नीट पेपर लीक से हिल गया पूरा सिस्टम, चिकित्सा व्यवस्था की संवेदनहीनता का कोटा मॉडल
Jinesh Jain | May 16, 2026, 19:38 IST
Photograph: (the sootr)
यह हफ्ता राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए वेक-अप कॉल (चेतावनी) है। नीट पेपर लीक और कोटा अस्पताल की घटनाएं बताती हैं कि जब तक हमारे बुनियादी ढांचे में बैठे छोटे और मध्यम स्तर के कीड़े साफ नहीं होंगे, तब तक व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी नहीं हो सकती।
Jaipur: राजस्थान के सियासी और प्रशासनिक गलियारों के लिए यह हफ्ता महज तारीखों का बदलना भर नहीं था, बल्कि यह उन परतों के उखड़ने का दौर था जो सत्ता, पैसे और रसूख के गठजोड़ से बनाई गई थीं। देश की सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा प्रवेश परीक्षा नीट का कलंक राजस्थान के कोचिंग हब सीकर से जुड़ना हो या जल जीवन मिशन (JJM) के बहाने बहती भ्रष्टाचार की गंगा में एक और रसूखदार का डूबना, कुछ दिनों की घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक तंत्र में अंदरकरंट बहुत तेज है।
एक तरफ जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्रीय और राज्य की जांच एजेंसियां डंडा चला रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कोटा के सरकारी अस्पतालों से आई प्रसूताओं की मौतों ने व्यवस्था के मानवीय चेहरे को बेनकाब कर दिया है। आइए, इस हफ्ते की चार सबसे बड़ी कड़ियों को जोड़कर राजस्थान के इस प्रशासनिक और राजनीतिक परिदृश्य का बारीक विश्लेषण करते हैं।
राजस्थान के कोचिंग हब सीकर में फल-फूल रहे नकल माफिया ने देश के लाखों होनहार छात्रों के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया। 3 मई 2026 को हुई NEET UG परीक्षा को निरस्त कर पेपर लीक की जांच सीबीआई (CBI) को सौंपना इस बात का प्रमाण है कि इस बार धांधली के सबूत इतने पुख्ता थे कि सरकार के पास बचाव का कोई रास्ता नहीं बचा था।
जयपुर के जमवारामगढ़ का बिंवाल परिवार इस पूरे पेपर लीक नेक्सस का मुख्य केंद्र बनकर उभरा है। सीबीआई ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए मांगीलाल बिंवाल, दिनेश बिंवाल और मांगीलाल के पुत्र को गिरफ्तार किया है। पिछले 4-5 वर्षों से इस परिवार ने सीकर को अपना ठिकाना बना लिया था। परिवार के 5 बच्चों को कथित तौर पर नीट पास कराकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दिलवाया गया। इस साल का टारगेट दिनेश बिंवाल का बेटा ऋषि बिंवाल था, जो एकेडमिक्स में इतना कमजोर था कि 12वीं भी ग्रेस मार्क्स से पास की थी।
एसओजी (SOG) और सीबीआई की जांच में यह साफ हुआ है कि यह नेटवर्क सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं था। व्हाट्सएप ग्रुप की कड़ियां खंगालने पर पता चला कि बिंवाल परिवार को यह पेपर गुरुग्राम के यश यादव से मिला था। वहीं, महाराष्ट्र से गिरफ्तार हुआ एक प्रोफेसर, जो एनटीए (NTA) के परीक्षा कार्यक्रम का हिस्सा था, इस बात की पुष्टि करता है कि सेंधमारी बाहर से नहीं, बल्कि सिस्टम के बिल्कुल अंदर से हुई थी।
अब यह परीक्षा जून में ऑनलाइन यानी कम्प्यूटर आधारित माध्यम से होगी। एनटीए ने छात्रों का डेटा बरकरार रखने की बात तो कही है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ऑफलाइन परीक्षा में फेल रहने वाला तंत्र क्या एक महीने के भीतर पूरी तरह पारदर्शी ऑनलाइन परीक्षा आयोजित कराने के लिए ढांचागत रूप से तैयार है?
राजस्थान का चर्चित 900 करोड़ रुपए का जल जीवन मिशन (JJM) घोटाला अब अपने अंजाम की ओर बढ़ रहा है। राजस्थान भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने इस हफ्ते सबसे बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए पूर्व जलदाय मंत्री महेश जोशी के सबसे करीबी संजय बड़ाया को दिल्ली एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लिया।
संजय बड़ाया का इतिहास ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक रसूख के गलत इस्तेमाल की सबसे सटीक केस-स्टडी है। बड़ाया की वर्ष 2022 तक एक इंश्योरेंस कंपनी में महज 7 लाख रुपए सालाना की नौकरी थी। वर्ष 2026 तक आते-आते वह चमत्कारेश्वर बिल्डर एंड डेवलपर नाम की कंपनी बनाकर करोड़ों का मालिका बन गया।
बड़ाया कोई साधारण बिचौलिया नहीं था। वह पूर्व मंत्री महेश जोशी और पूर्व IAS सुबोध अग्रवाल (जो पहले से जेल में हैं) के बीच की कड़ी था। ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर नए ठेकेदारों को जोड़ना और टेंडरों में टेक्निकल गड़बड़ियां करवाकर ब्लैक मनी को ठिकाने लगाना बड़ाया का मुख्य काम था।
बड़ाया को लगा था कि वह थाईलैंड में एक शादी समारोह का लुत्फ उठाकर आराम से लौट आएगा, लेकिन एसीबी ने उसके खिलाफ 10 मई को ही लुकआउट नोटिस जारी कर दिया था। रविवार रात 2 बजे जैसे ही उसने दिल्ली एयरपोर्ट पर पैर रखा, इमीग्रेशन ब्यूरो की सूचना पर एसीबी ने उसे दबोच लिया। अदालत ने महेश जोशी को 19 मई तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया है, जबकि बड़ाया से राज उगलवाने के लिए 3 दिन का रिमांड दिया है। इस मामले में अभी भी 3 आरोपी फरार हैं, जिनकी गिरफ्तारी के बाद कई अन्य बड़े नाम सामने आ सकते हैं।
एक तरफ राजस्थान अपनी चिकित्सा सुविधाओं का ढिंढोरा पीटता है, वहीं लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के निर्वाचन क्षेत्र कोटा से आई तस्वीरें रूह कंपा देने वाली हैं। जेकेलोन और संबंधित अस्पतालों में प्रसूतओं की कुल मौतों का आंकड़ा 4 तक पहुंच गया है।
इस पूरी त्रासदी में सबसे शर्मनाक पहलू चिकित्सा प्रशासन का रवैया रहा है। मौतों के बाद जब हंगामा बढ़ा, तो जेकेलोन अस्पताल के ओटी (ऑपरेशन थिएटर) और वार्ड का ड्यूटी रजिस्टर ही गायब कर दिया गया। यह सीधे तौर पर सुबूतों को नष्ट करने और अपनी चमड़ी बचाने की कोशिश है। डॉक्टरों और स्टाफ को मीडिया से बात न करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।
अस्पताल के भीतर फैले इस जानलेवा संक्रमण (Hospital Acquired Infection) की जिम्मेदारी लेने के बजाय प्रशासन का शुतुरमुर्गी रवैया यह दिखाता है कि यहां मरीजों की जान की कीमत कागजों से भी कम है।
भिवाड़ी के खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र से इस हफ्ते एक बड़ी और नजीर पेश करने वाली खबर आई। रीको के चेयरमैन शिखर अग्रवाल ने एक फैसला सुनाते हुए थापर कॉन्कास्ट लिमिटेड की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें वे अपनी रद्द की गई 69,130 वर्गमीटर की बेशकीमती जमीन को बहाल कराना चाहते थे।
इस मामले की क्रोनोलॉजी को समझना बेहद जरूरी है। वर्ष 1993 में थापर कॉन्कास्ट को महज 20 रुपए प्रति वर्गमीटर की दर से यह विशाल भूखंड अलॉट हुआ था। कंपनी को तय समय सीमा में औद्योगिक इकाई स्थापित कर उत्पादन शुरू करना था।
कंपनी ने 15 साल तक (2008 में स्टे आने तक) जमीन पर एक ईंट भी नहीं रखी और मामले को अदालती मुकदमों में उलझाए रखा। इस भूखंड की कीमत आज 100 करोड़ रुपए से अधिक है।
सुनवाई के दौरान कंपनी ने 'एमनेस्टी स्कीम-2023' के तहत बकाया शुल्क जमा करने की दुहाई दी। लेकिन रीको प्रबंधन ने साफ कर दिया कि छूट योजनाएं समयबद्ध होती हैं और उनका उपयोग केवल जमीन को 'होल्ड' करके मुनाफा कमाने (Speculative Holding) के लिए नहीं किया जा सकता।
दिलचस्प बात यह है कि रीको के ही कुछ भीतरखाने के अधिकारी इस 100 करोड़ की जमीन को गुपचुप तरीके से इसी कंपनी को वापस सौंपने की डीलिंग कर रहे थे। लेकिन जब यह फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय और एसीबी की रडार पर आई तो बैकफुट पर आए प्रशासन को नियमों के तहत सख्त फैसला लेना पड़ा।
राजस्थान का वन विभाग एक बार फिर भ्रष्टाचार के दलदल में घिर गया है। सरिस्का टाइगर रिजर्व (Sariska Tiger Reserve) के बफर जोन और अलवर के वानिकी कार्यों में हुए करोड़ों के घपले की जांच के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) पवन कुमार उपाध्याय ने एक उच्च स्तरीय दो सदस्यीय कमेटी का गठन किया है। इस मामले की शुरुआत जयपुर के कारोबारी कमलेंद्र सिंह की शिकायत से हुई, जो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को भेजी गई थी। कमलेंद्र सिंह ने अपनी शिकायत के साथ 1 करोड़ रुपए का एक चेक भी अटैच किया और कहा कि अगर मेरी शिकायत झूठी निकले, तो सरकार इस 1 करोड़ के चेक को तुरंत जब्त कर ले। इस अनोखी और आक्रामक शिकायत ने दिल्ली से लेकर जयपुर सचिवालय तक हड़कंप मचा दिया।
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एक तरफ जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्रीय और राज्य की जांच एजेंसियां डंडा चला रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कोटा के सरकारी अस्पतालों से आई प्रसूताओं की मौतों ने व्यवस्था के मानवीय चेहरे को बेनकाब कर दिया है। आइए, इस हफ्ते की चार सबसे बड़ी कड़ियों को जोड़कर राजस्थान के इस प्रशासनिक और राजनीतिक परिदृश्य का बारीक विश्लेषण करते हैं।
सीकर मॉडल से खुला पेपर लीक का नेटवर्क
जयपुर के जमवारामगढ़ का बिंवाल परिवार इस पूरे पेपर लीक नेक्सस का मुख्य केंद्र बनकर उभरा है। सीबीआई ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए मांगीलाल बिंवाल, दिनेश बिंवाल और मांगीलाल के पुत्र को गिरफ्तार किया है। पिछले 4-5 वर्षों से इस परिवार ने सीकर को अपना ठिकाना बना लिया था। परिवार के 5 बच्चों को कथित तौर पर नीट पास कराकर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दिलवाया गया। इस साल का टारगेट दिनेश बिंवाल का बेटा ऋषि बिंवाल था, जो एकेडमिक्स में इतना कमजोर था कि 12वीं भी ग्रेस मार्क्स से पास की थी।
एसओजी (SOG) और सीबीआई की जांच में यह साफ हुआ है कि यह नेटवर्क सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं था। व्हाट्सएप ग्रुप की कड़ियां खंगालने पर पता चला कि बिंवाल परिवार को यह पेपर गुरुग्राम के यश यादव से मिला था। वहीं, महाराष्ट्र से गिरफ्तार हुआ एक प्रोफेसर, जो एनटीए (NTA) के परीक्षा कार्यक्रम का हिस्सा था, इस बात की पुष्टि करता है कि सेंधमारी बाहर से नहीं, बल्कि सिस्टम के बिल्कुल अंदर से हुई थी।
अब यह परीक्षा जून में ऑनलाइन यानी कम्प्यूटर आधारित माध्यम से होगी। एनटीए ने छात्रों का डेटा बरकरार रखने की बात तो कही है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ऑफलाइन परीक्षा में फेल रहने वाला तंत्र क्या एक महीने के भीतर पूरी तरह पारदर्शी ऑनलाइन परीक्षा आयोजित कराने के लिए ढांचागत रूप से तैयार है?
थाईलैंड की शादी से दिल्ली एयरपोर्ट और फिर सीधे हवालात
संजय बड़ाया का इतिहास ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक रसूख के गलत इस्तेमाल की सबसे सटीक केस-स्टडी है। बड़ाया की वर्ष 2022 तक एक इंश्योरेंस कंपनी में महज 7 लाख रुपए सालाना की नौकरी थी। वर्ष 2026 तक आते-आते वह चमत्कारेश्वर बिल्डर एंड डेवलपर नाम की कंपनी बनाकर करोड़ों का मालिका बन गया।
बड़ाया कोई साधारण बिचौलिया नहीं था। वह पूर्व मंत्री महेश जोशी और पूर्व IAS सुबोध अग्रवाल (जो पहले से जेल में हैं) के बीच की कड़ी था। ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर नए ठेकेदारों को जोड़ना और टेंडरों में टेक्निकल गड़बड़ियां करवाकर ब्लैक मनी को ठिकाने लगाना बड़ाया का मुख्य काम था।
बड़ाया को लगा था कि वह थाईलैंड में एक शादी समारोह का लुत्फ उठाकर आराम से लौट आएगा, लेकिन एसीबी ने उसके खिलाफ 10 मई को ही लुकआउट नोटिस जारी कर दिया था। रविवार रात 2 बजे जैसे ही उसने दिल्ली एयरपोर्ट पर पैर रखा, इमीग्रेशन ब्यूरो की सूचना पर एसीबी ने उसे दबोच लिया। अदालत ने महेश जोशी को 19 मई तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया है, जबकि बड़ाया से राज उगलवाने के लिए 3 दिन का रिमांड दिया है। इस मामले में अभी भी 3 आरोपी फरार हैं, जिनकी गिरफ्तारी के बाद कई अन्य बड़े नाम सामने आ सकते हैं।
ChatGPT Image May 16, 2026, 07_04_44 PM
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अस्पताल के भीतर फैले इस जानलेवा संक्रमण (Hospital Acquired Infection) की जिम्मेदारी लेने के बजाय प्रशासन का शुतुरमुर्गी रवैया यह दिखाता है कि यहां मरीजों की जान की कीमत कागजों से भी कम है।
32 साल बाद थापर कॉन्कास्ट से जमीन वापस
इस मामले की क्रोनोलॉजी को समझना बेहद जरूरी है। वर्ष 1993 में थापर कॉन्कास्ट को महज 20 रुपए प्रति वर्गमीटर की दर से यह विशाल भूखंड अलॉट हुआ था। कंपनी को तय समय सीमा में औद्योगिक इकाई स्थापित कर उत्पादन शुरू करना था।
कंपनी ने 15 साल तक (2008 में स्टे आने तक) जमीन पर एक ईंट भी नहीं रखी और मामले को अदालती मुकदमों में उलझाए रखा। इस भूखंड की कीमत आज 100 करोड़ रुपए से अधिक है।
सुनवाई के दौरान कंपनी ने 'एमनेस्टी स्कीम-2023' के तहत बकाया शुल्क जमा करने की दुहाई दी। लेकिन रीको प्रबंधन ने साफ कर दिया कि छूट योजनाएं समयबद्ध होती हैं और उनका उपयोग केवल जमीन को 'होल्ड' करके मुनाफा कमाने (Speculative Holding) के लिए नहीं किया जा सकता।
दिलचस्प बात यह है कि रीको के ही कुछ भीतरखाने के अधिकारी इस 100 करोड़ की जमीन को गुपचुप तरीके से इसी कंपनी को वापस सौंपने की डीलिंग कर रहे थे। लेकिन जब यह फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय और एसीबी की रडार पर आई तो बैकफुट पर आए प्रशासन को नियमों के तहत सख्त फैसला लेना पड़ा।
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