सरकारी खजाने में बरसे करोड़ों, पर गौशालाएं खाली, गौ-सेस के 2864 करोड़ रुपए अटके

Mukesh Sharma | Mar 24, 2026, 17:36 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान का गौ-खजाना भरा हुआ है। लेकिन, अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह पैसा समय पर गायों के काम नहीं आ पा रहा है। समय पर अनुदान नहीं मिलने से गायें दाने के लिए तरस रही हैं।

News In Short

  • राजस्थान में गौशालाओं को समय पर नहीं मिल पा रहा अनुदान।
  • सरकार शराब बिक्री और स्टांप ड्यूटी पर वसूलती है गौ-सेस।
  • सरकार के पास अभी खजाने में 2864 करोड़ रुपये का गौ-सेस जमा।
  • राजस्थान में 3300 से अधिक रजिस्टर्ड गौशालाओं को मिलता है अनुदान।
  • सरकार का दावा, गौशालाओं के लिए मंजूर किया 1115 करोड़ अनुदान।

News In Detail

​Jaipur: राजस्थान में गौवंश के संरक्षण और संवर्धन के नाम पर वसूला जाने वाला गौ-सेस सरकारी खजाने को तो भर रहा है, लेकिन बेसहारा गायों तक यह मदद समय पर नहीं पहुंच पा रही है। हालात यह है कि सरकारी खजाने में गौ-सेस के रूप में 2864 करोड़ 65 लाख 80 हजार रुपए की भारी-भरकम राशि रखी हुई है, लेकिन प्रदेश की हजारों गौशालाएं समय पर अनुदान नहीं मिलने पर एक-एक दाने के लिए तरस रही हैं।



​शराब और स्टाम्प से हुई बंपर कमाई

​राजस्थान में सरकार शराब की बिक्री और स्टाम्प ड्यूटी पर गौ-सेस वसूलती है। वित्तीय वर्ष 2015-16 से 2024-25 के दौरान सरकार ने इस मद में उम्मीद से कहीं अधिक कमाई की है।



सरकार को ​स्टाम्प ड्यूटी से 3607.24 करोड़ रुपये गौ-सेस मिला तो ​शराब की बिक्री से 3517.65 करोड़ रुपये गौ-सेस प्राप्त हुआ। इस तरह गौ-सेस के रूप में सरकार को नौ साल में 7124 करोड़ 89 लाख 42 हजार रुपये की कमाई हुई।



हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी राशि मिलने के बावजूद पांच साल में गौशालाओं को केवल 4260.23 करोड़ रुपये ही अनुदान दिया गया। शेष 2864 करोड़ से अधिक की राशि अभी भी सरकारी खजाने में जमा है।



​अनुदान के लिए तरस रहे संचालक

राजस्थान में नियमों के अनुसार गौशालाओं को प्रत्येक वर्ष 9 माह का अनुदान देने का प्रावधान है। गौशालाओं के संचालकों का कहना है कि उन्हें समय पर अनुदान नहीं मिल पाता है। इससे वे गौशालाओं के लिए न तो पर्याप्त खाखला-तूड़ी खरीद पाते हैं और न ही अन्य व्यवस्था कर सकते हैं। स्थिति यह है कि कई जगह चारे और पोषाहार की भारी कमी हो गई है, जिससे गौवंश के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।



​सड़कों पर गौवंश और बढ़ते हादसे

जब जनता गाय के नाम पर सेस चुकाती है, तो उसकी स्वाभाविक उम्मीद होती है कि सड़कों पर घूमने वाली बेसहारा गायों को आश्रय मिलेगा। लेकिन हकीकत इसके उलट है। बजट होने के बावजूद नई गौशालाओं के निर्माण और पुरानी के विस्तार में सुस्ती बरती जा रही है। इसके कारण सड़कों पर आवारा पशुओं की संख्या बढ़ रही है, जो आए दिन होने वाले सड़क हादसों का मुख्य कारण बन रहे हैं। प्रदेश में 3300 से अधिक रजिस्टर्ड गौशालाओं को अनुदान दिया जाता है। बड़ी गायों के लिए 44 और छोटे गोवंश के लिए 22 रुपये प्रति दिन की दर से सहायता है



आंकड़ों की नजर में 'गौ-सेस' का गणित

विवरण राशि (करोड़ में)


कुल प्राप्ति (9 साल में) 7,124.89 करोड़ रुपये


अनुदान वितरण (5 साल में) 4,260.23 करोड़ रुपये


सरकारी खजाने में शेष राशि 2,864.65 करोड़ रुपये



समाधान की कोशिश या महज आश्वासन?

​पशुपालन और गोपालन विभाग केमंत्री जोराराम कुमावत के अनुसार वर्ष 2025-26 के प्रथम चरण के लिए करीब 3310 गौशालाओं को 1115 करोड़ रुपये का अनुदान ऑनलाइन स्वीकृत किया गया है। शेष पात्र गौशालाओं के आवेदन प्रक्रिया में हैं।



​हकीकत में स्थिति चिंताजनक है। संचालकों का सवाल है कि जब पैसा जनता से वसूला जा चुका है, तो उसे जारी करने में इतनी जटिल कागजी प्रक्रिया और देरी क्यों?



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