जयपुर विस्तार पर हाई कोर्ट सख्त, जेडीए में जुड़ने वाले 679 गांवों में निर्माण पर लगी रोक, सरकार से मांगा जवाब

Mukesh Sharma | Mar 18, 2026, 16:50 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान के जयपुर में 679 गांवों को जेडीए में जोड़ने का मामला हाई कोर्ट में पहुंच गया है। कोर्ट ने राज्य सरकार और जेडीए से जवाब मांगा है। साथ ही बढ़े हुए एरिया में निर्माण गतिविधियों पर अंतरिम रोक लगा दी है।

News In Short

  • राजस्थान हाई कोर्ट ने सभी 679 गांव में निर्माण पर लगाई अंतरिम रोक।
  • जेडीए ने 3000 वर्ग किलोमीटर एरिया बढ़ाने की जारी की अधिसूचना।
  • सरकार की एक अक्टूबर 2025 की अधिसूचना को रद्ध करने की गुहार।
  • हाई कोर्ट ने सरकार व जेडीए को नोटिस जारी कर मांगा जवाब।
  • अदालत अब इस मामले में 21 अप्रेल को करेगी अगली सुनवाई।

News In Detail

राजस्थान के जयपुर विकास प्राधिकरण(जेडीए) में आसपास के जोड़े गए 679 गांवों में निर्माण गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है। यह अंतरिम रोक राजस्थान हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर संधू ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के बाद लगाई।



कोर्ट ने जेडीए के अब तक के सबसे बड़े भू-विस्तार करने वाली एक अक्टूबर 2025 की अधिसूचना पर सरकार व जेडीए से जवाब मांगा है। अदालत ने नोटिस प्रमुख सचिव यूडीएच, जेडीए आयुक्त, प्रमुख सचिव स्थानीय निकाय, जयपुर कलक्टर और राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को नोटिस दिया है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 21 अप्रेल को होगी।



बिना किसी आकलन के किया

याचिकाकर्ता संजय जोशी की एडवोकेट जया​ मित्रा ने बताया कि राज्य सरकार की एक अक्टूबर, 2025 की अधिसूचना के जरिए जेडीए के अधिकार क्षेत्र में 679 गांवों को शामिल किया गया। इसके जरिए जयपुर के शहरी दायरे को लगभग दोगुना बढ़ाने का प्रयास किया गया।



यह विस्तार बिना किसी वैध मास्टर प्लान, जोनल डेवलपमेंट प्लान या पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के किया गया है। मौजूदा मास्टर प्लान 2025 में इन गांवों को शामिल करने का कोई प्रावधान नहीं था। 2025 के बाद लागू होने वाला नया मास्टर प्लान 2047 भी अभी तक तैयार नहीं है। इसके बावजूद सरकार ने सीधे 679 गांवों को जोड़कर योजना प्रक्रिया की अनदेखी की है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह निर्णय न केवल मनमाना है, बल्कि जेडीए एक्ट के प्रावधानों के भी विपरीत है।



ना एक्सपर्ट की राय ली, ना ग्रामीणों से पूछा

एडवोकेट जया मित्रा ने बताया कि यह विस्तार एक आंतरिक समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। इसमें शुरुआत में 272 गांवों को शामिल करने का प्रस्ताव था। लेकिन बाद में इसे 100 किलोमीटर के दायरे के आधार पर बढ़ाकर सैकड़ों गांवों तक पहुंचा दिया गया। इस प्रक्रिया में न तो ग्राम पंचायतों से कोई सलाह ली गई और न ही किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ या पर्यावरणीय अध्ययन को आधार बनाया गया। जबकि यह कदम पर्यावरण, कृषि भूमि और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।



पहले के क्षेत्रों में भी विकास नहीं

अदालत को बताया गया कि इस विस्तार से जयपुर का क्षेत्रफल लगभग 3000 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर करीब 6000 वर्ग किलोमीटर हो गया है। पहले से शामिल कई क्षेत्रों में आज तक बुनियादी सुविधाएं विकसित नहीं हो पाई हैं। पहले के विस्तार 1999 और 2010-11 के बाद भी कई इलाके आज तक सड़क, पानी, सीवरेज जैसी सुविधाओं से वंचित हैं। इससे जेडीए की क्षमता पर सवाल खड़े होते हैं। इसके बावजूद नए क्षेत्रों को जोड़ना अव्यवस्थित शहरीकरण को बढ़ावा देगा।



रियल एस्टेट को बढ़ावा देना ही विकास नहीं

याचिका में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व फैसलों खासकर 2017 के एक महत्वपूर्ण निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया है कि मास्टर प्लान में बदलाव या विस्तार से पहले पर्यावरणीय आकलन, जनसुनवाई और पारदर्शी प्रक्रिया जरूरी है। लेकिन इस मामले में इन सभी आवश्यकताओं की अनदेखी की गई है। इस विस्तार से कृषि भूमि का नुकसान, भूजल स्तर में गिरावट, जंगलों और पर्यावरणीय क्षेत्रों पर दबाव तथा अनियंत्रित रियल एस्टेट गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।



बर्बाद हो जाएंगे गांवों के चारागाह

याचिका में कहा है कि इस फैसले से ग्राम पंचायतों की शक्तियां खत्म हो जाएंगी और लाखों ग्रामीण सीधे शहरी नियमों के दायरे में आ जाएंगे। इससे प्रशासनिक भ्रम और आर्थिक दबाव बढ़ेगा। इसके साथ सबसे बड़ा नुकसान गोचर भूमि, चारागाह और सामुदायिक संसाधनों के खात्मे का होगा। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन के रूप में भी प्रस्तुत किया है।



याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि इस अधिसूचना को रद्द किया जाए और 679 गांवों को पूर्व स्थिति में बहाल किया जाए। भविष्य में किसी भी विस्तार को कानूनी प्रक्रिया, पर्यावरणीय मानकों और जनभागीदारी के आधार पर ही लागू किया जाए। मामले में अंतरिम राहत के तौर पर इस अधिसूचना के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की भी मांग की गई है, ताकि अंतिम निर्णय तक कोई स्थायी नुकसान न हो सके।



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