दादा ने किया केस, पोते के समय तक चल रही सुनवाई, 63 साल पुराने मुकदमे पर हाईकोर्ट सख्त

Ashish Bhardwaj | Sept 26, 2026, 16:42 IST
राजस्थान हाईकोर्ट ने दौसा के मंडावर एसडीएम कोर्ट में 1963 से लंबित केस पर सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने रोज सुनवाई कर 3 महीने में फैसला देने और अनावश्यक स्थगन पर भारी हर्जाने का आदेश दिया।

समझें क्या है पूरा मामला

  • 63 साल से लंबित मुकदमा।
  • हाईकोर्ट ने लगाई फटकार।
  • तीन महीने में फैसला देना होगा।
  • तारीख मांगी तो भारी हर्जाना।
  • दादा का केस, पोते तक सुनवाई।

राजस्थान में दौसा के मंडावर एसडीएम कोर्ट में एक मुकदमा 63 साल से लंबित है। यह कार्यवाही 1963 में शुरू हुई थी और आज तक फैसला नहीं हुआ। राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे न्याय व्यवस्था में देरी का गंभीर उदाहरण माना है। कोर्ट ने एसडीएम को रोज सुनवाई कर तीन महीने में फैसला देने को कहा है। बेवजह तारीख मांगने वाले पक्ष पर लाखों रुपए का हर्जाना लग सकता है।



एक मुकदमा कितने साल चल सकता है? दौसा जिले का एक मामला इसका चौंकाने वाला जवाब है। यहां एक केस 63 साल से फैसले का इंतजार कर रहा है। इस दौरान कई पीढ़ियां बदल गईं। कई पक्षकारों की मौत भी हो गई। पर विवाद अब भी फाइलों में अटका है। अब राजस्थान हाईकोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया है।



हाईकोर्ट ने क्या कहा

जस्टिस अनूप कुमार धांढ की एकलपीठ ने इस मामले पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि इंसान की जिंदगी छोटी और सीमित होती है। पर मुकदमेबाजी पीढ़ियों तक नहीं चलनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कई बार केस करने वाला दुनिया में नहीं रहता। पर उसका मुकदमा फाइलों में जिंदा रहता है। यह मामला इसी हालत का साफ उदाहरण है।



1963 से चल रहा मामला

याचिका के मुताबिक विवाद एक संपत्ति से जुड़ा है। पुलिस की शिकायत के बाद 1963 में कार्यवाही शुरू हुई थी। यह कार्यवाही दंड प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 145 के तहत हुई। धारा 145 जमीन या पानी पर कब्जे के ऐसे विवादों से जुड़ी है, जिनसे शांति भंग होने का खतरा हो। ऐसे मामलों में एसडीएम कब्जे पर फैसला करते हैं।



यह शिकायत 1963 में क्रमांक 52/1963 के रूप में दर्ज हुई थी। अब इसका नया क्रमांक 1/2024 है। पर 2026 तक भी इसका अंतिम फैसला नहीं हो सका।



किसकी याचिका पर फैसला

यह आदेश दौसा जिले के पातरखेड़ा निवासी जयराम की याचिका पर आया है। जयराम ने हाईकोर्ट से मांग की थी कि एसडीएम को केस निपटाने का निर्देश दिया जाए। याचिकाकर्ता ने बताया कि लंबे समय में कई पक्षकारों की मौत हो चुकी है। उनकी जगह उनके कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लिया गया। इसके बाद भी मामला तय नहीं हुआ।



तीन महीने में देना होगा फैसला

हाईकोर्ट ने मंडावर एसडीएम को तीन महीने में केस का अंतिम निपटारा करने का आदेश दिया है। मामले की अब रोज सुनवाई होगी। कोर्ट ने इस केस को सबसे पुराने प्राथमिकता वाले मामलों की श्रेणी में रखने को कहा है। तीन महीने बाद फैसले की प्रमाणित कॉपी के साथ अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करनी होगी।



तारीख मांगी तो भारी हर्जाना

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सख्त चेतावनी दी है। किसी भी पक्ष की अनावश्यक स्थगन की मांग स्वीकार नहीं की जाएगी। अगर कोई पक्ष केस टालने के लिए तारीख मांगता है तो उस पर भारी हर्जाना लगेगा। यह हर्जाना छह अंकों तक यानी लाखों रुपए में हो सकता है। स्थगन तभी मिलेगा, जब वह पूरी तरह जरूरी हो।



बार-बार तारीख पर नाराजगी

कोर्ट ने माना कि 63 साल की देरी की बड़ी वजह बार-बार मिलने वाली तारीखें हैं। कोर्ट के मुताबिक ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष फैसला चाहते ही नहीं थे। इसलिए केस एक तारीख से दूसरी तारीख पर खिसकता रहा। हाईकोर्ट ने कहा कि कोई पक्ष अपनी सुविधा से केस नहीं चला सकता। वह तय नहीं कर सकता कि कब सबूत दे और कब सुनवाई हो। कोर्ट ने कहा कि बेवजह स्थगन की आदत पूरी न्याय व्यवस्था को कमजोर करती है।



जल्द न्याय मौलिक अधिकार

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति को जल्द न्याय पाने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। यह सिर्फ कहावत नहीं, बल्कि राजस्व अदालतों की कड़वी सच्चाई है।



दादा का केस, पोते तक सुनवाई

जस्टिस धांढ ने कहा कि अब पुरानी कार्यसंस्कृति बदलने का समय आ गया है। आज हालत यह है कि केस दादा-दादी दायर करते हैं। फैसला आने तक पोते-पोतियां अदालत पहुंच जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि लंबी देरी से एक पक्ष को लगातार फायदा मिलता है। दूसरा पक्ष गुण-दोष पर फैसला पाने से वंचित रह जाता है। इससे लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है।



अफसर पर भी हो सकती है कार्रवाई

हाईकोर्ट ने साफ किया कि तय समय में फैसला न होने को गंभीरता से लिया जाएगा। बिना ठोस कारण देरी हुई तो संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई हो सकती है। इसके लिए संभागीय आयुक्त, राजस्व मंडल और कार्मिक विभाग को निर्देश दिए जा सकते हैं। राजस्व मंडल के रजिस्ट्रार और दौसा कलेक्टर को निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है।



सभी राजस्व अदालतों तक पहुंचेगा आदेश

कोर्ट ने यह आदेश प्रदेश की सभी राजस्व अदालतों तक भेजने को कहा है। इसका मकसद है कि पुराने लंबित मामलों पर हर जगह ध्यान दिया जाए। हाईकोर्ट ने मामले को 18 दिसंबर 2026 को फिर सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। उस दिन बताना होगा कि तय समय में फैसला हुआ या नहीं।



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