प्रशासन में दिखा जवाबदेही का अभाव, आम नागरिक की जिंदगी पर भारी पड़ भ्रष्टाचार

Jinesh Jain | May 23, 2026, 17:40 IST
Photograph: (the sootr)
इस सप्ताह का विश्लेषण साफ करता है कि राजस्थान में चाहे वह सरकार का स्तर हो या स्थानीय प्रशासन का—जवाबदेही का घोर अभाव है। सत्ता पक्ष अपनी सहूलियत के लिए स्थानीय चुनावों को टालना चाहती है। पिंकी मीणा जैसे अधिकारी घूसखोरी के आरोपों के बाद भी बच निकलते हैं।

यह सप्ताह राजस्थान के लिए प्रशासनिक जवाबदेही, न्यायिक हस्तक्षेप, नौकरियों में भ्रष्टाचार और लोक सुरक्षा के मोर्चे पर बेहद गंभीर सवाल खड़े करने वाला रहा है। एक तरफ जहां न्यायपालिका को लोकतांत्रिक संस्थाओं के वजूद को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर सिस्टम की लापरवाही और भ्रष्टाचार आम नागरिक की जिंदगी पर भारी पड़ रहे हैं। आइए, इस हफ्ते की प्रमुख खबरों का सिलसिलेवार और गहराई से विश्लेषण करते हैं।



लोकतंत्र को टालने की कोशिश?

राजस्थान में पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकायों का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद भी चुनाव न कराना प्रदेश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर रहा था। आखिरकार, हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सरकार की टालमटोल की नीति पर विराम लगा दिया है।



एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने सरकार और राज्य चुनाव आयोग की दलीलों को आंशिक रूप से खारिज करते हुए 31 जुलाई 2026 तक प्रदेश में हर हाल में पंचायत-पालिका चुनाव संपन्न कराने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने एक स्पष्ट टाइमलाइन भी तय कर दी है कि 20 जून 2026 तक ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) को अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। इस तिथि के बाद राज्य चुनाव आयोग चुनावी प्रक्रिया को तुरंत आगे बढ़ाएगा।



इससे पहले 14 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट ने 439 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने की डेडलाइन दी थी। सरकार ने इस तय समय सीमा का उल्लंघन किया और चुनाव टालने के लिए संसाधनों की कमी (ईवीएम, स्टाफ, स्कूल) और ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट न आने का बहाना बनाया। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज सिंह देवंदा जैसे नेताओं का यह आरोप काफी हद तक सही प्रतीत होता है कि सरकार पिछले डेढ़ साल से जानबूझकर जमीनी लोकतंत्र को पंगु बना रही थी।



वन स्टेट वन इलेक्शन एक आदर्श विचार हो सकता है, लेकिन इसकी आड़ में स्थानीय निकायों के संवैधानिक कार्यकाल को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाना या वहां नौकरशाही का राज स्थापित करना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। हाईकोर्ट का यह आदेश सरकार के लिए एक बड़ा झटका और पंचायती राज व्यवस्था के लिए संजीवनी है।





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2013 की कनिष्ठ लिपिक भर्ती और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें

राजस्थान में प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों में फर्जीवाड़ा कोई नई बात नहीं है, लेकिन भरतपुर जिला परिषद द्वारा वर्ष 2013 में की गई कनिष्ठ लिपिक (LDC) भर्ती में जो खुलासा हुआ है, उसने पूरे तंत्र को झकझोर कर रख दिया है।



​एक राज्य स्तरीय जांच टीम ने अपनी 65 पन्नों की गोपनीय रिपोर्ट में साफ किया है कि नियमों को पूरी तरह ताक पर रखकर 189 अयोग्य अभ्यर्थियों को नौकरी दे दी गई। ​कमेटी ने अब पंचायती राज विभाग के शासन सचिव को रिपोर्ट सौंपकर इस पूरे मामले की जांच एसओजी से कराने की कड़े शब्दों में सिफारिश की है।



​यह सिर्फ भरतपुर नहीं, पूरे राजस्थान का मर्ज है। ​जांच का दायरा जैसे-जैसे बढ़ रहा है, संक्रमण की गहराई साफ होती जा रही है। ​जयपुर और अलवर में कई लिपिकों के दस्तावेज फर्जी पाए गए हैं। बीकानेर में तो हद ही हो गई, वर्ष 2017 में ही 49 फर्जी लिपिकों की सेवाएं समाप्त की जानी थीं। लेकिन ऊपर तक पहुंच के कारण उन्हें 9 साल बाद (2026 तक) भी नहीं हटाया गया।



​2013 की भर्ती का घोटाला 2026 में खुलकर सामने आना यह बताता है कि राजस्थान का प्रशासनिक अमला भ्रष्ट तत्वों को बचाने में कितना माहिर है। इतने सालों तक अयोग्य लोग सरकारी वेतन उठाते रहे और योग्य युवा सड़कों पर ठोकरें खाते रहे। एसओजी को सौंपे जाने के बाद उम्मीद है कि न सिर्फ फर्जी अभ्यर्थी बाहर होंगे, बल्कि उन अधिकारियों को भी जेल भेजा जाएगा जिन्होंने अपनी जेबें गरम करके इन फाइलों पर दस्तखत किए थे



​पिंकी मीणा केस: 5 साल बाद निलंबन रद्द, लेकिन भ्रष्टाचार के दाग बरकरार

दौसा के बहुचर्चित दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे घूसकांड की मुख्य आरोपी और निलंबित RAS अधिकारी पिंकी मीणा को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जस्टिस सुदेश बंसल की बेंच ने उनके निलंबन आदेश पर रोक लगा दी है।



​पिंकी मीणा 15 जनवरी 2021 से (पिछले 5 वर्षों से) लगातार निलंबित चल रही थीं। कोर्ट का कहना था कि ​इस केस के सह-आरोपी आरएएस अधिकारी पुष्कर मित्तल का निलंबन कोर्ट पहले ही स्थगित कर चुका है, इसलिए समानता के अधिकार के तहत पिंकी मीणा को भी यह राहत मिलनी चाहिए।



निलंबन समीक्षा समिति ने सस्पेंशन को जारी रखने का कोई ठोस और तार्किक कारण नहीं बताया। ​आरोपी अधिकारी को घटना के 5 साल बाद चार्जशीट दी गई, जो सेवा नियमों के खिलाफ और प्रशासनिक सुस्ती का सटीक उदाहरण है।


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चूंकि एसीबी की जांच पूरी हो चुकी है, कोर्ट में चालान पेश हो चुका है और अभियोजन स्वीकृति मिल चुकी है, इसलिए अब उनके पद पर लौटने से गवाहों या सबूतों के प्रभावित होने का कोई खतरा नहीं है। ​जनवरी 2021 में एसीबी ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए बांदीकुई की तत्कालीन एसडीएम पिंकी मीणा को 10 लाख रुपए और दौसा के तत्कालीन एसडीएम पुष्कर मित्तल को 5 लाख रुपए की रिश्वत मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया था। यह रिश्वत दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे बना रही कंपनी से निर्माण में आ रही बाधाएं दूर करने के नाम पर मांगी गई थी।



​यह मामला हमारी न्याय प्रणाली और प्रशासनिक जांच की कछुआ चाल को उजागर करता है। यदि कोई अधिकारी रंगे हाथों या पुख्ता सबूतों के साथ रिश्वत के मामले में पकड़ा जाता है, तो उसे चार्जशीट देने में 5 साल का समय क्यों लगा? इस प्रशासनिक ढिलाई का फायदा अंततः आरोपियों को मिलता है। भले ही कोर्ट ने तकनीकी और कानूनी आधार पर निलंबन रद्द कर दिया हो, लेकिन जनता की नजरों में ब्यूरोक्रेसी की साख को जो बट्टा लगा है, उसकी भरपाई नामुमकिन है।





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खुले नाले में रिटायर्ड प्रिंसिपल की मौत

​कोटा के बोरखेड़ा-थेकड़ा लिंक रोड पर एक खुले नाले ने एक और हंसते-खेलते परिवार को तबाह कर दिया। झाड़ गांव स्थित स्कूल से महज दो महीने पहले सेवानिवृत्त हुए प्रिंसिपल रामेश्वर रावत अपने परिचितों को रिटायरमेंट की पार्टी देकर लौट रहे थे। गोकुल कॉलोनी के पास सड़क किनारे एक खुला नाला था, जिसमें सुरक्षा के कोई इंतजाम (बैरिकेडिंग या रिफ्लेक्टर) नहीं थे। उनकी बाइक अनियंत्रित होकर नाले में गिर गई और वह पूरी रात मोटरसाइकिल के नीचे दबे रहे, जिससे उनकी दर्दनाक मौत हो गई। अगले दिन सुबह पुलिस ने क्रेन की मदद से उनका शव बाहर निकाला।



हादसे के बाद जब जनता का आक्रोश फूटा, तो नवगठित कोटा विकास प्राधिकरण (KDA) हरकत में आया। परिजनों का यह आरोप शत-प्रतिशत सच है कि शहर में जगह-जगह खुले पड़े नाले और उखड़ी सड़कें आए दिन जानलेवा हादसों को निमंत्रण दे रही हैं।



केडीए ने तीन इंजीनियरों को सस्पेंड करके और ठेकेदार पर जुर्माना लगाकर अपनी पीठ भले ही थपथपा ली हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई रामेश्वर रावत को वापस ला सकती है? यह थप्पड़ मारकर मलाई खिलाने जैसा रवैया है। जब तक किसी नागरिक की जान नहीं जाती, तब तक हमारे यूआईटी या विकास प्राधिकरण गहरी नींद से क्यों नहीं जागते? दुर्घटना से पहले प्रिवेंटिव मेंटेनेंस क्यों नहीं किया जाता?





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रसूखदारों की हिट एंड रन

अजमेर के पुष्कर घाटी में 18 मई को एक बेहद दर्दनाक हादसा हुआ। एक तेज रफ्तार फॉर्च्यूनर कार ने सामने से आ रही तीन बाइकों को बेरहमी से कुचल दिया। इस हादसे में धोलाभाटा निवासी 34 वर्षीय रवि कुमार की मौके पर ही मौत हो गई, जो अपनी मां और चार बहनों का इकलौता सहारा थे। वह कलर-पेंट का काम करके घर चलाते थे। हादसे के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।



प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस जांच के अनुसार दुर्घटनाग्रस्त फॉर्च्यूनर कार का रजिस्ट्रेशन खाटू श्याम मंदिर कमेटी के नाम पर है। सीसीटीवी फुटेज में कार पुष्कर की तंग गलियों में बेहद खतरनाक रफ्तार से दौड़ती हुई दिखाई दे रही है। दुर्घटना के बाद कार में से शराब की बोतलें बरामद हुई हैं, जो यह साफ करती हैं कि गाड़ी में सवार लोग नशे में धुत थे।



​इस पूरे मामले में पुष्कर पुलिस की भूमिका बेहद संदिग्ध और गैर-जिम्मेदाराना रही है। ​कार चला रहा खाटू श्याम मंदिर समिति का सेवादार दिग्विजय सिंह पुलिस को मौके पर ही घायल अवस्था में मिला था। पुलिस उसे जेएलएन अस्पताल ले गई। ​अस्पताल में कुछ लोगों द्वारा आरोपी को पहचान लेने के बाद पुलिस बिना इलाज पूरा कराए या उसे हिरासत में लिए ही वापस ले आई।


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इसके बाद आरोपी दिग्विजय सिंह अस्पताल से रहस्यमय तरीके से गायब हो गया। अब पुलिस उसे ढूंढने का नाटक कर रही है और उसके तीन साथी मौके से ही फरार हो गए थे। ​पुलिस ने अब खाटू श्याम मंदिर समिति के अध्यक्ष शक्तिसिंह चौहान को नोटिस थमाया है, लेकिन मुख्य आरोपी का पुलिस की नाक के नीचे से गायब हो जाना एक गंभीर मिलीभगत की ओर इशारा करता है।



​यह मामला सीधे तौर पर रसूख और रक्षक के गठजोड़ का उदाहरण है। एक गरीब पेंटर की जान चली जाती है, उसका परिवार अनाथ हो जाता है, और पुलिस एक ऐसे आरोपी को भागने का मौका दे देती है जो खुद उनकी कस्टडी में था। धार्मिक कमेटियों के नाम पर रजिस्टर्ड गाड़ियों का इस तरह दुरुपयोग और पुलिस की यह ढिलाई राजस्थान की कानून-व्यवस्था की साख पर एक बड़ा धब्बा है। इस मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए कि आखिर दिग्विजय सिंह को अस्पताल से भगाने में किन अधिकारियों का हाथ था।



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