अदालतों में संसाधनों का टोटा, रिटायरमेंट से 4 दिन पहले SC पहुंचे डीजे
समझें क्या है पूरा मामला
- जज को रात 2 बजे तक लिखने पड़ रहे हैं फैसले।
- अदालतों में स्टेनोग्राफर और जरूरी स्टाफ की कमी।
- हाई कोर्ट रजिस्ट्रार के खिलाफ अवमानना याचिका।
- सुप्रीम कोर्ट ने दी हाई कोर्ट में शिकायत रखने की छूट।
राजस्थान में एक सीनियर जिला जज को अपने फैसले लिखने के लिए रात 2 बजे तक काम करना पड़ रहा है। वजह काम का बोझ ही नहीं, बल्कि स्टेनोग्राफर और ऑफिस जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी बताई गई है।
मामला राजस्थान की अधीनस्थ न्यायपालिका से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो अदालतों में जजों को मिलने वाले संसाधनों पर भी सवाल खड़े हो गए। खास बात यह है कि शिकायत करने वाले जिला जज दिनेश कुमार गुप्ता 30 सितंबर को रिटायर होने वाले हैं।
स्टेनोग्राफर नहीं, खुद लिखने पड़ रहे फैसले
दिनेश कुमार गुप्ता फिलहाल जयपुर में लेबर कोर्ट-कम-इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के पीठासीन अधिकारी हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनके वकील सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने बताया कि गुप्ता राजस्थान के सीनियर मोस्ट जिला जज हैं, लेकिन उन्हें काम करने के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल रही हैं।
कोर्ट को बताया गया कि उनके पास स्टेनोग्राफर और ऑफिस तक की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इसी वजह से उन्हें फैसले लिखने का काम खुद करना पड़ रहा है और कई बार यह काम रात 2 बजे तक चलता है।
यह मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि अदालत में फैसले लिखने, आदेश तैयार करने और रोजाना के न्यायिक काम में सपोर्ट स्टाफ की बड़ी भूमिका होती है। ऐसे में एक सीनियर जिला जज की ओर से स्टेनोग्राफर जैसी सुविधा नहीं मिलने की शिकायत न्यायिक व्यवस्था में उपलब्ध संसाधनों का सवाल खड़ा करती है।
हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के खिलाफ अवमानना याचिका
गुप्ता ने राजस्थान हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल चंचल मिश्रा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका लगाई थी। उनका आरोप था कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से जनवरी 2026 में दिए गए निर्देशों का पालन नहीं किया गया।
25 सितंबर को इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने की। गुप्ता की तरफ से सीनियर एडवोकेट विकास सिंह पेश हुए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पहले नए चीफ जस्टिस के सामने रखें बात
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गुप्ता को फिलहाल राजस्थान हाईकोर्ट के स्तर पर अपनी शिकायत रखने को कहा।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट में नए चीफ जस्टिस ने जिम्मेदारी संभाली है। ऐसे में गुप्ता अपनी समस्याओं को उनके सामने प्रशासनिक स्तर पर रख सकते हैं।
इसके बाद विकास सिंह ने अवमानना याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। साथ ही गुप्ता की सभी शिकायतें उचित अथॉरिटी के सामने रखने और उन पर जल्द विचार की मांग करने की छूट मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी।
जनवरी में भी सुप्रीम कोर्ट ने दिए थे निर्देश
यह पहला मौका नहीं है जब दिनेश कुमार गुप्ता अपने सेवा से जुड़े मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।
इससे पहले उन्होंने अपने ट्रांसफर और पद के मुताबिक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं मिलने का मुद्दा उठाया था। उनका कहना था कि लेबर कोर्ट में उनकी पोस्टिंग प्रधान जिला जज के उनके मूल पद के मुताबिक नहीं है।
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तीन अहम निर्देश दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि गुप्ता का मूल पद प्रधान जिला जज का बना रहेगा। लेबर कोर्ट-कम-इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में रहते हुए भी उन्हें प्रधान जिला जज के मुताबिक वेतन-भत्ते मिलेंगे। साथ ही उन्हें किसी जूनियर अधिकारी या दूसरे जिला जज को रिपोर्ट नहीं करना होगा। उनका प्रशासनिक नियंत्रण संबंधित एडमिनिस्ट्रेटिव या पोर्टफोलियो जज के पास रहेगा।
रिटायरमेंट से चार दिन पहले फिर पहुंचा मामला
25 सितंबर को जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, तब गुप्ता के रिटायरमेंट में सिर्फ चार दिन बचे थे। कोर्ट में उठी उनकी शिकायत इसलिए सिर्फ एक अधिकारी की सुविधा तक सीमित नहीं रह जाती।
स्टेनोग्राफर और ऑफिस जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी का दावा अदालतों में काम की व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। हालांकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुविधाओं की कमी पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। कोर्ट ने गुप्ता को अपनी शिकायत राजस्थान हाईकोर्ट के नए चीफ जस्टिस के सामने रखने की छूट दी है।
अब गुप्ता की शिकायतों पर हाईकोर्ट के प्रशासनिक स्तर पर क्या फैसला होता है, यह देखना बाकी है। लेकिन रिटायरमेंट से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा यह मामला अधीनस्थ न्यायपालिका में जजों को मिलने वाले स्टाफ और संसाधनों की जरूरत को फिर चर्चा में ले आया है।
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