार के बड़े-बड़े अधिकारियों (IAS, RAS और विभागाध्यक्षों) को हाईकोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़ता है।
समय पर निर्णय न होने के कारण उन पर अदालती अवमानना (Contempt of Court) के केस चलते हैं, जिससे उन्हें कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं।
यदि यह समितियां समय पर गठित होकर काम कर रही होतीं, तो समितियां अपनी तकनीकी रिपोर्ट सक्षम अधिकारी को सौंप देतीं, जिससे 30 दिन में सही आदेश जारी हो जाता।
जब विभाग स्तर पर ही समस्या का तार्किक समाधान मिल जाता, तो कोई कोर्ट क्यों जाता? इससे अदालतों में लंबित मामलों का बोझ आधा हो जाता।
सरकार को गैर-जरूरी मुकदमों के लिए वकीलों, कागजी कार्रवाई और अदालती दौरों पर करोड़ों रुपये का राजस्व खर्च नहीं करना पड़ता।
सबसे बड़ा फायदा प्रदेश के उस गरीब नागरिक या छोटे कर्मचारी को होता, जिसे एक छोटे से काम या शिकायत के लिए अपनी गाढ़ी कमाई वकीलों की फीस में नहीं फूंकनी पड़ती और वह मानसिक तनाव से बच जाता।
आखिर क्यों कतराती है अफसरशाही?
सचिवालय के गलियारों में दबी जुबान से चर्चा है कि अफसरशाही जानबूझकर ऐसी कमेटियों को सक्रिय नहीं करना चाहती। वजह साफ है- जवाबदेही।
जैसे ही स्पीकिंग ऑर्डर और 30 दिन की समय सीमा अनिवार्य होगी, अफसरों की मनमानी पर लगाम लग जाएगी। उन्हें हर फाइल पर अपनी बुद्धि और नियम का इस्तेमाल करना होगा, जिसे वे अपनी सहूलियत के हिसाब से टालते रहना पसंद करते हैं।
यही वजह है कि हाईकोर्ट के कड़े रुख और मुख्य सचिव के हस्ताक्षरों से जारी आदेश को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।
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