टेक्सटाइल यूनिटों में बंधक बनाए गए थे मासूम; 12 घंटे कराया जाता था जानलेवा काम
News In Short
- राजस्थान पुलिस और गुजरात पुलिस ने NCPCR के साथ मिलकर सूरत में बाल श्रम नेटवर्क किया ध्वस्त।
- बच्चों को बिना किसी छुट्टी के रोजाना 12-12 घंटे बंधक बनाकर काम कराया जाता था।
- मुक्त कराए गए बच्चों में सबसे ज्यादा उदयपुर के आदिवासी इलाकों के, इनमें 7 साल का मासूम भी।
- गायत्री सेवा संस्थान की गुप्त सूचना पर राजस्थान पुलिस, गुजरात पुलिस और NCPCR ने की रेड।
- खतरनाक मशीनें चलवाने और गुलामों के जैसे काम कराने के आरोप में 27 फैक्ट्री संचालकों पर FIR दर्ज।
News In Detail
राजस्थान के आदिवासी अंचलों से मासूमों को बहला-फुसलाकर पड़ोसी राज्य गुजरात के कारखानों में झोंकने वाले अंतरराज्यीय बाल श्रम माफिया के खिलाफ पुलिस ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई की है। सूरत की तंग गलियों में चल रही कपड़ा और पैकेजिंग यूनिटों में जब सुरक्षा एजेंसियां दाखिल हुईं, तो वहां का अमानवीय मंजर देखकर अधिकारियों की आंखें भी नम हो गईं।
संकरे कमरों में कैद था बचपन, कटर मशीनों से कट रहे थे धागे
सूरत की सीताराम और मुक्तिधाम सोसाइटी की फैक्ट्रियों में जब 22 आला अधिकारियों की स्पेशल टीम ने छापा मारा, तो वहां भयानक स्थितियां मिलीं। अंधेरे और संकरे कमरों में छोटे-छोटे बच्चों से साड़ियों के तीखे धागे कटवाए जा रहे थे और उनसे खतरनाक कटर मशीनें चलवाई जा रही थीं।
रेड के दौरान वहां मौजूद महज 7 साल का एक मासूम बिना शर्ट के डर से कांपता हुआ मिला, जो पुलिस को देखते ही रो पड़ा और खुद को छुपाने की कोशिश करने लगा। मुक्त कराए गए बच्चों में दो सगे भाई (उम्र 8 और 10 वर्ष) भी शामिल हैं।
सूरत घुमाने का लालच और 4 साल से परिवार से दूरी
प्राथमिक जांच में सामने आया कि इन मासूमों को सूरत शहर घुमाने और अच्छी नौकरी-पढ़ाई का झांसा देकर लाया गया था। यहां लाते ही उन्हें बंधक बना लिया गया। इन बच्चों से बिना किसी साप्ताहिक अवकाश के रोजाना 12 से 14 घंटे तक केमिकल और जहरीले धुएं के बीच काम लिया जा रहा था। कई बच्चे तो पिछले तीन-चार साल से अपने माता-पिता की शक्ल तक नहीं देख पाए थे।
फैक्ट्री मालिकों की दलीलें खारिज, 27 पर मुकदमा दर्ज
पुणागाम थाना पुलिस ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए 27 टेक्सटाइल और पैकेजिंग यूनिटों के मालिकों के खिलाफ गंभीर और गैर-जमानती धाराओं में नामजद केस दर्ज किया है।
कार्रवाई के दौरान यूनिट संचालकों ने दलील दी कि वे बच्चों के माता-पिता की मर्जी और उन्हें एडवांस पैसे देकर लाए हैं। हालांकि, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और पुलिस ने साफ कर दिया कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों से ऐसा जानलेवा काम करवाना कानूनन संगीन अपराध है और इसमें कोई ढील नहीं दी जाएगी।
माफिया का सॉफ्ट टारगेट और आगामी कार्रवाई
बाल अधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, उदयपुर के कोटड़ा, झाड़ोल और खेरवाड़ा जैसे आदिवासी क्षेत्रों में फैली भीषण गरीबी और स्कूलों में बढ़ता ड्रॉपआउट रेट (पढ़ाई छोड़ना) ही इस समस्या की मुख्य वजह है। लोकल एजेंट इसी का फायदा उठाकर अनपढ़ परिवारों को निशाना बनाते हैं।
फिलहाल सभी 91 बच्चों को सुरक्षित शेल्टर होम्स (बाल सुधार गृह) भेजकर उनकी काउंसलिंग की जा रही है। पुणागाम थाना प्रभारी वी.एम. देसाई ने बताया कि फैक्ट्रियों पर केस दर्ज करने के बाद अब उन मुख्य दलालों और एजेंटों की लिस्ट बनाई जा रही है जो गांवों से बच्चों की सप्लाई करते थे, जल्द ही पूरे नेटवर्क की गिरफ्तारियां होंगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सूरत में रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान कुल कितने बच्चे मुक्त कराए गए?
इस ऑपरेशन में कुल 91 बच्चों को बाल श्रम के दलदल से मुक्त कराया गया है, जिनमें सबसे ज्यादा बच्चे राजस्थान के उदयपुर जिले के आदिवासी क्षेत्रों के हैं।
बच्चों को किस तरह के काम में झोंका गया था?
बच्चों को सूरत की टेक्सटाइल और पैकेजिंग यूनिटों में साड़ियों के तीखे धागे काटने, केमिकल के बीच रहने और खतरनाक कटर मशीनें चलाने के काम में बंधक बनाकर रखा गया था।
बाल श्रम करवाने वाले संचालकों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है?
पुणागाम थाना पुलिस ने 27 फैक्ट्री मालिकों के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज की है। मुक्त कराए गए बच्चों को पुनर्वास के लिए शेल्टर होम भेजा गया है और मुख्य एजेंटों की गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं।
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