पंजीकरण कहीं और इलाज कर रहे दूसरे राज्य, तीन साल बाद भी डॉक्टरों का डेटाबेस तैयार नहीं

Ashish Bhardwaj | Apr 07, 2026, 13:29 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में डॉक्टरों का ट्रैकिंग सिस्टम तीन साल बाद भी विकसित नहीं हो पाया है। आरएससी ने सभी प्राइवेट हॉस्पिटल से डॉक्टरों का फिर से डेटा मांगा है।

News In Short

  • डॉक्टरों के लिए यूनिक रजिस्ट्रेशन नंबर तैयार का काम तीन साल बाद भी पूरा नहीं।
  • कई डॉक्टरों का ​रजिस्ट्रेशन कहीं और, प्रैक्टिस कर रहे दूसरे राज्य में।
  • मौजूदा सिस्टम में डॉक्टरों की सटीक ट्रैकिंग करना असंभव।
  • नियमों के अनुसार प्रैक्टिस के लिए डॉक्टर का उसी राज्य में पंजीकरण जरूरी।
  • आरएमसी ने प्राइवेट हॉस्पिटल से फिर से मांगा डॉक्टरों का पूरा विवरण।

News In Detail

Jaipur: राजस्थान में चिकित्सा सेवा को पारदर्शी बनाने के दावों के बीच बड़ी लापरवाही सामने आई है। नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) स्तर पर डॉक्टरों के लिए यूनिक रजिस्ट्रेशन नंबर और राष्ट्रीय स्तर का रियल-टाइम डेटाबेस तैयार करने की योजना तीन साल से अधर में लटकी है। इसका नतीजा यह है कि वर्तमान सिस्टम में डॉक्टरों की सटीक ट्रैकिंग करना लगभग असंभव हो गया है। कई डॉक्टर एक राज्य में पंजीकृत हैं, लेकिन वे बिना किसी सूचना या वैध स्थानांतरण के दूसरे राज्यों में धड़ल्ले से प्रैक्टिस कर रहे हैं।



​नियम सख्त, लेकिन सिस्टम हुआ ढीला

​मौजूदा नियमों के अनुसार कोई भी डॉक्टर किसी राज्य में तब तक प्रैक्टिस नहीं कर सकता, जब तक कि वह उस राज्य की मेडिकल काउंसिल में पंजीकृत न हो। यदि कोई डॉक्टर दूसरे राज्य से आकर राजस्थान में मरीजों का इलाज करना चाहता है तो उसे राजस्थान मेडिकल काउंसिल (आरएससी) में अपना पंजीकरण कराना अनिवार्य है।



हालांकि, जमीनी हकीकत इसके उलट है। एक यूनिक आईडी व्यवस्था नहीं होने के कारण अवैध प्रैक्टिस और फर्जी डॉक्टरों का बोलबाला बढ़ रहा है। सूत्रों के अनुसार हाल ही में प्रदेश में फर्जी डॉक्टरों के कई मामले सामने आने के बाद अब आरएमसी ने सख्ती दिखाना शुरू किया है।



​निजी अस्पतालों से मांगा गया विवरण

​आरएमसी ने प्रदेश के सभी निजी अस्पतालों को कड़ा निर्देश जारी करते हुए वहां कार्यरत सभी डॉक्टरों के पंजीकरण का विवरण मांगा है। काउंसिल का मानना है कि इस प्रक्रिया से यह स्पष्ट हो सकेगा कि राजस्थान में वर्तमान में कितने ऐसे डॉक्टर सक्रिय हैं, जिनका पंजीकरण किसी अन्य राज्य में है।



आरएससी सूत्रों का कहना है कि कोई भी डॉक्टर एक राज्य के पंजीकरण के आधार पर दूसरे राज्य में जाकर इलाज नहीं कर सकता। वर्तमान में चूंकि यूनिक आईडी की व्यवस्था लागू नहीं हुई है, इसलिए हमने सभी निजी अस्पतालों से डॉक्टरों का डेटा मांगा है, ताकि हम डॉक्टरों का भौतिक सत्यापन कर सकें।



​तीन साल पहले संसदीय समिति ने दी थी सिफारिश

​हैरानी की बात यह है कि डॉक्टरों के इस मल्टी-स्टेट रजिस्ट्रेशन और ट्रैकिंग की समस्या को सुलझाने के लिए तीन साल पहले ही संसदीय समिति ने अपनी सिफारिशें दी थीं। समिति ने सुझाव दिया था कि अमेरिका के जीपीआई ट्रैक की तर्ज पर भारत में भी एक रियल-टाइम राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया जाए।



​इस डेटाबेस के बनने सेराजस्थान स्वास्थ्य मंत्रालय, राज्य सरकारों, मेडिकल कॉलेजों और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों को एक ही मंच पर डॉक्टरों की जानकारी मिल सकेगी। यूनिक रजिस्ट्रेशन नंबर लागू होने से एक ही डॉक्टर के अलग-अलग राज्यों में होने वाले फर्जी या डुप्लीकेट पंजीकरण समाप्त हो जाएंगे। वर्तमान में जब दूसरे राज्यों के डॉक्टर बिना पंजीकरण के ऑपरेशन या विशेष प्रक्रियाएं करते हैं तो किसी भी अनहोनी की स्थिति में उनकी जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है।



​राजस्थान में यह है चुनौती

​आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में अभी करीब 80 से 82 हजार डॉक्टर पंजीकृत हैं। जब कोई डॉक्टर बिना स्थानीय पंजीकरण के प्रैक्टिस करता है तो काउंसिल के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं होता, जिससे उसकी योग्यता और विशेषज्ञता की जांच करना मुश्किल हो जाता है।



अब आरएमसी ने निजी अस्पतालों से विवरण मांगना शुरू किया है, यह देखा जाएगा कि कितने डॉक्टर सिस्टम की ढील का फायदा उठा रहे हैं।



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