नहीं बदल रहा पुलिस का चेहरा, कांस्टेबल से लेकर आईपीएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के मैले दाग
योगेन्द्र योगी@जयपुर
राजस्थान में सत्ता की चाबी भले ही एक हाथ से दूसरे हाथ में चली गई हो, लेकिन पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली में भ्रष्टाचार का दीमक अभी भी बदस्तूर जारी है। सच्चाई यह है कि खाकी पर दाग लगने का सिलसिला कांस्टेबल से लेकर आईपीएस अधिकारियों तक पहुंच चुका है। राजस्थान पुलिस का ध्येय वाक्य अपराधियों में डर, आमजन में विश्वास है, लेकिन वह खुद अपने ही महकमे के भीतर पनप रहे भ्रष्टाचार से जूझ रही है।
प्रोबेशनर आईपीएस पर रक्तमणि के दाग
पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार की ताजा कड़ी में 2023 बैच के युवा आईपीएस अधिकारी का नाम जुड़ा है। भीलवाड़ा जिले के कोटड़ी थाना पुलिस ने हाल ही में गारनेट (रक्तमणि या तामड़ा) का अवैध खनन करने वालों से अवैध वसूली के आरोप में 4 लोगों को गिरफ्तार किया। जब इन आरोपियों से कड़ाई से पूछताछ की गई, तो 2023 बैच के प्रोबेशनर आईपीएस माधव उपाध्याय की भूमिका संदिग्ध पाई गई। उन्हें सरकार ने एपीओ कर दिया है।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि माधव उपाध्याय अभी अपना प्रोबेशन पूरा कर रहे थे। भीलवाड़ा एसपी धर्मेंद्र सिंह ने आरोपों को गंभीरता से लेते हुए उपाध्याय के खिलाफ जांच बैठा दी। इसके तुरंत बाद पुलिस मुख्यालय ने प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए उन्हें अगले आदेश तक एपीओ कर दिया। एक आईपीएस अधिकारी के करियर की शुरुआत में ही भ्रष्टाचार के आरोपों ने विभाग की छवि पर गहरा आघात किया है।
उदयपुर आईजी पर लगे दाग
इससे पहले मार्च 2026 में उदयपुर आईजी गौरव श्रीवास्तव पर एक आदिवासी की जमीन की जबरन रजिस्ट्री करने के गंभीर आरोप लगे। चित्तौड़गढ़ के आदिवासी गोपाललाल भील ने आरोप लगाया कि उदयपुर आईजी गौरव श्रीवास्तव, आरपीएस राजेश यादव और सुखेर थानाधिकारी रविंद्र चारण ने मिलकर उसकी करोड़ों की जमीन की जबरन रजिस्ट्री करा दी। कोर्ट के आदेश पर इन पुलिस अधिकारियों के मामला दर्ज हुआ है। इसकी जांच डीएसपी नीतू राठौड़ को सौंपी गई है। अगर आईजी स्तर के अधिकारी पर ऐसे आरोप लगते हैं तो आम आदमी न्याय के लिए किसके पास जाएगा। पुलिस का काम जमीन की दलाली करना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करना है।
जब एसीबी के शिकारी ही बन गए शिकार
भ्रष्टाचार रोकने का जिम्मा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो पर होता है। लेकिन क्या हो जब पहरेदार ही चोरी करने लगें? राजस्थान में साल 2025 में ऐसे कई मामले सामने आए, जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले अधिकारी ही रिश्वत लेते पकड़े गए। 20 मई 2025 को एसीबी के एडिशनल एसपी सुरेंद्र कुमार शर्मा को गिरफ्तार किया गया। उन पर आरोप था कि वे अन्य अधिकारियों से मंथली वसूलते थे।
सवाई माधोपुर में अपनी तैनाती के दौरान उन्होंने दलालों का जाल बिछा रखा था। विडंबना देखिए कि उनकी गिरफ्तारी उनके रिटायरमेंट से महज 40 दिन पहले हुई। 28 जून 2025 को जयपुर एसीबी ने झालावाड़ के एडिशनल एसपी जगराम मीणा को ट्रैप किया। उनका तबादला हो चुका था और वे विदा होकर जयपुर आ रहे थे। शिवदासपुरा टोल पर जब उनकी कार की औचक जांच की गई, तो उसमें 9 लाख 35 हजार रुपये नकद मिले। माना जा रहा है कि यह पैसा झालावाड़ से समेटी गई मासिक बंदी का हिस्सा था।
सवाई माधोपुर के ही डीएसपी भैरूलाल मीणा का किस्सा तो और भी दिलचस्प है। उन्होंने एक सुबह अपने दफ्तर में माइक थामकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर अलख जगाई। लेकिन नियति का खेल देखिए, अगले ही दिन उन्हें खुद रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार कर लिया गया।
डीजीपी की सख्ती: अवैध खनन पर गाज
अवैध बजरी खनन राजस्थान में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है। डीजीपी राजीव शर्मा ने इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए सीधी कार्रवाई शुरू की है। 24 दिसंबर 2025 को डीजीपी ने कोटा रेंज के दौरे के दौरान बूंदी के सिटी डीएसपी अरुण मिश्रा को तुरंत एपीओ कर दिया। वजह बजरी के अवैध खनन और परिवहन पर रोक लगाने में उनकी नाकामी बनी।
इसी तरह, केशोरायपाटन थाना प्रभारी हंसराज मीणा जब डीजीपी के सवालों का ठोस जवाब नहीं दे पाए, तो उन्हें लाइन हाजिर कर दिया गया। नयापुरा और कुन्हाड़ी थानों के प्रभारियों पर भी इसी तरह की कार्रवाई की गाज गिरी।
जब आईपीएस से ही मांग ली रिश्वत
राजस्थान पुलिस के भ्रष्टाचार का स्तर इस कदर बढ़ गया कि पुलिसकर्मियों ने अपने ही विभाग के बड़े अधिकारी को नहीं पहचाना। 23 जून 2025 को बीकानेर से जयपुर जा रहे एक आईपीएस अधिकारी को ट्रैफिक पुलिस ने रोका। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उनसे रिश्वत की मांग की।
आईपीएस अधिकारी (जो खुद एसीबी में तैनात थे) ने उन्हें परखने के लिए 500 का नोट थमा दिया। जैसे ही पुलिसकर्मी ने नोट जेब में रखा, आईपीएस अधिकारी ने अपना परिचय दिया। परिचय मिलते ही पुलिसकर्मियों के हाथ-पांव फूल गए और वे पैर पकड़कर माफी मांगने लगे। बीकानेर एसपी ने इस मामले में चार पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर किया। यह घटना बताती है कि निचले स्तर पर भ्रष्टाचार कितना बेखौफ हो चुका है।
होमगार्ड्स से भी कमीशन की वसूली
भ्रष्टाचार की हदें तब पार हो गईं जब होमगार्ड के जवानों की ड्यूटी लगाने के बदले उनसे पैसे मांगे जाने लगे। 30 अक्टूबर 2025 को एसीबी ने कंपनी कमांडर चंद्रशेखर को 4 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए ट्रैप किया।
जांच में खुलासा हुआ कि होमगार्ड जवानों को मिलने वाले 31 हजार रुपये के मानदेय पर चंद्रशेखर की नजर रहती थी। वह ड्यूटी लगाने के नाम पर पहले 3000 रुपये महीना लेता था, जिसे बाद में बढ़ाकर 5000 रुपये कर दिया गया। जवानों की नौकरी की अनिश्चितता का फायदा उठाकर अधिकारी उनका शोषण कर रहे थे।
हाईकोर्ट की फटकार और पुलिस के काले कारनामे
जोधपुर हाईकोर्ट ने भी पुलिस के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई है। 20 अगस्त 2025 को एक फैसले में कोर्ट ने इंस्पेक्टर जितेंद्र सिंह और उनके सहयोगियों के खिलाफ कठोर टिप्पणी की। मामला 70 लाख रुपये की रिश्वत की मांग का था।
पुलिस ने एक आरोपी को बचाने के लिए बड़ी डील की थी। जांच में सीसीटीवी फुटेज से खुलासा हुआ कि पुलिस ने जब्ती और गिरफ्तारी के रिकॉर्ड में भारी हेराफेरी की थी। कोर्ट ने इसे न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ माना।
पाली जिले में तो पुलिस ने खाकी को पूरी तरह शर्मसार कर दिया। अप्रैल 2023 में खुलासा हुआ कि हाईवे पर चल रहे देह व्यापार में खुद पुलिसकर्मी लिप्त थे। दलालों और पुलिस की ऐसी जुगलबंदी थी कि पुलिस की रेड से पहले ही दलालों के पास सूचना पहुंच जाती थी। तत्कालीन एसपी गगनदीप सिंगला ने मामले की तह तक जाकर चार पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया था।
जब डीजीपी खुद बने मजदूर
भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह जानने के लिए डीजीपी राजीव शर्मा ने दिसंबर 2025 में एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने 11 टीमें बनाईं और 'डिकॉय ऑपरेशन' (सादा वर्दी में खुफिया ऑपरेशन) चलाया।
पुलिस की ये टीमें सादा वर्दी में बजरी कारोबारी और मजदूर बनकर थानों में गईं। वहां उन्होंने अवैध बजरी निकालने के लिए सौदेबाजी की। दो दिन चले इस ऑपरेशन में कई थाना प्रभारियों की पोल खुल गई। इस स्ट्राइक के बाद 5 एसएचओ को सस्पेंड और 6 को निलंबित किया गया। साथ ही 15 अन्य पुलिसकर्मियों पर भी गाज गिरी।
बदलाव की दरकार
राजस्थान पुलिस में भ्रष्टाचार के ये मामले सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था की सड़न को दर्शाते हैं जिसे सुधारने के लिए कड़े कानूनी और नैतिक बदलावों की जरूरत है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन लेन-देन का यह खेल बंद होने का नाम नहीं ले रहा। जब तक विभाग के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों से लेकर निचले स्तर तक जवाबदेही तय नहीं होगी और अपराधियों के साथ-साथ भ्रष्ट पुलिसकर्मियों को भी सख्त सजा नहीं मिलेगी, तब तक आम जनता का विश्वास खाकी पर बहाल होना मुश्किल है।
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