अवैध हिरासत में मारपीट पुलिस ड्यूटी नहीं, मुकदमे के लिए मंजूरी जरुरी नहीं
समझें क्या है पूरा मामला
- कमरे में बंद कर डंडे से पीटना आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में नहीं आता।
- अवैध प्रताड़ना के दोषी पुलिसकर्मी पर मुकदमा चलाने के लिए अभियोजन स्वीकृति की जरूरत नहीं।
- राजस्थान हाई कोर्ट ने आरोपी कांस्टेबल की याचिका खारिज कर प्रसंज्ञान आदेश को सही माना।
- कोर्ट ने माना कि कमरे में बंद करके मारपीट करना आधिकारिक ड्यूटी से बाहर जाकर व्यक्तिगत कार्य।
राजस्थान हाई कोर्ट ने अवैध हिरासत में रखने व मारपीट के दोषी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध सीआरपीसी की धारा- 197 के तहत अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।
जस्टिस रवि चिरानिया ने विनोद कुमार की याचिका खारिज करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति को कमरे में बंद करके डंडे से बुरी तरह से पीटने को किसी भी स्थिति पुलिसकर्मियों के अधिकारिक कर्तव्य नहीं माना जा सकता।
यह है मामला
मामला एक सामाजिक कार्यकर्ता को पुलिस द्वारा कथित तौर पर जबरन उठाने, अवैध हिरासत में रखने और प्रताड़ित किए जाने की घटना से शुरू हुआ था। इस अवैध हिरासत के विरोध में क्षेत्र में जनआक्रोश फैल गया और सार्वजनिक प्रदर्शन भी हुए थे।
प्रदर्शन के दौरान याचिकाकर्ता पुलिस कांस्टेबल ने पीड़ित सामाजिक कार्यकर्ता सखी मोहम्मद को एसडीएम की अदालत के अंदर बंद कर दिया और डंडे से बुरी तरह पीटा था। इस मामले में याचिकाकर्ता कांस्टेबल के खिलाफ गलत तरीके से बंधक बनाने और हिरासत में हिंसा के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई थी।
पुलिस ने दी थी एफआर
जांच के बाद पुलिस ने अदालत में नकारात्मक एफआर पेश कर दी थी। लेकिन ट्रायल कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा- 342,323,325,504 और 106 में प्रसंज्ञान ले लिया था। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को एडीजे कोर्ट में चुनौती दी थी। लेकिन एडीजे कोर्ट ने भी प्रसंज्ञान आदेश को बहाल रखा था। याचिकाकर्ता कांस्टेबल ने दोनों आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि सीआरपीसी की धारा- 197 के तहत लोक सेवक के खिलाफ प्रसंज्ञान लेने से पहले राज्य सरकार से पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य है। उसका कहना था कि वह अन्य पुलिसकर्मियों के साथ स्थल पर आधिकारिक ड्यूटी पर तैनात था और उसे इस पूरी घटना में व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाकर बलि का बकरा बनाया गया है।
अधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा नहीं
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि धारा 197 CrPC लागू करने के लिए अनिवार्य शर्त यह है कि कथित अपराध का आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से सीधा संबंध होना चाहिए। यह धारा ऐसे कृत्यों के लिए कोई कानूनी सुरक्षा प्रदान नहीं करती जो आधिकारिक कार्यों की सीमा से बाहर या पूरी तरह से असंबद्ध हो।
शिकायत में मौके पर मौजूद पूरे पुलिस दल के बजाय केवल याचिकाकर्ता को ही निशाना बनाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि उसने अपनी आधिकारिक क्षमता से बाहर जाकर व्यक्तिगत रूप से काम किया था। यह मानते हुए कि बिना पूर्व स्वीकृति के प्रसंज्ञान लेने वाले ट्रायल कोर्ट आदेशों में कोई कानूनी गलती नहीं है।
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