विलासिता नहीं है व्यक्तिगत आज़ादी,जिसका आनंद सिर्फ शक्तिशाली उठाएं-हाईकोर्ट

Mukesh Sharma | Jun 13, 2026, 16:22 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान हाई कोर्ट ने अपीलीय आदेश के बावजूद एक बीमार व्यक्ति को 53 दिन अवैध हिरासत में रखने पर सख्त रुख अपनाते हुए दोषी तहसीलदार तेजपाल पारीक पर दो लाख का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया है, उन्हें फील्ड पोस्टिंग से हटाकर विभागीय जांच के आदेश दिए हैं।

समझें क्या है पूरा मामला

  • राजस्थान हाई कोर्ट ने अवैध हिरासत मामले में सख्त टिप्पणी की है।
  • कोर्ट ने तहसीलदार पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
  • जमानत के बाद भी बीमार व्यक्ति को 53 दिन तक रखा था जेल में।
  • कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन बताया।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता कोई विलासिता (लक्जरी) नहीं है जिसका आनंद केवल शक्तिशाली लोग उठाएं और गरीबों को इसके लिए भीख मांगनी पड़े। यह तल्ख टिप्पणी राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्य पीठ ने एक बीमार और गरीब व्यक्ति की सजा ​स्थगित होने के बावजूद 53 दिनों तक अवैध हिरासत में रखने पर की है। कोर्ट ने इसे कार्यपालिका की निरंकुशता और संवेदनहीनता बताते हुए कहा कि एक कैंसर पीड़ित पत्नी का अपने पति की रिहाई के लिए दफ्तरों के चक्कर काटना व अधिकारी का आदेश दबाकर बैठे रहना प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि क्रूरता है।



जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस सुनील बेनीवाल की अवकाशकालीन खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए इस गंभीर लापरवाही के लिए दोषी अधिकारी तत्कालीन तहसीलदार (डेह, नागौर) तेजपाल पारीक पर 2,00,000 रुपए का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया है। साथ ही उन्हें तत्काल प्रभाव से फील्ड पोस्टिंग से हटाने के आदेश दिए हैं।



क्या था मामला?

मामला नागौर जिले की डेह तहसील के नयागांव में भूमि अतिक्रमण का है। 5 मार्च 2026 को नायब तहसीलदार ने राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 91 के तहत कार्रवाई करते हुए एचआईवी पीड़ित घमंडनाथ को तीन महीने के सिविल कारावास की सजा सुनाई। कलक्टर ने सजा के आदेश के खिलाफ अपील खारिज कर दी।



पीड़ित ने कलक्टर के आदेश को अतिरिक्त संभागीय आयुक्त (अजमेर) के समक्ष चुनौती दी व सरकारी जमीन से कब्जा हटाने का हलफनामा भी पेश किया। 15 अप्रैल 2026 को उसकी सजा स्थगित हो गई और उसे रिहा करने के आदेश हो गए। पीड़ित की कैंसर से ग्रसित पत्नी भंवरी देवी ने आदेश की प्रमाणित प्रति तहसीलदार को दे दी। लेकिन तहसीलदार ने आदेश को मानने से इंकार कर दिया।



भंवरी देवी लगातार दफ्तरों के चक्कर काटती रही लेकिन,कोई सुनवाई नहीं हुई। परेशान होकर उसने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। कोर्ट के दखल से अंतत: पीड़ित घंमडनाथ को 8 जून को रिहा किया गया।



पहले आदेश का पालन करें, दलीलें बाद में

जस्टिस फरजंद अली के लिखे विस्तृत फैसले में कोर्ट ने 'पहले आदेश का पालन करें, अपील बाद में' के सिद्धांत को रेखांकित किया। तहसीलदार के आदेश की जानकारी एक जून, 2026 को मिलने की दलील पर कोर्ट ने कहा है यदि इसे सत्य भी माना जाए तो भी पीड़ित को सात दिन अवैध हिरासत में क्यों रखा ? यह सीधे तौर पर कानून की अवहेलना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का हनन है।



अपनी जेब से भरना होगा जुर्माना, सरकार न करे मदद

अदालत ने दोषी तहसीलदार तेजपाल पारीक को आदेश की प्रति मिलने के 45 दिनों के भीतर पीड़ित घमंडनाथ के बैंक खाते में 2,00,000 का व्यक्तिगत मुआवजा जमा करवाने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने आदेश के अनुसार तहसीलदार को यह जुर्माना राशि अपनी जेब से भरनी होगी। अदालत ने सरकार को जुर्माने लिए दोषी तहसीलदार की किसी प्रकार की वित्तीय मदद नहीं करने को कहा है।



90 दिन में विस्तृत विभागीय जांच के आदेश

अदालत ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) को किसी वरिष्ठ जिम्मेदार अधिकारी से पूरे मामले की विस्तृत विभागीय जांच 90 दिनों के भीतर पूरी करवाकर पालना रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए हैं। जांच में विशेष रूप से यह देखा जाएगा कि तहसील कार्यालय को आधिकारिक तौर पर आदेश कब प्राप्त हुआ था और क्या अधिकारी को एक जून,2026 से पहले ही इसकी जानकारी मिल चुकी थी या नहीं।



फील्ड पोस्टिंग छीनी, तहसील दफ्तर में प्रवेश पर भी बैन

कोर्ट ने दोषी तहसीलदार को फील्ड से हटाकर राजस्व मुख्यालय में अटैच करने व जांच पूरी होने तक फील्ड या अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) जिम्मेदारी नहीं देने केा कहा है। सबूतों या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका के चलते दोषी तहसीलदार पर डेह तहसील कार्यालय में प्रवेश करने और किसी भी राजस्व रिकॉर्ड या फाइल को छूने पर भी पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।



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