प्रकृति की बलि देकर नहीं होगा विकास, हाई कोर्ट ने नाले की जमीन से श्मशान-सड़क हटाने के दिए आदेश
News In Short
- राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा, विकास के नाम पर प्रकृति की नहीं दी जा सकती बलि।
- सार्वजनिक जरूरतों के बहाने नहीं बदला जा सकता प्राकृतिक नालों का मूल स्वरूप।
- अदालत ने सरकार को याद दिलाया संविधानिक दायित्व, इको संतुलन बिगाड़ने पर नाराजगी।
- कोर्ट ने कहा, आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों का संरक्षण राज्य के लिए बाध्यकारी।
- जल-मार्गों में रुकावट से भूजल पुनर्भरण और पर्यावरण को पहुंचेगा गंभीर नुकसान।
News In Detail
राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा है कि गैर-मुमकिन नाले (प्राकृतिक जल निकासी और जल प्रवाह का मार्ग) का इस्तेमाल सड़क व श्मशान जैसे सार्वजनिक उद्धेश्य के लिए भी नहीं बदला जा सकता है। अदालत ने राजस्थान सरकार को संबंधित जमीन से सड़क, श्मशान के ढांचे या अतिक्रमण को हटाने के निर्देश दिए हैं।
जस्टिस डॉ.पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की बैंच ने कहा है कि राज्य सरकार प्राकृतिक जल मार्गों के संरक्षण के प्रति अपने कानूनी व संविधानिक दायित्वों को निभाने में नाकाम रही है।
कारण जो भी हों लेकिन
अदालत ने कहा है कि जब तक प्राकृतिक जल निकायों और जल मार्गों को पूरी लगन से सुरक्षित और संरक्षित नहीं किया जाता, तब तक आम नागरिक के गरिमापूर्ण और टिकाऊ जीवन का अधिकार गंभीर ख़तरे में बना रहेगा।
हालांकि बढ़ते शहरीकरण, विकास विस्तार और जनसंख्या के दबाव के कारण ज़मीन के इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग तरह की मांग उठ सकती हैं। लेकिन ऐसे कारणों के आधार पर कानून के विपरीत व पारिस्थितिकि संतुलन को बिगाड़ने वाले कार्यों को सही नहीं ठहराया जा सकता।
यह था मामला
कोर्ट एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रहा था। इसमें गैर-मुमकिन नाले की जमीन पर सड़क व श्मशान जैसे सार्वजनिक उपयोग के निर्माण की अनुमति देने केा चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि गैर-मुमकिन नाला एक प्राकृतिक जल मार्ग है। उसका इस्तेमाल किसी भी अन्य काम में नहीं हो सकता। राज्य सरकार का काम क़ानून के ख़िलाफ़ था और पर्यावरण संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के बचाव से जुड़े संविधानिक आदेश का उल्लंघन था।
राज्य सरकार के वकील का कहना था कि सड़क और श्मशान का विकास सार्वजनिक उपयोगिता के उद्देश्यों के लिए किया गया। अदालत को मामले में दखल नहीं देना चाहिए।
नहीं कर सकते दूसरा इस्तेमाल
दोनों पक्ष की सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि संबंधित जमीन प्राकृतिक जल निकासी और जल प्रवाह का मार्ग है। यह उस इलाके के पारिस्थितिकि ढांचे और जल प्रणाली का अभिन्न अंग है। ऐसी जमीन का इस्तेमाल किसी भी दूसरे काम में नहीं किया जा सकता। फिर भले ही वह काम सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ही क्यों ना हो।
लोक न्यास सिद्धांत सरकार के लिए बाध्यकारी
अदालत ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ और टिकाऊ पर्यावरण के अधिकार तथा अनुच्छेद 48-A तथा 51-A के तहत लोक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) राज्य को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य करता है। आम जनता तथा आने वाली पीढ़ियों के लाभ के लिए इन संसाधनों के संरक्षण को अनिवार्य बनाता है।
अदालत ने कहा है कि जल निकायों, प्राकृतिक जल-निकास मार्गों, जलग्रहण क्षेत्रों और पारंपरिक जल-मार्गों का संरक्षण राजस्थान जैसे राज्य में और भी अधिक महत्व रखता है। यहां की पारिस्थितिक स्थितियां और पानी की कमी,प्रत्येक प्राकृतिक जल संसाधन के संरक्षण को अत्यंत आवश्यक बना देती हैं।
किसी भी प्राकृतिक जल-मार्ग में कोई भी रुकावट या बदलाव,जल-निकास के तरीकों, भूजल पुनर्भरण और पर्यावरणीय संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने की क्षमता रखता है।
न्यायालय ने आगे यह भी टिप्पणी की कि प्राकृतिक संसाधनों के विनाश की कीमत पर लोक उपयोगिता (Public Utility) को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
कानूनी व संविधानिक बाध्यता है सरकार की
राज्य इन संसाधनों के संरक्षण के लिए संंविधानिक और कानूनी रूप से बाध्य है। अदालत ने माना है कि प्रशासनिक सुविधा या विकास संबंधी दबाव,किसी ऐसे कार्य को वैध नहीं ठहरा सकते, जो अन्यथा कानून की दृष्टि से स्वीकार्य ना हो।
यद्यपि बढ़ता शहरीकरण, विकास का विस्तार और जनसंख्या संबंधी दबाव, भूमि-उपयोग (Land-use) को लेकर परस्पर विरोधी मांगें उत्पन्न कर सकते हैं। इसके बावजूद ऐसे आधार कानून के विपरीत और पारिस्थितिक संतुलन को खत्म करने वाले कार्यों केा वैध नहीं ठहरा सकते।
अदालत ने जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को संबंधित जमीन से सभी प्रकार के निर्माण या अतिक्रमण हटाकर उसके मूल स्वरुम में लौटाने को कहा है।
ये भी पढे़:-
अमेरिकी विदेश मंत्री के स्वागत को तैयार पिंकसिटी, 25 को आएंगे जयपुर, यह रहेगा कार्यक्रम
मंत्रियों-अफसरों की विदेश यात्राओं पर रोक, फिजूलखर्ची रोकने के लिए सरकार का मास्टर प्लान
तीन प्रयास, तीनों में सफलता, IAS श्वेता चौहान की UPSC यात्रा और उससे मिलने वाले अनमोल सबक
प्रशासन में दिखा जवाबदेही का अभाव, आम नागरिक की जिंदगी पर भारी पड़ भ्रष्टाचार