जीरा-सौंफ पर छिड़ी ब्रांडिंग की जंग, ऊंझा GI पर क्यों भड़के राजस्थान के किसान?
भारतीय रसोई की जान जीरा और सौंफ को लेकर राजस्थान और गुजरात के बीच विवाद खड़ा हो गया है। झगड़ा जीरे या सौंफ के स्वाद को लेकर नहीं, बल्कि इनके भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) को लेकर है।
हाल ही में चेन्नई स्थित जीआई रजिस्ट्री ने गुजरात के मेहसाणा की ऊंझा कृषि उपज मंडी समिति के नाम पर ऊंझा जीरा और ऊंझा सौंफ को जीआई टैग दिया है।
इस फैसले से राजस्थान के किसान आक्रोशित हो उठे हैं। इन किसानों का सीधा सवाल है- खेती हम करें तो ब्रांडिंग का हक सिर्फ एक व्यापारिक मंडी को कैसे मिल सकता है।
जीरा हम उगाते हैं, ऊंझा तो सिर्फ मंडी
राजस्थान में बाड़मेर की शिव तहसील के उंडू गांव की रहने वाली 30 वर्षीय किसान चंपा चौधरी का गुस्सा इस विवाद की असली वजह साफ बयां करता है। चंपा 70 बीघा जमीन पर जीरे की खेती करती हैं। वह मरु लक्ष्मी जीरा फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी की डायरेक्टर भी हैं।
चंपा का कहना है कि जीरा की खेती हम करते हैं। ऊंझा तो सिर्फ मंडी है। जब ऊंझा और उसके आसपास जीरा उगता ही नहीं तो ऊंझा जीरा नाम का जीआई टैग कैसे दिया जा सकता है?
चंपा का यह दावा हवा-हवाई नहीं है। गुजरात सरकार के खुद के आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक:
गुजरात में जीरे का कुल रकबा 4,76,537 हेक्टेयर था। इसमें से मेहसाणा जिले (जहां ऊंझा है) में महज 174 हेक्टेयर में जीरा बोया गया। राज्य के कुल 4.07 लाख टन जीरा उत्पादन में मेहसाणा की हिस्सेदारी मात्र 149 टन थी।
इसके विपरीत राजस्थान देश का सबसे बड़ा जीरा उत्पादक राज्य है। इसने 2024-25 में 6.89 लाख टन जीरे का उत्पादन किया, जबकि गुजरात का कुल उत्पादन 4.72 लाख टन था।
किसानों का कहना है कि हम अपनी उपज को बेहतर दामों के लिए ऊंझा मंडी भेजते हैं, क्योंकि वहां बड़े निर्यातक और खरीदार बैठते हैं।
किसानों को डर है कि इस जीआई टैग के बाद व्यापारी उनके जीरे को निम्न गुणवत्ता का बताकर दाम गिराएंगे। ऊंझा के नाम पर प्रीमियम वसूलेंगे।
आबू सौंफ के जनक को भी झटका
यह विवाद सिर्फ जीरे तक सीमित नहीं है। सौंफ की खेती करने वाले किसान भी इस फैसले से आहत हैं।
सिरोही जिले के कछोली गांव के 55 वर्षीय किसान इसहाक अली ने सालों की मेहनत के बाद आबू सौंफ-440 किस्म विकसित की थी। यह किस्म पूरे सिरोही क्षेत्र के 5,000 हेक्टेयर में उगाई जाती है। वह अपनी खास महक व मोटे हरे दानों के लिए जानी जाती है।
इसहाक अली कहते हैं, मेरी सौंफ बाजार में 300 से 500 रुपए प्रति किलो तक बिकती है। जब हमने अपनी मेहनत से पहचान बनाई, तो एक एपीएमसी (मंडी) के नाम पर जीआई टैग देकर हमारी स्थानीय पहचान को क्यों दबाया जा रहा है?
आखिर क्या होता है जीआई टैग?
इस पूरे विवाद को गहराई से समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि जीआई टैग (GI Tag)
आखिर है क्या, इसे क्यों दिया जाता है।
जीआई यानी भौगोलिक संकेत एक ऐसा कानूनी अधिकार है, जो किसी खास भौगोलिक क्षेत्र (शहर, राज्य या क्षेत्र) में पैदा होने वाली या बनने वाली वस्तु को दिया जाता है।
उत्पाद की खास गुणवत्ता, स्वाद, प्रतिष्ठा या विशेषताएं अनिवार्य रूप से उसी क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी और पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी होनी चाहिए।
जीआई का मकसद मूल उत्पादकों और किसानों के हितों की रक्षा करना है, जिससे कोई बाहरी व्यक्ति या नकली ब्रांड उनके नाम का गलत फायदा न उठा सके।
मिसाल के रूप में दार्जिलिंग चाय, नागपुर का संतरा, बीकानेरी भुजिया, बनारसी साड़ी और गिर केसर आम को लिया जा सकता है।
ऊंझा मंडी का बचाव और विशेषज्ञों का एतराज
ऊंझा मंडी समिति (APMC) के अध्यक्ष दिनेश पटेल इस जीआई टैग का बचाव करते हैं। उनका तर्क है कि ऊंझा जीरे की खेती का अग्रदूत रहा है।
भले ही आज रकबा कम हो गया हो और बीज दूसरी जगहों पर चले गए हों, लेकिन मूल उत्पत्ति यहीं की है। इसलिए नाम पर अधिकार भी इसी क्षेत्र का है।
उन्होंने बताया कि यह टैग 1,000 से अधिक पन्नों के वैज्ञानिक दस्तावेजों और गुजरात कृषि विश्वविद्यालयों के सत्यापन के बाद मिला है।
लेकिन कृषि मामलों के विशेषज्ञ इस तर्क को खारिज करते हैं। साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर जोधपुर के संस्थापक-निदेशक भागीरथ चौधरी का कहना है कि जीआई सुरक्षा किसी उत्पाद के उत्पादन स्थल पर आधारित होनी चाहिए।
ऊंझा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ट्रेडिंग हब है, उत्पादन केंद्र नहीं है। वहां बिकने वाले अधिकांश मसालों की पैदावार तो राजस्थान की मिट्टी में होती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जीआई रजिस्ट्री को फैसला सुनाने से पहले राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र अजमेर जैसे वैज्ञानिक संस्थानों से स्वतंत्र जांच करानी चाहिए थी।
राजस्थान बनाम गुजरात: आंकड़ों की जुबानी
क्या राजस्थान कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा?
ऊंझा जीरा के जीआई टैग का भौगोलिक दायरा कागजों में मेहसाणा के अलावा गुजरात के 14 अन्य जिलों तक फैला दिया गया है। लेकिन सीमा पार राजस्थान के पड़ोसी जिलों बाड़मेर, सिरोही, और जालौर को इससे पूरी तरह बाहर रखा गया है।
राजस्थान के किसान संगठनों और कृषक उत्पादक कंपनियों का कहना है कि यह उनके अधिकारों का हनन है। यदि इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो वे जीआई रजिस्ट्री के फैसले को चुनौती देने से पीछे नहीं हटेंगे।
फिलहाल, इस मसाला वॉर ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या व्यापार का रुतबा पसीने की खेती पर भारी पड़ सकता है?
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