पूर्व आईएएस की ऑटो वाली फरारी, चुनाव का पेच और दिग्गज नेताओं की खामोशी
हाजिर है इस सप्ताह की राजस्थानी साप्ताहिक चिट्ठी। इस सप्ताह की तस्वीर मिली-जुली रही। एक तरफ जहां कानून अपना काम करता दिखा, वहीं दूसरी तरफ पंचायत-निकाय चुनाव समय पर कराने को लेकर सरकार की उदासीनता बरकरार नजर आई।
राजस्थान में मार्च की चढ़ती धूप के साथ सियासत और गलियारों में भी तपिश बढ़ गई है। इस सप्ताह भी भ्रष्टाचार के खेल में पूर्व आईएएस सुबोध अग्रवाल की लुका-छिपी चलती दिखाई दी। वहीं, जेल की सलाखों के पीछे से सोनम वांगचुक की रिहाई की राहत भरी खबर आई है। रिश्तों की मर्यादा और लोकतंत्र की जिम्मेदारी के बीच यह हफ्ता राजस्थान के लिए काफी उथल-पुथल भरा रहा।
पूर्व आईएएस सुबोध अग्रवाल का हाई-वोल्टेज ड्रामा
राजस्थान के चर्चित जल जीवन मिशन घोटाले में मुख्य आरोपी रिटायर्ड आईएएस सुबोध अग्रवाल ने इन दिनों जांच एजेंसियों की नाक में दम कर रखा है। एसीबी की टीम उनके पीछे है और सुबोध अग्रवाल किसी मंझे हुए फिल्मी अपराधी की तरह चकमा दे रहे हैं। अपनी लोकेशन छिपाने के लिए उन्होंने लग्जरी गाड़ियों को छोड़कर आम आदमी' की सवारी यानी ऑटो रिक्शा को अपना हथियार बनाया है।
खबर है कि उन्होंने फरारी के दौरान अब तक 60 से ज्यादा वाहन बदले हैं, जिनमें 40 तो सिर्फ ऑटो थे। लुकआउट नोटिस की वजह से वे हवाई सफर कर नहीं सकते और ट्रेन-बस पर कड़ी नजर है, इसलिए वे सड़क मार्ग से छोटे-छोटे पड़ाव तय कर रहे हैं।
एक पूर्व आईएएस अधिकारी का इस तरह भागना सिस्टम पर कई सवाल खड़े करता है। अदालत ने भी उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया है। अगर वे जल्द सामने नहीं आते, तो उनकी संपत्ति कुर्क करने की तैयारी है। यह मामला दिखाता है कि जब रसूखदार लोग कानून के घेरे में आते हैं तो वे अपनी बुद्धि का इस्तेमाल न्याय में सहयोग करने के बजाय उसे अटकाने में कैसे करते हैं।
सोनम वांगचुक: जोधपुर जेल से आजादी की ओर
जोधपुर की सेंट्रल जेल में पिछले 6 महीनों से बंद लद्दाख के आइकन सोनम वांगचुक के लिए यह सप्ताह राहत की खबर लेकर आया। केंद्र सरकार ने उन पर लगा कड़ा कानून राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) हटा लिया है। इसके बाद उनकी जेल से रिहाई हो गई।
वांगचुक लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर आंदोलनरत थे। उन्हें पिछले साल सितंबर में लेह में हुई हिंसा के बाद गिरफ्तार कर जोधपुर शिफ्ट किया गया था। सरकार का मानना था कि उनके अनशन से शांति भंग हो सकती है।
वांगचुक ने अपनी हिरासत की आधी अवधि (लगभग 170 दिन) पूरी कर ली है। केंद्र के इस फैसले को एक 'नरम रुख' के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे लद्दाख में जारी गतिरोध को संवाद के जरिए सुलझाने की उम्मीद जगी है। मारवाड़ की जेल से उनकी रिहाई केवल एक व्यक्ति की रिहाई नहीं, बल्कि एक बड़े आंदोलन के नए मोड़ की आहट है।
पंचायत चुनाव: तारीखों पर 'ओबीसी आरक्षण' का ग्रहण
राजस्थान में गांव की सरकार और नगर पालिकाओं के चुनाव को लेकर सस्पेंस कायम है। कोर्ट की डेडलाइन 15 अप्रैल पास आ रही है, लेकिन चुनाव आयोग और सरकार के बीच पत्राचार का दौर ही थम नहीं रहा। सबसे बड़ी समस्या है ओबीसी आरक्षण। अभी तक ओबीसी वार्डों के निर्धारण की स्पष्ट रिपोर्ट नहीं है। पिछड़ा वर्ग आयोग का कहना है कि उसे जो डेटा दिया गया, उसमें बहुत कमियां हैं।
राज्य चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि यदि देरी हुई तो यह अदालती अवमानना होगी। आयोग ने एक वैकल्पिक रास्ता भी सुझाया है-सुप्रीम कोर्ट के सुरेश महाजन मामले का हवाला देते हुए कहा गया है कि यदि ओबीसी का 'ट्रिपल टेस्ट' पूरा नहीं हो पा रहा, तो उन सीटों को सामान्य मानकर चुनाव करवा दिए जाएं। अब गेंद सरकार के पाले में है-क्या वह रिस्क लेकर चुनाव कराएगी या फिर कोर्ट से समय मांगेगी?
बजट सत्र: रजिस्टर में हाजिरी, पर मुद्दों पर खामोशी
राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र 11 मार्च को खत्म हुआ। 24 दिन चले इस सत्र ने एक अजीबोगरीब रिकॉर्ड बनाया। सदन के दो सबसे अनुभवी चेहरे अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे पूरे सत्र में सिर्फ एक-एक दिन नजर आए। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों ने न तो कोई सवाल पूछा, न ही किसी बहस में हिस्सा लिया। क्या यह नई पीढ़ी को मौका देना है या कुछ और?
विधानसभा में 30 विधायक ऐसे थे जिन्होंने प्रश्न तो लगाए, लेकिन जब बोलने का समय आया तो सदन में मौजूद ही नहीं थे। हालांकि सभी 200 विधायकों ने रजिस्टर में हस्ताक्षर किए, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल दस्तखत करना ही जनता के प्रति जवाबदेही है? जब प्रदेश के कद्दावर नेता ही सक्रिय नहीं होंगे, तो नए विधायकों को संसदीय गरिमा का पाठ कौन पढ़ाएगा?
जसोल परिवार में मर्यादा और व्यक्तिगत फैसले की जंग
इस हफ्ते की सबसे चौंकाने वाली खबर राजनीति के दिग्गज रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय जसवंत सिंह जसोल के परिवार से आई। पूर्व सांसद मानवेंद्र सिंह के कथित दूसरे विवाह ने परिवार के भीतर एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।
सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में मानवेन्द्र सिंह की 90 वर्षीय मां शीतल कंवर उन्हें घर में घुसने से रोकती नजर आईं। उन्होंने साफ कहा कि वे इस नए रिश्ते को स्वीकार नहीं करेंगी। मानवेन्द्र सिंह की पहली पत्नी चित्रा सिंह का 2024 में निधन हो गया था। इसके बाद मानवेन्द्र सिंह के इस नए कदम ने जसोल परिवार की परंपराओं और मान-मर्यादा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
मानवेंद्र सिंह बाड़मेर-जैसलमेर की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं। मां द्वारा उनसे नाता तोड़ने और भाजपा नेतृत्व को इसकी सूचना देने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य पर भी सवाल उठने लगे हैं। यह घटना बताती है कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्तियों के लिए निजी फैसले कभी-कभी कितनी बड़ी सामाजिक और पारिवारिक कीमत मांगते हैं।
अगले सप्ताह फिर मिलेंगे नई चिट्ठी के साथ!
ये भी पढे़:-
जोधपुर जेल से रिहा हुए सोनम वांगचुक, 170 दिन बाद सोनम वांगचुक से हटा NSA
बिजली प्लांट के लिए 1.19 लाख पेड़ों की बलि की तैयारी, कूनो से दूरी है मात्र 15 किलोमीटर
RPSC में महिला अधिकारी से अभद्रता, 11 कर्मचारियों पर लगे आरोप, नोटिस जारी