राजस्थान में बिना जरूरी मशीनों के हजारों वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट देने का आरोप, हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी निगरानी पर सवाल
राजस्थान में सड़कों पर दौड़ रहे वाहनों की फिटनेस जांच को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। प्रदेश के परिवहन कार्यालयों में जरूरी टेस्टिंग उपकरणों के बिना बड़ी संख्या में वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने के आरोप सामने आए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राज्य के 59 परिवहन कार्यालयों और उपकेंद्रों में वाहनों की जांच व्यवस्था में खामियां रही हैं।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि राजस्थान हाईकोर्ट पहले ही फिटनेस जांच के लिए जरूरी उपकरण और ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (ATS) को लेकर स्पष्ट निर्देश दे चुका है। अब सवाल यह है कि जिन वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट मिले, उनकी तकनीकी जांच किस तरीके से की गई? क्या सभी जरूरी परीक्षण हुए या केवल कागजी प्रक्रिया पूरी कर प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए?
चार महीने में 1.28 लाख से ज्यादा फिटनेस सर्टिफिकेट
सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल से जुलाई 2025 के बीच प्रदेश में बड़ी संख्या में फिटनेस सर्टिफिकेट जारी किए गए। रिपोर्ट में अप्रैल में 24,309, मई में 32,764, जून में 34,131 और जुलाई में 37,771 प्रमाणपत्र जारी होने के आंकड़े दिए गए हैं।
इस तरह चार महीने में कुल 1,28,975 फिटनेस सर्टिफिकेट जारी हुए। हालांकि, इन सभी प्रमाणपत्रों को फर्जी या बिना जांच के जारी हुआ मानना सही नहीं होगा। इसके लिए संबंधित कार्यालयों के रिकॉर्ड और वाहनों की जांच रिपोर्ट का मिलान जरूरी है।
हाईकोर्ट ने उपकरणों के बिना फिटनेस जांच पर लगाई थी रोक
राजस्थान हाईकोर्ट ने वाहनों की फिटनेस जांच को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि जिन RTO और DTO कार्यालयों में संशोधित नियमों के मुताबिक जरूरी उपकरण उपलब्ध नहीं हैं, वे फिटनेस सर्टिफिकेट जारी नहीं कर सकते।
अदालत ने 15 अप्रैल 2026 से ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन के जरिए फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था को अनिवार्य रूप से लागू करने का निर्देश भी दिया था। हालांकि, संबंधित न्यायिक आदेशों में कुछ वाहन श्रेणियों और पुरानी जांच व्यवस्था को लेकर संशोधन का उल्लेख भी है।
ब्रेक और हेडलाइट की जांच क्यों जरूरी?
वाहन का फिटनेस सर्टिफिकेट केवल एक सरकारी दस्तावेज नहीं है। इसका सीधा संबंध सड़क पर चलने वाले यात्रियों और दूसरे वाहन चालकों की सुरक्षा से है। फिटनेस जांच में वाहन के ब्रेक, हेडलाइट, सस्पेंशन और दूसरे जरूरी तकनीकी हिस्सों की स्थिति देखी जाती है। अगर इनकी सही जांच नहीं हो, तो खराब वाहन भी सड़क पर चलने के योग्य घोषित हो सकता है।
खासकर बसों, ट्रकों और दूसरे कमर्शियल वाहनों के मामले में यह जोखिम ज्यादा गंभीर हो सकता है। सामने आए आरोपों से यह साबित नहीं होता कि प्रमाणपत्र पाने वाले सभी वाहन तकनीकी रूप से खराब थे।
15 अप्रैल 2026 के बाद कितने सर्टिफिकेट जारी हुए?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल हाईकोर्ट के निर्देश लागू होने के बाद की स्थिति को लेकर है। क्या 15 अप्रैल 2026 के बाद भी ऐसे परिवहन कार्यालयों से फिटनेस सर्टिफिकेट जारी हुए, जहां जरूरी उपकरण नहीं थे?
यदि ऐसा हुआ है तो यह पता करना जरूरी होगा कि संबंधित कार्यालयों को किस नियम या आदेश के तहत प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति थी। इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि विभाग ने पुराने प्रमाणपत्रों की जांच कराई या नहीं। अगर किसी वाहन की जांच निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नहीं हुई, तो उसकी दोबारा जांच कराने की क्या व्यवस्था है?
परिवहन विभाग का पक्ष सामने आना बाकी
इस मामले में परिवहन विभाग से यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संबंधित अवधि में किन कार्यालयों में फिटनेस जांच की मशीनें उपलब्ध थीं और किन कार्यालयों में नहीं। इसके अलावा विभाग ने हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद क्या कदम उठाए, कितने ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन चालू हुए और क्या किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई, इन सवालों के जवाब भी महत्वपूर्ण हैं।
फिलहाल इन आरोपों पर परिवहन विभाग का सत्यापित पक्ष उपलब्ध नहीं है। विभाग का जवाब मिलने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी। वाहनों की फिटनेस से जुड़ा यह मामला सिर्फ प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया का नहीं, बल्कि सड़क पर सफर करने वाले लाखों लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ा है।