आस्था से तय नहीं हो सकता संपत्ति का अधिकर- हाई कोर्ट

Mukesh Sharma | Aug 13, 2026, 19:25 IST
आस्था से नहीं मिलता संपत्ति का अधिकार, हाईकोर्ट का अहम फैसला
राजस्थान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक आस्था या सेवा-संभाल से संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिलता। हनुमानगढ़ के गुरुद्वारा महताबगढ़ साहिब में हिंसक विवाद के बाद शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए कोर्ट ने परिसर की कुर्की और रिसीवर नियुक्ति को सही ठहराया।

समझें क्या है पूरा मामला

  • आस्था गहरी हो सकती है, पर उससे मालिकाना हक नहीं मिलता।
  • हिंसक विवाद के बाद शांति बनाए रखने के लिए गुरुद्वारा परिसर की कुर्की सही।
  • केवल नियुक्ति से अचल संपत्ति पर अधिकार सिद्ध नहीं होता।
  • हक और स्वामित्व के फैसले के लिए सिविल कोर्ट जाएं।

राजस्थान हाई कोर्ट ने आस्था और कानूनी अधिकार के बीच अंतर पर महात्मा गांधी के वर्ष 1933 के लेख का उल्लेख करते हुए कहा है कि किसी श्रद्धालु या सेवादार की धार्मिक आस्था कितनी भी सच्ची, गहरी और अटूट क्यों न हो,वह अपने आप में उस संपत्ति पर प्रभुत्व या मालिकाना हक स्थापित नहीं कर सकती।



जस्टिस फरजंद अली ने हरमीत कौर की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि किसी धार्मिक स्थल का पवित्र स्वरूप वहां स्थापित श्री गुरु ग्रंथ साहिब और धार्मिक परंपराओं से होता है, न कि उसकी भौतिक चारदीवारी या जमीन पर कब्जे से।



यह है मामला

दरअसल हनुमानगढ़ जिले के गोलूवाला स्थित गुरुद्वारा महताबगढ़ साहिब के प्रबंधन और कब्जे को लेकर विवाद हुआ था। मुख्य सेवादार व याचिकाकर्ता हरमीत कौर उर्फ बीबी ने 2016 से प्रबंधन का दावा किया था। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों के समूह ने उनके दावे का कड़ा विरोध किया।



तीन अक्टूबर,2025 को दोनों पक्षों के बीच तलवारों और हथियारों के साथ हिंसक झड़प हुई। पुलिस ने क्रॉस-एफआईआर दर्ज की थी। सार्वजनिक शांति भंग होने के खतरे को देखते हुए एसडीएम पीलीबंगा ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 164 व 165 के तहत परिसर को कुर्क कर थानाधिकारी को रिसीवर नियुक्त कर दिया था।



एसजीपीसी के मनोनयन से ही अचल संपत्ति का स्वामित्व नहीं मिलता

एसजीपीसी (SGPC) की ओर से नियुक्ति के आधार पर गुरुद्वारे पर अधिकार की दलील पर कोर्ट ने कहा कि राजस्थान में ऐसा कोई कानूनी नियम या स्थापित परंपरा रिकॉर्ड पर नहीं है,जिससे यह सिद्ध हो कि राज्य के सभी स्थानीय गुरुद्वारे सीधे एसजीपीसी द्वारा संचालित होते हैं।



कुर्की व रिसीवरी सही कदम

कोर्ट ने कहा कि निजी संपत्ति के विपरीत धार्मिक स्थल आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। ऐसे में दो पक्षों के बीच खूनी संघर्ष और हिंसा रोकने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा की गई कुर्की और रिसीवर की नियुक्ति एक आवश्यक निवारक कदम था।



याचिका खारिज, सिविल कोर्ट जाने की छूट

हाई कोर्ट ने एसडीएम पीलीबंगा और पुनरीक्षण न्यायालय के कुर्की आदेशों को पूरी तरह वैध ठहराते हुए हरमीत कौर की याचिका खारिज कर दी।



हालांकि, कोर्ट ने गोलूवाला के वर्तमान थानाधिकारी को कानून-व्यवस्था की ताजा स्थिति पर एक स्वतंत्र रिपोर्ट तैयार कर एसपी हनुमानगढ़ के माध्यम से प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ किया कि यह निर्णय केवल शांति एवं कानून-व्यवस्था के संदर्भ में है।



मालिकाना हक या स्थायी प्रबंधन के अधिकारों का फैसला करने के लिए सभी पक्ष सक्षम सिविल कोर्ट में जाने के लिए स्वतंत्र हैं।



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