DSP समेत 4 पुलिसकर्मियों पर FIR का आदेश रद्द, हाई कोर्ट ने कहा-बिना प्रारंभिक जांच सीधे केस दर्ज कराना गलत
News In Short
- हाई कोर्ट ने डीएसपी समेत चार पुलिस कर्मियों के खिलाफ बिना जांच FIR आदेश किया रद्द।
- कोर्ट ने कहा, बिना जांच लोक सेवकों पर FIR, BNSS की धारा 175(4) का उल्लंघन।
- विशेष अदालत ने एक आदेश में चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR का दिया था निर्देश।
- इसमें विशेष अदालत ने क्रॉस-मुकदमों की पूरी पृष्ठभूमि को किया था नजरअंदाज।
- अब विशेष अदालत का आदेश रद्द, प्रारंभिक जांच अनिवार्य करना आवश्यक।
News In Detail
Jodhpur: राजस्थान हाई कोर्ट ने एक फैसले में डीएसपी समेत चार पुलिस कर्मियों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लोक सेवकों को सुरक्षा प्रदान करती है। किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ सीधे FIR का आदेश देने से पहले प्रारंभिक जांच करना अनिवार्य है।
जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने श्रीगंगानगर की विशेष अदालत के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें डीएसपी समेत चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ तुरंत FIR दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने इस आदेश को यांत्रिक और कानून की भावना के विपरीत बताया।
क्या है पूरा मामला?
मामले की शुरुआत अगस्त 2025 में हुई, जब अनूपगढ़ थाने में एक व्यक्ति ने टेकचंद नाम के शख्स के खिलाफ SC/ST एक्ट समेत गंभीर धाराओं में केस दर्ज कराया। इससे नाराज टेकचंद ने सितंबर में ही पुलिस के खिलाफ क्रॉस-केस दर्ज करा दिया। पुलिस ने जांच की और अक्टूबर में चार्जशीट दाखिल कर दी।
लेकिन जब पुलिस की जांच से टेकचंद संतुष्ट नहीं हुआ तो उसने DGP विजिलेंस को शिकायत की। वहां से भी मनमाफिक कार्रवाई न होने पर उसने सीधा रास्ता अपनाया और 1 नवंबर 2025 को विशेष अदालत में डीएसपी प्रशांत कौशिक, एसआई सरदार सिंह, एएसआई मनोहर सिंह और चालक किशन सिंह के खिलाफ परिवाद दायर कर दिया।
बिना किसी गहन जांच के विशेष न्यायाधीश ने 21 नवंबर 2025 को आदेश जारी कर श्रीगंगानगर के पुलिस अधीक्षक को इन चारों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दे दिया।
चार दिन बाद सामने आई सच्चाई
हैरानी की बात यह है कि इस आदेश के मात्र चार दिन बाद 25 नवंबर 2025 को पुलिस ने टेकचंद द्वारा दर्ज कराए गए क्रॉस-मुकदमे की जांच पूरी कर नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट पेश की। यानी पुलिस ने साफ कह दिया कि टेकचंद का आरोप झूठा था और यह मामला केवल दबाव बनाने के लिए दर्ज कराया गया था। लेकिन तब तक विशेष अदालत का FIR वाला आदेश जारी हो चुकी थी।
हाईकोर्ट ने क्यों कहा गलत?
जब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो जस्टिस फरजंद अली ने विशेष अदालत के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने नए कानून BNSS की धारा 175(4) की जरूरी शर्तों का उल्लंघन किया। उन्होंने यह नहीं देखा कि टेकचंद की शिकायत प्रतिशोधात्मक थी या नहीं। साथ ही क्रॉस-मुकदमों की पूरी पृष्ठभूमि को नजरअंदाज कर दिया गया। इसके अलावा लोक सेवक को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि विशेष न्यायाधीश ने मामले का अध्ययन भी नहीं किया, बस एक यांत्रिक आदेश जारी कर दिया।
BNSS की धारा 223 है लोक सेवकों के लिए सुरक्षा कवच
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में नए कानून BNSS की धारा 223 को लोक सेवकों के लिए एक सुरक्षात्मक छलनी बताया। कोर्ट ने कहा कि इस धारा के तहत किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ FIR का आदेश देने से पहले दो चीजें अनिवार्य हैं। अधिकारी को अपना पक्ष रखने का वास्तविक मौका देना यानी उसे सुनना जरूरी है। उसके वरिष्ठ अधिकारी से तथ्यात्मक रिपोर्ट लेना ताकि पता चल सके कि आरोप सही हैं या बदले की भावना से लगाए गए हैं।
इन दोनों शर्तों के बिना कोई भी मजिस्ट्रेट सीधे FIR दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकता। कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान इसलिए बनाया गया है ताकि ईमानदार अफसरों को उनके काम में बाधा न आए और कोई भी व्यक्ति बदला लेने के लिए झूठा केस दर्ज न करा सके।
विशेष अदालत का आदेश रद्द, नई सुनवाई के निर्देश
जस्टिस फरजंद अली ने स्पष्ट आदेश दिया कि विशेष अदालत का 21 नवंबर 2025 वाला पूरा आदेश रद्द किया जाता है। उस आदेश के तहत हुई सभी कार्रवाइयां भी अमान्य होंगी। मामला वापस निचली अदालत को भेजा जाता है।
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