500 जानवरों की जान बचाने वाली उस जांबाज की कहानी, जिसने ठुकरा दी लाखों की रिश्वत
News In Short
- लेडी फॉरेस्ट गार्ड अनीता चौधरी बनीं शेरगढ़ अभयारण्य की शान।
- अनीता ने अब तक तस्करों के खिलाफ 50 से ज्यादा एफआईआर दर्ज कराई।
- जंगल के 500 बेजुबान जानवरों को मौत के मुंह से निकाला है।
- अनीता बाइक से रात 2 बजे भी जंगल में करती हैं गश्त।
- डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (WWF) ने उन्हें मछली नेशनल अवार्ड से नवाजा।
News In Detail
Baran:राजस्थान के बारां में शेरगढ़ के घने जंगलों में जब पत्तों के सूखने की आवाज आती है, तो अमूमन लोग सहम जाते हैं। लेकिन जब एक मोटरसाइकिल की गड़गड़ाहट इन झाड़ियों के बीच गूंजती है तो वन्यजीव प्रेमी चैन की सांस लेते हैं। शिकारी अपना बोरिया-बिस्तर समेटने लगते हैं। इस बाइक पर सवार हैं 30 साल की अनीता चौधरी। एक ऐसी महिला फॉरेस्ट गार्ड, जिनकी दहाड़ से बारां के स्मगलरों और अवैध खनन माफियाओं में खौफ फैला हुआ है।
गांव से 9,880 हेक्टेयर का साम्राज्य
अनीता की कहानी राजस्थान में झुंझुनूं जिले के एक छोटे से गांव अमरपुरा से शुरू होती है। यह गांव शेरगढ़ अभयारण्य से लगभग 300 किलोमीटर दूर है। आज से 10 साल पहले जब अनीता केवल 20 साल की थीं, उन्होंने वन रक्षक की वर्दी पहनी थी।
उनकी पहली पोस्टिंग कोटा के मुकाम बदोरा रेंज ऑफिस में हुई। लेकिन उनकी असली परीक्षा तब शुरू हुई जब उन्हें 2021 में बारां के शेरगढ़ अभयारण्य में तैनात किया गया। शेरगढ़ अभयारण्य 9,880 हेक्टेयर (लगभग 99 वर्ग किलोमीटर) में फैला हुआ है। इस विशाल जंगल का एक-तिहाई हिस्सा यानी लगभग 2,949 हेक्टेयर सीधे तौर पर अनीता की निगरानी में है।
मछली की तरह अडिग संकल्प
हाल ही में अनीता को डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (WWF) की ओर से मछली नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार रणथंभौर की मशहूर बाघिन मछली के नाम पर दिया जाता है। इस सम्मान के साथ उन्हें 50,000 रुपये का नकद पुरस्कार भी मिला। यह उनकी मेहनत का चौथा बड़ा सम्मान है। लेकिन अनीता के लिए यह पुरस्कार महज एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि उन 500 बेजुबान जानवरों की दुआएं हैं जिन्हें उन्होंने मौत के मुंह से निकाला है।
जब अनीता ने कार्यभार संभाला, तब शेरगढ़ की स्थिति दयनीय थी। जंगल में चरवाहों का कब्जा था। लोग अवैध रूप से लकड़ी काटने और जंगली सूअरों का शिकार करने के लिए स्वतंत्र थे। अनीता कहती हैं, शुरुआत में लोग मुझे गंभीरता से नहीं लेते थे। वे सोचते थे कि एक महिला उनका क्या बिगाड़ लेगी।
पहली एफआईआर के बाद बदला जंगल
अनीता ने चुप रहने के बजाय सख्त कदम उठाने का फैसला किया। उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ पहली एफआईआर दर्ज करवाई, जिसने एक जंगली सूअर को मार दिया था। यह शेरगढ़ के इतिहास में एक जंगली सूअर के शिकार पर हुई पहली एफआईआर थी। इसके बाद तो जैसे सिलसिला ही शुरू हो गया। पिछले तीन साल में उन्होंने शिकारियों, तेंदू पत्ता तस्करों और अवैध पत्थर खनन करने वालों के खिलाफ 50 से अधिक एफआईआर दर्ज करवाई हैं।
बाइक से रात 2 बजे भी गश्त
अनीता का जीवन किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं है। वह अपनी सहयोगी पूजा शर्मा के साथ जंगल के बीचों-बीच स्थित एक दो कमरों की चौकी में रहती हैं। इसे नाका किशनपुरा मसालदारन कहा जाता है। यहां बिजली की जगह सौर ऊर्जा का उपयोग होता है। खाना वे खुद बनाती हैं और बर्तन भी खुद धोती हैं।
जंगल में गश्त का कोई निश्चित समय नहीं होता। अनीता अक्सर रात के 2 बजे अपनी बाइक उठाकर निकल पड़ती हैं। पथरीले रास्ते, ऊबड़-खाबड़ जमीन और बारिश के मौसम में कीचड़ से भरी पगडंडियां-अनीता के इरादों को नहीं रोक पातीं। वे चेक डैम बनवाती हैं, बोरिंग करवाती हैं और वन्यजीवों के लिए छोटे तालाबों का निर्माण करवाती हैं ताकि गर्मी में जानवर जंगल से बाहर न जाएं।
धमकियां, रिश्वत और अटूट ईमानदारी
सच्चाई का रास्ता कभी आसान नहीं होता। अनीता को कई बार जान से मारने की धमकियां मिलीं। माफियाओं ने उनके तबादले करवाने की कोशिश की और लाखों रुपये की रिश्वत का लालच भी दिया। विभागीय अधिकारी बताते हैं कि अनीता की सख्ती की शिकायतें अक्सर ऊंचे स्तर तक पहुंचती हैं, लेकिन विभाग अपनी इस जांबाज सिपाही के साथ खड़ा है।
डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) अनुराग भटनागर कहते हैं, अनीता ने बिना किसी डर के काम किया है। उनकी वजह से उन इलाकों में भी अब वन्यजीव दिखाई देने लगे हैं, जहाँ से वे गायब हो चुके थे। अब शेरगढ़ में भालू के पदचिह्न और मधुमक्खियों के छत्ते फिर से दिखाई देने लगे हैं, जो एक स्वस्थ जंगल की निशानी है।
पिता ने किया मोटिवेट
अनीता की शादी को चार साल हो चुके हैं। उनके पति विनय झुंझुनूं में एक सीमेंट फैक्ट्री में काम करते हैं। वे दोनों एक-दूसरे से काफी दूर रहते हैं, लेकिन विनय अनीता के काम का पूरा सम्मान करते हैं। अनीता गर्व से कहती हैं, विनय ने मुझे जंगल और उसके कानूनों को समझने में हमेशा प्रेरित किया है।अनीता के पिता रघुवीर सिंह सेवानिवृत्त आर्मी सूबेदार हैं। उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक रहे हैं। उन्होंने ही अनीता को इस कठिन नौकरी को चुनने के लिए प्रोत्साहित किया था।
जंगल ही मेरा श्रृंगार
अनीता अपने चेहरे पर लगी धूप की कालिमा को गर्व से देखती हैं। वे कहती हैं, गर्मियों में गश्त करते समय चेहरा पहचान में नहीं आता, लेकिन यही मेरी पहचान है। उनके पास संवरने के लिए समय कम है, लेकिन जंगल को संवारने का जुनून सबसे ज्यादा है।
आज शेरगढ़ अभयारण्य केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि अनीता चौधरी के साहस की कहानी है। वह उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं जो चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। जब तक अनीता अपनी बाइक पर गश्त कर रही हैं, शेरगढ़ के परिंदे और जानवर सुरक्षित महसूस करते हैं।
ये भी पढे़:-
चंबल रिवरफ्रंट में ताजमहल-लाल किले की झलक, लेकिन घाटे का बन रहा सौदा, जानिए कौन है इसका जिम्मेदार
लेक्चरर और कोच प्रतियोगी परीक्षा का टाइम टेबल किया जारी, 3944 पदों पर होगी भर्ती
जाम से किरकिरी के बाद जयपुर की यातायात व्यवस्था में बड़ा बदलाव, ट्रैफिक पुलिस में कई फेरबदल
पंचायत-निकाय चुनाव: राजस्थान सरकार पहुंची हाईकोर्ट, दिसंबर तक चुनाव टालने की दलील