सरहदी और नए जिलों में क्यों पिछड़ रही जन-धन योजना, जानिए पूरा मामला

Ashish Bhardwaj | Apr 06, 2026, 17:52 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान के सरहदी और नए जिलों में प्रधानमंत्री जन-धन योजना पिछड़ रही है। बैंकों के दिलचस्पी नहीं लेने से लोगों के खाते नहीं खुल पा रहे हैं। यह योजना शहरी क्षेत्रों तक सिमट कर रह गई है।

News In Short

  • राजस्थान में जन-धन योजना में जरूरतमंद लोगों के बैंकों में नहीं खुल पा रहे खाते।
  • आंकड़ों के अनुसार यह योजना ​केवल नगरीय क्षेत्रों तक सिमट कर रह गई।
  • सरहदी और नए जिलों में खासकर निजी बैंक योजना के तहत नहीं खोल रही खाते।
  • सांसद हनुमान बेनीवाल का आरोप, खाता खोलने की प्रक्रिया को जटिल बना रहे निजी बैंक।
  • विशेषज्ञों की राय, इस योजना में निजी बैंकों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता।

News In Detail

Jaipur: राजस्थान में प्रधानमंत्री जन-धन योजना के क्रियान्वयन को लेकर सवाल निशान खड़े हो गए हैं। सरकारी आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि जहां राजधानी जयपुर और बड़े शहरों में बैंकिंग का जाल मजबूत हुआ है, वहीं प्रदेश के सीमावर्ती और नए जिले डिजिटल इंडिया के इस युग में भी जरूरतमंद लोग बैंकिंग सेवाओं के लिए तरस रहे हैं।



अंतिम व्यक्ति तक कनेक्टिविटी का संकट

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस योजना में खाते खोलने में सबसे अधिक कमी नवगठित जिलों में देखी गई है। फलोदी (1,319) और बालोतरा (1,630) जैसे जिलों में बैंक खातों की संख्या नगण्य है। जैसलमेर (7,637), धौलपुर (4,878), सिरोही (11,142) और प्रतापगढ़ (12,845) में भी खातों की संख्या काफी कम है। यह दर्शाता है कि योजना का लाभ अभी भी राजस्थान के दूरस्थ अंचलों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है।



​सांसद बेनीवाल के गंभीर आरोप

सांसद हनुमान बेनीवाल ने इस मामले को संसद में उठाते हुए सरकार का ध्यान इस बात पर खींचा कि निजी बैंक अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों के पात्र लोगों के आवेदन प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं या खाते खोलने से हिचकिचाते हैं। उनके अनुसार यह रवैया उन कमजोर वर्गों को बैंकिंग प्रणाली से बाहर रख रहा है, जिनके लिए यह योजना विशेष रूप से डिजाइन की गई थी।



​संसद में सरकार का पक्ष

हालांकि, वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में कहा कि 2014 में शुरू की गई प्रधानमंत्री जन-धन योजना का मुख्य उद्देश्य हर बिना बैंक खाते वाले वयस्क को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना है। निजी क्षेत्र के बैंकों सहित सभी बैंक इस मिशन का हिस्सा हैं और उनके प्रदर्शन की नियमित निगरानी की जा रही है।



सरकार के अनुसार बैंकों को लक्ष्य दिए गए हैं। जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। आरबीआई के एकीकृत लोकपाल योजना और CPGRAM पोर्टल जैसे तंत्र शिकायतों के निवारण के लिए सक्रिय हैं।



शहरों का दबदबा, गांवों में सन्नाटा

आंकड़ों से स्पष्ट है कि शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नामांकन संख्या बहुत अधिक है, जबकि ग्रामीण और नवगठित जिलों में स्थिति चिंताजनक है।



​शीर्ष प्रदर्शन करने वाले जिले

जयपुर 1,42,935 खाता



उदयपुर 1,39,491 खाता



अजमेर 89,894 खाता



बाड़मेर 77,300 खाता



जोधपुर 72,608 खाता



सबसे कम प्रदर्शन करने वाले जिले

जैसलमेर 7,637 खाता



धौलपुर 4,878 खाता



डीडवाना-कुचामन 4,631 खाता



बालोतरा 1,630 खाता



फलोदी 1,319 खाता



​बीमा योजनाओं की स्थिति और भी खराब

सिर्फ बैंक खाते ही नहीं, बल्कि जन-धन खातों के साथ मिलने वाली सुरक्षा योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना की स्थिति भी कई जिलों में दयनीय है। कई जिलों में इन बीमा योजनाओं के तहत नामांकन या तो शून्य है या उनकी रिपोर्ट ही नहीं की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीमा की पहुंच कम होना यह दर्शाता है कि बैंकिंग अवसंरचना और जागरूकता की कमी गहरी है।



विफलता के पीछे मुख्य कारण

  • ​विशेषज्ञों ने इस असमान वितरण के लिए इन कारकों को जिम्मेदार ठहराया है:​
  • कई ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की शाखाओं या बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट की भारी कमी है।
  • ग्रामीण आबादी अभी भी इन योजनाओं के लाभों और प्रक्रिया से अनजान है।
  • बैंक स्तर पर कागजी कार्रवाई और तकनीकी जटिलताएं आम आदमी के लिए बाधा बन रही हैं।
  • नए जिलों में प्रशासनिक और बैंकिंग ढांचा अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है।

बैंकों की जवाबदेही जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है​ कि ​यद्यपि सरकार ने लक्ष्य आवंटन और निगरानी प्रणालियों का हवाला दिया है, लेकिन ज़मीनी आंकड़े बताते हैं कि जरूरतमंद लोगों तक बैंकों की पहुंच का लक्ष्य अभी भी अधूरा सपना बना हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक निजी बैंकों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक अंतिम व्यक्ति तक बैंकिंग सुविधा पहुंचाना बड़ी चुनौती बनी रहेगी।



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