पढ़ाई और बकरी चराना साथ-साथ, फिर छठे प्रयास में आईएएस बने राम प्रकाश
Jageshwar prasad | Jun 06, 2026, 13:00 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान कैडर के आईएएस राम प्रकाश का सफर गरीबी और संघर्ष से होकर IAS तक पहुंचने की प्रेरक कहानी है। बकरी चराने और कठिन परीक्षाओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। आज वह अजमेर में जनता की सेवा करते हैं, सादगी और हौसले का प्रतीक बने हुए हैं।
अक्सर हम IAS, IPS, IFS जैसे अफसरों को उनके बंगलों, गाड़ियों और कमांडिंग स्टाइल में देखते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि इनमें से कितने ऐसे भी हैं, जिनके पैरों में जूते नहीं थे, जिनके हाथों में किताबों के बजाय बकरियों की रस्सी थी? आज हम बात कर रहे हैं ऐसे ही एक IAS अधिकारी की, जिन्होंने गांव की पगडंडियों पर बकरियां चराईं और फिर छठे प्रयास में देश की सबसे कठिन परीक्षा को पास करके दिखाया।
यह कहानी है आईएएस राम प्रकाश की, जो आज राजस्थान कैडर के 2018 बैच के अधिकारी हैं और अजमेर जनपद में CEO जिला परिषद के पद पर तैनात हैं। लेकिन उनकी असली पहचान यह पद नहीं है, बल्कि वह संघर्ष है, जिसने उन्हें एक मामूली बकरी चराने वाले लड़के से IAS अफसर बना दिया।
कुछ दिनों पहले आईएएस राम प्रकाश ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट शेयर किया, जो वायरल हो गया। यह कोई राजनीतिक टिप्पणी या सरकारी घोषणा नहीं थी, बल्कि उनके बचपन की एक साधारण, मासूम और आंखें नम कर देने वाली घटना थी।
उन्होंने लिखा जून, 2003 में हम 5-6 लोग बकरियां चराने गए थे। वहीं एक आम के पेड़ की डाल पर झूला झूल रहे थे। अचानक से डाल टूट गई। किसी को चोट तो नहीं लगी, लेकिन मार खाने से बचने के लिए हम लोग मिलकर पेड़ की डाल ही उठा लाए थे, जिससे पता ही न चले कि डाल टूटी है या नहीं।
यह सुनकर पहले तो हंसी आती है - बच्चों जैसी मासूम चालाकी। डाल टूट गई तो डाल ही उठा ली, ताकि पेड़ के मालिक को पता न चले और डांट न पड़े। लेकिन इसी हास्य के पीछे वह गरीबी और सादगी झलकती है, जहां बच्चों के लिए बकरी चराना दिनचर्या था और पेड़ से गिरना मार खाने का डर।
आगे उन्होंने बताया अक्सर पढ़ाई के बाद बकरी चराने जाना भी उनके रूटीन में शामिल था। गांव में हर दिन स्कूल के बाद वो बकरी चराने जाते थे, क्योंकि पढ़ाई और बकरी चराना - ये दोनों ही एक साथ चलता रहा। ये कोई एक दिन की बात नहीं थी, बल्कि ये रोजमर्रा का काम हो गया था।
इस एक ट्वीट ने हजारों लोगों को वापस उनके बचपन में ले जाने का काम किया। ग्रामीण भारत की वह तस्वीर उभर कर सामने आई, जहां बच्चे स्कूल यूनिफॉर्म में ही बकरियां लेकर खेतों की ओर निकल जाते हैं, किताबों के साथ बकरियों की रस्सी भी थामे रहते हैं।
IAS राम प्रकाश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के जमुआ बाजार के रहने वाले हैं। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। उन दिनों खेती और पशुपालन ही ग्रामीण परिवारों की आय का मुख्य स्रोत हुआ करता था।
राम प्रकाश ने अपनी शुरुआती पढ़ाई वाराणसी के रोहनिया स्थित श्रद्धानंद सरस्वती इंटरमीडिएट कॉलेज से की। यह स्कूल भी बहुत महंगा या शहरी सुविधाओं वाला नहीं था, लेकिन यहीं से उनके सपनों को उड़ान मिली।
जब वह 12वीं कक्षा में थे, तब 2007 में उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। गांव में उस समय UPSC जैसी परीक्षा की कोई जानकारी नहीं थी। सब कुछ धीरे-धीरे आकार ले रहा था। लेकिन अंदर कुछ ऐसी चिंगारी थी कि वह सिर्फ बकरी चराने वाला लड़का नहीं रहना चाहते थे। वह अधिकारी बनना चाहते थे।
राम प्रकाश की कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा है उनका यूपीएससी का संघर्ष। यहां कोई शॉर्टकट नहीं है। यहां लगातार हारना और फिर भी हार न मानना सीखना पड़ता है। IAS राम प्रकाश ने UPSC की परीक्षा लगातार छह बार दी। पांच बार वह असफल रहे। कई बार प्रारंभिक परीक्षा पास नहीं कर पाए। कभी मेन्स में मंजिल नहीं मिली। कभी इंटरव्यू तक पहुंचकर पिछड़ गए।
साल 2018 राम प्रकाश के जीवन का सबसे बड़ा साल था। उनके छठे प्रयास में सफलता उनके कदम चूमने आई। इस बार उन्होंने ऑल इंडिया रैंक (AIR) 162 हासिल की। उन्हें 2025 अंकों में से 1041 अंक मिले।
वह भी एक ऐसे समय में जब UPSC के इंटरव्यू (साक्षात्कार) में 275 अंकों में से अधिकतर लोगों को कम नंबर मिलते हैं। लेकिन राम प्रकाश ने इंटरव्यू में 151 नंबर हासिल किए - जो काफी उत्कृष्ट प्रदर्शन था।
वह 2018 बैच के IAS अधिकारी बने। और उन्हें राजस्थान कैडर मिला।
IAS बनने के बाद राम प्रकाश की पहली तैनाती झालावार जिले के भवानी मंडी और फिर अजमेर के ब्यावर में SDM (उप जिलाधिकारी) के रूप में हुई। एक SDM के रूप में उनकी पहचान बेहद मेहनती और जनता से जुड़े अधिकारी की बनी। वह पाली में CEO जिला परिषद भी रहे। वहां उन्होंने ग्रामीण विकास, पानी, बिजली, स्कूलों और सड़कों पर काम करवाया।
लेकिन सबसे खास बात यह है कि आज भी वह उतने ही सादे हैं, जितने बकरी चराने वाले दिनों में हुआ करते थे। उनके ट्विटर हैंडल पर 65 हजार से अधिक फॉलोअर्स हैं, लेकिन वह हर पोस्ट में विनम्रता और ग्रामीण सादगी की झलक देते हैं।
IAS राम प्रकाश आज अपने हर साक्षात्कार और सोशल मीडिया पोस्ट में युवाओं को यही संदेश देते हैं कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, बस हौसला मत हारो। मैंने पांच बार यूपीएससी के प्रयासों में हार देखी, लेकिन जब छठी बार सफलता मिली, तो एहसास हुआ - असफलता तो सिर्फ एक सीढ़ी थी।
वह कहते हैं कि जब वह बकरियों के साथ खेतों में बैठते थे, तब भी उनके मन में एक अधिकारी बनने का सपना था। उस सपने ने उन्हें कभी झुकने नहीं दिया।
IAS राम प्रकाश की कहानी सिर्फ एक सरकारी अधिकारी का जीवन-वृत्त नहीं है। यह हर उस मां-बाप की कहानी है, जो अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए भूखे रह जाते हैं। यह हर उस बच्चे की कहानी है, जो स्कूल के बाद खेतों में जाता है, लेकिन सपने उड़ान भरना नहीं छोड़ता।
जब राम प्रकाश लिखते हैं कि उन्होंने बकरी चराने के बाद पेड़ की टूटी डाल उठा ली थी ताकि मार न पड़े, तो इस वाक्य में उनकी मासूमियत के साथ-साथ एक पूरा समाज झलकता है, जहां बच्चों को मामूली गलती पर डांट और पिटाई झेलनी पड़ती थी।
लेकिन उसी डर और संघर्ष ने उन्हें देश का एक जिम्मेदार अधिकारी बना दिया। आज जब वह अजमेर जिले में जनता की समस्याएं सुनते हैं, तो हर किसान, हर गरीब, हर मजदूर की पीड़ा उन्हें महसूस होती है। क्योंकि वह भी कभी उस पीड़ा से गुजरे थे।
IAS राम प्रकाश का यह सफर यही सिखाता है - सपने कोई नहीं देखता, बस उसे पूरा करने का संकल्प चाहिए। और हां, कभी पेड़ की डाल टूट जाए तो उठा लेना, मगर हौसला मत टूटने देना।
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यह कहानी है आईएएस राम प्रकाश की, जो आज राजस्थान कैडर के 2018 बैच के अधिकारी हैं और अजमेर जनपद में CEO जिला परिषद के पद पर तैनात हैं। लेकिन उनकी असली पहचान यह पद नहीं है, बल्कि वह संघर्ष है, जिसने उन्हें एक मामूली बकरी चराने वाले लड़के से IAS अफसर बना दिया।
बचपन की वह हास्य-व्यंग्य भरी घटना, जिसने लोगों को किया इमोशनल
उन्होंने लिखा जून, 2003 में हम 5-6 लोग बकरियां चराने गए थे। वहीं एक आम के पेड़ की डाल पर झूला झूल रहे थे। अचानक से डाल टूट गई। किसी को चोट तो नहीं लगी, लेकिन मार खाने से बचने के लिए हम लोग मिलकर पेड़ की डाल ही उठा लाए थे, जिससे पता ही न चले कि डाल टूटी है या नहीं।
यह सुनकर पहले तो हंसी आती है - बच्चों जैसी मासूम चालाकी। डाल टूट गई तो डाल ही उठा ली, ताकि पेड़ के मालिक को पता न चले और डांट न पड़े। लेकिन इसी हास्य के पीछे वह गरीबी और सादगी झलकती है, जहां बच्चों के लिए बकरी चराना दिनचर्या था और पेड़ से गिरना मार खाने का डर।
आगे उन्होंने बताया अक्सर पढ़ाई के बाद बकरी चराने जाना भी उनके रूटीन में शामिल था। गांव में हर दिन स्कूल के बाद वो बकरी चराने जाते थे, क्योंकि पढ़ाई और बकरी चराना - ये दोनों ही एक साथ चलता रहा। ये कोई एक दिन की बात नहीं थी, बल्कि ये रोजमर्रा का काम हो गया था।
इस एक ट्वीट ने हजारों लोगों को वापस उनके बचपन में ले जाने का काम किया। ग्रामीण भारत की वह तस्वीर उभर कर सामने आई, जहां बच्चे स्कूल यूनिफॉर्म में ही बकरियां लेकर खेतों की ओर निकल जाते हैं, किताबों के साथ बकरियों की रस्सी भी थामे रहते हैं।
मिर्जापुर से वाराणसी तक
राम प्रकाश ने अपनी शुरुआती पढ़ाई वाराणसी के रोहनिया स्थित श्रद्धानंद सरस्वती इंटरमीडिएट कॉलेज से की। यह स्कूल भी बहुत महंगा या शहरी सुविधाओं वाला नहीं था, लेकिन यहीं से उनके सपनों को उड़ान मिली।
जब वह 12वीं कक्षा में थे, तब 2007 में उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। गांव में उस समय UPSC जैसी परीक्षा की कोई जानकारी नहीं थी। सब कुछ धीरे-धीरे आकार ले रहा था। लेकिन अंदर कुछ ऐसी चिंगारी थी कि वह सिर्फ बकरी चराने वाला लड़का नहीं रहना चाहते थे। वह अधिकारी बनना चाहते थे।
छह प्रयास, पांच असफलताएं - एक IAS को जन्म देने वाली जिद
साल 2018 राम प्रकाश के जीवन का सबसे बड़ा साल था। उनके छठे प्रयास में सफलता उनके कदम चूमने आई। इस बार उन्होंने ऑल इंडिया रैंक (AIR) 162 हासिल की। उन्हें 2025 अंकों में से 1041 अंक मिले।
वह भी एक ऐसे समय में जब UPSC के इंटरव्यू (साक्षात्कार) में 275 अंकों में से अधिकतर लोगों को कम नंबर मिलते हैं। लेकिन राम प्रकाश ने इंटरव्यू में 151 नंबर हासिल किए - जो काफी उत्कृष्ट प्रदर्शन था।
वह 2018 बैच के IAS अधिकारी बने। और उन्हें राजस्थान कैडर मिला।
राजस्थान में तैनाती - एसडीएम से सीईओ तक का सफर
लेकिन सबसे खास बात यह है कि आज भी वह उतने ही सादे हैं, जितने बकरी चराने वाले दिनों में हुआ करते थे। उनके ट्विटर हैंडल पर 65 हजार से अधिक फॉलोअर्स हैं, लेकिन वह हर पोस्ट में विनम्रता और ग्रामीण सादगी की झलक देते हैं।
उन युवाओं के लिए संदेश जो हार मान लेते हैं
वह कहते हैं कि जब वह बकरियों के साथ खेतों में बैठते थे, तब भी उनके मन में एक अधिकारी बनने का सपना था। उस सपने ने उन्हें कभी झुकने नहीं दिया।
ChatGPT Image Jun 6, 2026, 12_59_19 PM
जब राम प्रकाश लिखते हैं कि उन्होंने बकरी चराने के बाद पेड़ की टूटी डाल उठा ली थी ताकि मार न पड़े, तो इस वाक्य में उनकी मासूमियत के साथ-साथ एक पूरा समाज झलकता है, जहां बच्चों को मामूली गलती पर डांट और पिटाई झेलनी पड़ती थी।
लेकिन उसी डर और संघर्ष ने उन्हें देश का एक जिम्मेदार अधिकारी बना दिया। आज जब वह अजमेर जिले में जनता की समस्याएं सुनते हैं, तो हर किसान, हर गरीब, हर मजदूर की पीड़ा उन्हें महसूस होती है। क्योंकि वह भी कभी उस पीड़ा से गुजरे थे।
IAS राम प्रकाश का यह सफर यही सिखाता है - सपने कोई नहीं देखता, बस उसे पूरा करने का संकल्प चाहिए। और हां, कभी पेड़ की डाल टूट जाए तो उठा लेना, मगर हौसला मत टूटने देना।
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