शिक्षिका की अवैध बर्खास्तगी पर हाई कोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर किया 20 लाख
समझें क्या है पूरा मामला
- महिला शिक्षक की अवैध बर्खास्ती पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।
- अवैध सेवा समाप्ति पर कड़ा रुख अपनाया।
- 20 साल की सेवा और अचानक बर्खास्तगी।
- ट्रिब्यूनल के 1 लाख के मुआवजे को बताया नाकाफी।
- दो महीने में 9% ब्याज की शर्त के साथ भुगतान का निर्देश।
राजस्थान हाई कोर्ट ने 20 साल से ज्यादा समय तक सेवा देने वाली एक महिला शिक्षक को गैर-कानूनी तरीके से नौकरी से हटाने के मामले में मुआवजा 1 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपए कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि अवैध बर्खास्तगी के मामले में मामूली मुआवजा देना नियोक्ता की गलत कार्रवाई को बढ़ावा देने जैसा है।
20 साल से ज्यादा की सेवा के बाद हुई बर्खास्तगी
मामला अजमेर के वैशाली नगर स्थित माहेश्वरी पब्लिक स्कूल का है। यह स्कूल महेश शिक्षण संस्थान की इकाई है। रानी गुप्ता (चौधरी) 5 जुलाई 1995 से स्कूल में शिक्षक के तौर पर काम कर रही थीं। जुलाई 2000 में उन्हें हिंदी विषय की व्याख्याता (PGT) के पद पर स्थायी किया गया।
28 जनवरी 2015 को स्कूल मैनेजमेंट ने उनकी सेवाएं खत्म करने का प्रस्ताव पास किया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि स्कूल में हिंदी विषय पढ़ने वाले छात्र ही नहीं हैं। इसके बाद 11 फरवरी 2015 को उन्हें तीन महीने का नोटिस दिया गया और 14 मई 2015 से सेवा समाप्त कर दी गई।
ट्रिब्यूनल ने माना था बर्खास्तगी गलत
रानी गुप्ता ने सेवा समाप्ति के खिलाफ राजस्थान नॉन-गवर्नमेंट एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एक्ट, 1989 के तहत शैक्षणिक संस्थान ट्रिब्यूनल, जयपुर में अपील की। ट्रिब्यूनल ने माना कि स्कूल ने एक्ट की धारा 18 और CBSE के उप-नियमों का पालन किए बिना कार्रवाई की। इसलिए बर्खास्तगी को गैर-कानूनी माना गया।
हालांकि, तब तक महिला टीचर की रिटायरमेंट की उम्र पूरी हो चुकी थी। उनका रिटायरमेंट 31 दिसंबर 2020 को होनी थी। इसलिए ट्रिब्यूनल ने नौकरी पर वापस लेने के बजाय 1 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया।
हाई कोर्ट पहुंची महिला शिक्षक
महिला टीचर रानी गुप्ता ने 1 लाख रुपए के मुआवजे को नाकाफी बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। खास बात यह रही कि स्कूल प्रबंधन ने ट्रिब्यूनल के उस फैसले को चुनौती नहीं दी, जिसमें बर्खास्तगी को गैर-कानूनी माना गया था। इसलिए बर्खास्तगी को अवैध बताने वाला फैसला अंतिम हो गया।
महिला शिक्षक की ओर से अधिवक्ता सुनील समदरिया ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि 20 साल तक बिना किसी दाग के सेवा देने वाली शिक्षिका को इस कार्रवाई से आर्थिक और मानसिक नुकसान हुआ।
आखिरी वेतन करीब 50 हजार रुपए था
हाई कोर्ट ने पाया कि महिला टीचर रानी गुप्ता का आखिरी वेतन करीब 50 हजार रुपए महीना था। बर्खास्तगी से लेकर रिटायरमेंट की तारीख तक 67 महीने का अंतर रहा। इस हिसाब से इस अवधि का वेतन करीब 33.50 लाख रुपए बनता है।
कोर्ट ने कहा कि जब बर्खास्तगी को गैर-कानूनी माना जा चुका, तो मुआवजा कर्मचारी की सेवा अवधि और उसकी गरिमा के अनुरूप होना चाहिए। एक लाख रुपये की राशि बेहद कम और उचित अनुपात से बाहर थी।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि महिला शिक्षक को किसी अनुशासनहीनता या कदाचार के कारण नौकरी से नहीं निकाला गया था। साथ ही, इस अवधि में उनके किसी दूसरी जगह लाभ वाली नौकरी करने की बात भी सामने नहीं आई।
दो महीने में देना होगा 20 लाख
जस्टिस अनूप सिंघी की सिंगल बेंच ने राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षणिक संस्थान ट्रिब्यूनल के 16 अप्रैल 2024 के आदेश में बदलाव किया है। कोर्ट ने माहेश्वरी पब्लिक स्कूल प्रबंधन को रानी गुप्ता को दो महीने के भीतर 20 लाख रुपये एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अगर स्कूल प्रबंधन दो महीने में भुगतान नहीं करता है तो आदेश की तारीख से 9 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा।
ये भी पढ़ें:-
राजस्थान हाई कोर्ट ने लगाई राज्य भूमि नगर निकायों को देने के आदेश पर अंतरिम रोक
पूर्व विधायक बलजीत यादव को राजस्थान हाई कोर्ट से झटका, कोर्ट ने नहीं दी जमानत
आसाराम को राजस्थान हाई कोर्ट से मिली राहत, जेल में उचित चिकित्सा सुविधा के आदेश
राजस्थान हाई कोर्ट का आदेश, यौन अपराधों में फोटो-वीडियो सीलबंद लिफाफे में हों पेश