सियासी पारा चढ़ा: पुष्कर में राहुल का पाठ, बेनीवाल का टकराव और भाजपा में अजेय एंट्री

Jinesh Jain | Jun 06, 2026, 18:11 IST
Photograph: (the sootr)
यह सप्ताह राजस्थान की राजनीति के लिए उतार-चढ़ाव भरा और रणनीतिक बिसात बिछाने वाला साबित हुआ है। राज्यसभा चुनावों की सुगबुगाहट से लेकर सांगठनिक फेरबदल, शीर्ष नेताओं के बीच अंदरूनी खींचतान और जमीन पर बढ़ते राजनीतिक टकराव से सियासी तापमान में उछाल देखा गया।

यह सप्ताह राजस्थान की राजनीति में सत्ता और संगठन के स्तर पर नए समीकरणों को गढ़ने वाला रहा। जहां एक ओर भाजपा अपने संगठन को दुरुस्त कर आंतरिक कलह को शांत करने की कोशिश कर रही है, वहीं कांग्रेस अपने जमीनी कैडर को प्रशिक्षित कर भविष्य की लड़ाई के लिए तैयार कर रही है। दूसरी तरफ हनुमान बेनीवाल और भाजपा का राजनीतिक टकराव तथा अलवर का धर्मांतरण विवाद यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में प्रदेश की जमीनी सियासत अधिक आक्रामक और ध्रुवीकृत होने वाली है। आइए, इस सप्ताह की पांच सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं का बारीक विश्लेषण करते हैं।



टिकटों का नया गणित और सामाजिक समीकरण

राजस्थान की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ी हलचल राज्यसभा की तीन सीटों को लेकर है। इसके लिए 18 जून को मतदान होना है। ये सीटें भाजपा के रवनीत सिंह बिट्टू और राजेंद्र गहलोत तथा कांग्रेस के नीरज डांगी का कार्यकाल पूरा होने से खाली हो रही हैं।



इस बार भाजपा का टिकट वितरण बेहद चौंकाने वाला रहा। पार्टी ने अपने दोनों सांसदों रवनीत सिंह बिट्टू और राजेंद्र गहलोत को दोबारा मौका न देकर पूरी तरह नए चेहरों पर दांव खेला है। भाजपा ने इस बार पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अलका गुर्जर को मैदान में उतारा है।



​इस फैसले के गहरे राजनीतिक मायने हैं। सतीश पूनिया को टिकट देकर भाजपा ने जाट समुदाय और पार्टी के पुराने सांगठनिक कैडर को संतुष्ट करने का प्रयास किया है, जबकि अलका गुर्जर के जरिए गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रों (पूर्वी राजस्थान) में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति बनाई है।


​


दूसरी ओर विपक्षी कांग्रेस ने एक बेहद सधा हुआ और सुरक्षित दांव खेला है। पार्टी ने लगातार दूसरी बार नीरज डांगी को अपना प्रत्याशी बनाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डांगी को दूसरा मौका देकर कांग्रेस आलाकमान ने अपने परंपरागत दलित वोट बैंक को यह संदेश दिया है कि पार्टी उनके प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर है। डांगी को दोबारा टिकट मिलना राज्य में कांग्रेस के अंदरूनी शक्ति संतुलन और गुटीय समीकरणों को शांत रखने के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है।



विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कुल 51 विधायकों (MLAs) के मतों की आवश्यकता है। राजस्थान की 200 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल कांग्रेस के पास 67 विधायक हैं, जो एक सीट आसानी से जीतने के लिए पर्याप्त हैं। वहीं भाजपा के पास दो सीटों को आसानी से निकालने का संख्या बल मौजूद है।



​यदि भाजपा ने अपना तीसरा या कोई निर्दलीय समर्थित उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा, तो यह चुनाव पूरी तरह से निर्विरोध संपन्न हो जाएगा और भाजपा को दो व कांग्रेस को एक सीट मिल जाएगी। हालांकि, यदि भाजपा तीसरी सीट के लिए भी दावेदारी ठोकती है तो उसे अन्य दलों और निर्दलीयों के कम से कम 35 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह जादुई आंकड़ा जुटाना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है।





Rajysabha election


भाजपा में अजेय कुमार की एंट्री

​राजस्थान भाजपा को लगभग ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार अपना नया संगठन महामंत्री मिल गया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के निर्देशों पर केंद्रीय महासचिव अरुण सिंह ने अजेय कुमार को इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त करने के आदेश जारी किए।



अजेय कुमार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के निवासी हैं और वे लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के समर्पित प्रचारक रहे हैं। इस नियुक्ति से पहले वे उत्तराखंड में प्रदेश संगठन महामंत्री के रूप में अपनी सांगठनिक कार्यकुशलता साबित कर चुके हैं। उनके पास पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मेरठ मंडल) जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में भाजपा के संगठन महामंत्री के रूप में काम करने का भी एक लंबा और समृद्ध अनुभव है।



​गौर करने वाली बात यह है कि जनवरी 2024 में तत्कालीन संगठन महामंत्री चंद्रशेखर का तेलंगाना स्थानांतरण होने के बाद से ही राजस्थान में यह पद खाली पड़ा हुआ था। इतने लंबे समय तक संगठन महामंत्री न होने के कारण प्रदेश भाजपा के भीतर नेताओं, मंत्रियों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की भारी कमी महसूस की जा रही थी।



पार्टी के भीतर कई छोटे-बड़े गुट सक्रिय हो गए थे, जो अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग अलाप रहे थे। अब अजेय कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन बिखरे हुए गुटों और अंतर्विरोधों को समाप्त कर सभी को एक मंच पर लाने की होगी।



यह नियुक्ति समय के लिहाज से भी काफी रणनीतिक है। राज्य में आगामी पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव बिल्कुल सिर पर हैं, और अगले विधानसभा चुनाव में भी अब केवल ढाई साल का समय शेष बचा है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने इस नियुक्ति पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि अजेय कुमार के व्यापक सांगठनिक अनुभव और कुशल रणनीतिक नेतृत्व से मरुधरा में पार्टी संगठन को एक नई ऊर्जा, अनुशासन और अभूतपूर्व मजबूती मिलेगी। अब देखना होगा कि अजेय कुमार संघ और संगठन के बीच की इस खाई को कितनी जल्दी पाट पाते हैं।



अनुशासन का पाठ और गहलोत की दूरी

कांग्रेस आलाकमान भी आगामी चुनौतियों को देखते हुए संगठन में नई जान फूंकने की कवायद में जुट गया है। पार्टी के संगठन सृजन अभियान के तहत अजमेर के पवित्र शहर पुष्कर में नवनियुक्त जिलाध्यक्षों के लिए 10 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया था।



इस शिविर का समापन कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी के संबोधन और जिलाध्यक्षों के साथ सीधे संवाद के साथ हुआ। राहुल गांधी विशेष विमान से किशनगढ़ हवाई अड्डे पहुंचे, जहां पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट, प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने उनकी अगवानी की।


​


हालांकि, इस पूरी यात्रा के दौरान एक घटना ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान सबसे ज्यादा खींचा। हवाई अड्डे पर राहुल का स्वागत करने के बाद पूर्व सीएम अशोक गहलोत पुष्कर शिविर में जाने के बजाय सीधे जयपुर लौट आए। उन्होंने अपनी इस अनुपस्थिति का कारण अत्यधिक थकावट बताया। लेकिन राजस्थान की सियासत को करीब से जानने वाले लोग इसे सिर्फ थकावट मानने को तैयार नहीं हैं। गहलोत का इस तरह ऐन वक्त पर राष्ट्रीय नेता के कार्यक्रम से दूरी बना लेना राजनीतिक हलकों में गहरी चर्चा और कयासबाजियों का विषय बना हुआ है।



पुष्कर के एक निजी रिसॉर्ट में आयोजित सत्रों में राहुल गांधी ने सीधे सांगठनिक कमजोरियों पर प्रहार किया। उन्होंने पार्टी के भीतर जारी कुर्सी की अंतहीन खींचतान पर निशाना साधते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा, मैं भली-भांति जानता हूं कि पार्टी के भीतर मेरे भी कुछ विरोधी मौजूद हैं। लेकिन आपसी खींचतान और गुटबाजी में अपनी व्यक्तिगत शक्ति का प्रदर्शन करना कांग्रेस की मूल विचारधारा के बिल्कुल खिलाफ है।



​राहुल ने सभी जिलाध्यक्षों को निर्देश दिया कि वे गुटबाजी से ऊपर उठकर जमीनी स्तर पर जनता से जुड़ें और संगठन को मजबूत करें। हालांकि, उन्होंने राजस्थान में वर्तमान सांगठनिक जोड़ी-प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली-के कामकाज की जमकर तारीफ की। राहुल ने दोनों नेताओं की पीठ थपथपाते हुए कहा कि वे मिलकर एक बेहतरीन टीम की तरह काम कर रहे हैं, जो देश के अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण है।



​बढ़ता राजनीतिक पारा: बेनीवाल बनाम भाजपा सरकार

​इस सप्ताह पश्चिमी राजस्थान की राजनीति में भारी उबाल देखने को मिला। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के सुप्रीमो और सांसद हनुमान बेनीवाल तथा प्रदेश की भाजपा सरकार के बीच चल रहा गतिरोध अब खुले टकराव में बदल चुका है।



इस टकराव की मुख्य वजह सांसद बेनीवाल द्वारा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के खिलाफ की गई कुछ कथित विवादित और तीखी टिप्पणियां रहीं। इस बयानबाजी से आक्रोशित भाजपा और बेनीवाल के समर्थकों के बीच जमीनी स्तर पर भी तनाव बढ़ गया।



इसी बीच जब भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ नागौर के कुचामन दौरे पर पहुंचे, तो बेनीवाल के समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने न केवल मदन राठौड़ को काले झंडे दिखाए, बल्कि उनके काफिले और गाड़ी को भी घेरकर जमकर नारेबाजी की।



​राज्य सरकार ने इस कानून-व्यवस्था के उल्लंघन और वीआईपी सुरक्षा में चूक की घटना को बेहद गंभीरता से लिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए नागौर के पुलिस अधीक्षक (SP) ज्ञानचंद यादव को तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया गया। इसके साथ ही कुचामन के स्थानीय तहसीलदार और थानाधिकारी (SHO) का भी आनन-फानन में तबादला कर दिया गया।



इससे पहले सरकार ने हनुमान बेनीवाल की सुरक्षा में तैनात तीन पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर्स (PSOs) को भी वापस बुला लिया था। इस कदम के जवाब में बेनीवाल ने भी कानूनी रुख अपनाते हुए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ को मानहानि का कानूनी नोटिस भेज दिया है।



​यह राजनीतिक रंजिश उस समय और अधिक बढ़ गई जब 4 जून 2026 की रात को नागौर की खींवसर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक रेवंतराम डांगा के काफिले पर हमला हुआ। विधायक डांगा अपनी फॉर्च्यूनर गाड़ी से गुजर रहे थे, तभी गोविंद टोल नाके के पास एक तेज रफ्तार कैंपर गाड़ी ने उनकी कार को जानबूझकर जोरदार टक्कर मारी।



रेवंतराम डांगा ने पिछले चुनाव में खींवसर सीट पर हनुमान बेनीवाल की पत्नी को पराजित किया था, जिससे दोनों परिवारों और दलों के बीच पुरानी राजनीतिक अदावत है। ​आरोप है कि हमलावरों ने पूरी योजना के तहत हाईवे पर विधायक की गाड़ी को रोका था, जबकि एक अन्य सफेद स्कॉर्पियो गाड़ी उनके लिए बैकअप का काम कर रही थी।



हमलावरों का तरीका किसी पेशेवर अपराधी जैसा था। हालांकि, विधायक और उनके कमांडो ने अदम्य साहस दिखाते हुए हमलावरों का लगभग 25 किलोमीटर तक पीछा किया और बैकअप वाहन (स्कॉर्पियो) को घेरकर पकड़ लिया। मुख्य कैंपर गाड़ी के सवार अंधेरे का फायदा उठाकर भागने में सफल रहे। पुलिस इस मामले की कड़ियों को बेनीवाल के साथ चल रहे विवाद से जोड़कर देख रही है, जिसने नागौर के सियासी माहौल को पूरी तरह से गरमा दिया है।





ChatGPT Image Jun 6, 2026, 04_53_41 PM

कोर्ट परिसर में हाई-वोल्टेज ड्रामा

राजनीतिक उठापटक के बीच इस सप्ताह अलवर जिला एक गंभीर सांप्रदायिक और सामाजिक विवाद का केंद्र बन गया। अलवर में कथित अवैध धर्मांतरण के मामले को लेकर शुक्रवार को अदालत परिसर में उस समय बेहद तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई, जब अपने बयानों के लिए चर्चा में रहने वाले पूर्व भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने कानून को अपने हाथ में ले लिया।



कोर्ट परिसर में सुनवाई के लिए लाए गए मुख्य आरोपी पादरी राजकुमार को देखते ही आहूजा ने अपना आपा खो दिया और पुलिसकर्मियों की भारी मौजूदगी के बीच आरोपी पादरी को सरेआम एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। ​इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया है, जिसमें आरोपी पादरी अपना गाल सहलाता नजर आ रहा है। ज्ञानदेव आहूजा चिल्लाते हुए कह रहे हैं-हिंदू होकर पादरी बन रहा है, हरामजादे... इसे कड़ी रिमांड पर लेना जरूरी है।



स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए वहां तैनात पुलिसकर्मी तुरंत आरोपी को सुरक्षित स्थान पर ले गए। अलवर सिटी के पुलिस उपाधीक्षक (DSP) अंगद शर्मा ने इस घटना की आधिकारिक पुष्टि करते हुए कहा कि पूर्व विधायक द्वारा कोर्ट परिसर में की गई यह मारपीट पूरी तरह गैर-कानूनी है और इस मामले की गहन जांच कर आहूजा के खिलाफ नियमानुसार सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।


​


इस पूरे विवाद की जड़ें गुरुवार को अलवर की तंवर कॉलोनी में हुई एक पुलिस छापेमारी से जुड़ी हैं। पुलिस को पुख्ता सूचना मिली थी कि कॉलोनी के एक निजी मकान में चंगाई सभा और प्रार्थना सभा की आड़ में बड़े पैमाने पर संदिग्ध गतिविधियां चलाई जा रही हैं। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के प्रांत संयोजक प्रेम सिंह राजावत ने आरोप लगाया कि वहां दिल्ली से आए पादरी राजकुमार द्वारा भोले-भाले और गरीब हिंदुओं को उनकी गंभीर बीमारियां चमत्कारी रूप से ठीक करने का झांसा दिया जा रहा था। अंधविश्वास फैलाकर और आर्थिक प्रलोभन देकर उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाया जा रहा था।



​विहिप नेताओं का दावा है कि मौके से भारी मात्रा में आपत्तिजनक धार्मिक साहित्य और दस्तावेज भी बरामद किए गए हैं, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणियां थीं। स्थानीय निवासी नितिन कुमार सैनी की शिकायत पर पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए मुख्य आरोपी को गिरफ्तार किया था, लेकिन ज्ञानदेव आहूजा के इस थप्पड़ कांड ने इस कानूनी मामले को एक बड़े राजनीतिक विवाद में तब्दील कर दिया है।



ये भी पढे़:-

पढ़ाई और बकरी चराना साथ-साथ, फिर छठे प्रयास में आईएएस बने राम प्रकाश



सेविंग अकाउंट से मोहभंग, एफडी की तरफ भाग रहे भारतीय



क्यों हल्की आंधियां भी दिल्ली-एनसीआर तक ले जा रही हैं राजस्थान की धूल, जानिए पूरा कारण



कैसे भारतीयों के डेटा, पैसों और मजबूरियों पर खड़ा हुआ वीजा सेंटर का अरबों का खेल, जानिए पूरा मामला



Tags:
  • सतीश पूनिया
  • गोविंद सिंह डोटासरा
  • अशोक गहलोत
  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
  • हनुमान बेनीवाल
  • भजनलाल शर्मा
  • रवनीत सिंह बिट्टू
  • मदन राठौड़
  • ज्ञानदेव आहूजा
  • टीकाराम जूली
  • नीरज डांगी
  • राजेंद्र गहलोत
  • अलका गुर्जर