कर्मचारी की सरकारी मकान से बेदखली और 14 साल के दोगुने किराये की वसूली पर रोक
समझें क्या है पूरा मामला
- गांधीनगर स्थित सरकारी मकान आवंटन रद्द करने पर हाईकोर्ट से अंतरिम स्टे।
- बिना जांच रिपोर्ट और पक्ष सुने बिना बेदखली आदेश को बताया प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन।
- विभाग पर लगा मनमानेपन और बिना वैधानिक नोटिस के दंडात्मक कार्रवाई का आरोप।
- मामले पर राज्य सरकार से जवाब तलब, अगली सुनवाई 28 सितंबर को तय।
राजस्थान हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी से आवंटित सरकारी मकान से बेदखल करने व 14 साल का दुगुना किराया वसूलने के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस आनंद शर्मा ने यह अंतरिम आदेश हरिसिंह की याचिका पर दिया। कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगते हुए अगली सुनवाई 28 सितंबर को तय की है।
एडवोकेट सुनील समदडिया ने बताया कि याचिकाकर्ता 2004 एलडीसी की पोस्ट पर नियुक्त हुआ था। वह वर्तमान में सहायक प्रशासनिक अधिकारी के पद पर कार्यरत है। सितंबर 2012 में उसे गांधीनगर में सरकारी मकान आवंटित हुआ था।
जांच कर कहा सबलेट किया है
सरकार की स्टैंडिंग कमेटी ने 21 जुलाई, 2026 को कर्मचारियों को आवंटित सरकारी मकानों का निरीक्षण किया था। उसके मकान के निरीक्षण के दौरान वह घर पर नहीं था। लेकिन उसकी बेटी घर पर थी। कमेटी ने सरकारी मकान में किसी अन्य की रहने की रिपोर्ट दी।
याचिकाकर्ता को जांच रिपोर्ट दिए बिना सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव के समक्ष उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने को कहा गया। उसे 22 जुलाई, 2026 का एक नोटिस भी दिया था जिसका जवाब 28 जुलाई को दे दिया था।
आवंटन रद्ध, कहा दुगुना किराया लेंगे
इसके बाद उसे न तो जांच रिपोर्ट दी ना ही उसके दिए गए जवाब पर कोई निर्णय लिया और तीन अगस्त,2026 को उसके मकान का आवंटन रद्ध कर दिया। इसके साथ ही उससे 17 सितंबर,2012 से अदायगी की तारीख तक दुगुना किराया वसूलने का नोटिस भी दिया।
पहले कहा अन्य रहता है फिर कहा सबलेट कर दिया
याचिकाकर्ता का कहना है कि 22 जुलाई 2026 को जारी नोटिस में केवल यह आरोप लगाया गया कि आवास में अन्य लोग रहते पाए गए। लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि वे कौन थे या निरीक्षण कब और किसकी उपस्थिति में हुआ।
विभाग ने निरीक्षण रिपोर्ट और जांच के निष्कर्षों की कॉपी दिए बिना तथा 28 जुलाई को पेश उसके जवाब पर विचार किए बिना ही सीधा दंडात्मक आदेश पारित कर दिया।
मनमाना है आदेश
याचिकाकर्ता का कहना है कि दंडात्मक आदेश पारित करने से पहले न तो नियम 20(1) के उल्लंघन का स्पष्ट नोटिस दिया गया और न ही जांच रिपोर्ट सौंपी गई। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। बिना किसी वैधानिक नोटिस के विभाग के पास ऐसा आदेश जारी करने का क्षेत्राधिकार नहीं था।
याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण को नजरअंदाज करना आदेश के मनमानेपन व विवेकहीनता है। जब आवंटन आदेश ही अवैध है तो उससे जुड़ी बेदखली और वर्ष 2012 से दोगुना किराया वसूली की दंडात्मक कार्रवाई भी स्वतः अवैध हो जाती है।
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