आरएएस 2024: किसी ने सिलाई की तो किसी ने भेड़-बकरी बेचकर बेटे को बनाया आरएएस, सफलता की वो दास्तां जिन्हें पढ़कर आ जाएं आंखों में आंसू
News In Short
- आरएएस 2024 के परिणाम ने बताया कि संघर्षों की जीत होती है, यदि सही दिशा में किया जाए।
- राजवीर सिंह ने विकलांगता को हराकर आरएएस 2024 में चौथी रैंक हासिल की।
- लोकेंद्र सिंह के परिवार ने बेटे की पढ़ाई के लिए बकरियां बेचीं, अब क्लास-1 अफसर बनेंगे।
- महेंद्र भाटी ने सिलाई के साथ पढ़ाई की और 72वीं रैंक प्राप्त की।
- बकरी चराने वाले पिता के बेटे सुशील मीणा ने एसटी श्रेणी में तीसरी रैंक हासिल की।
News In Detail
Jaipur: राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) द्वारा जारी आरएएस परीक्षा2024 का परिणाम केवल एक मेरिट लिस्ट नहीं है, बल्कि यह उन संघर्षों की जीत है जिन्होंने अभावों को अपना हथियार बनाया। इन नतीजों ने साबित कर दिया कि राजमहलों से ज्यादा अब तंग गलियों और खेतों-खलिहानों से आरएएस अधिकारी निकल रहे हैं। आइए जानते हैं उन जांबाजों की कहानी, जिनकी मेहनत के आगे किस्मत भी नतमस्तक हो गई।
दोनों हाथ नहीं, नजर भी धुंधली; पर राजवीर के हौसलों ने रचा इतिहास
महवा (सलेमपुर) के राजवीर सिंह की कहानी मोटिवेशनल (motivational) और जोश भर देने वाली है। साल 2005 में एक धमाके ने राजवीर से उनके दोनों हाथ छीन लिए और आंखों की रोशनी भी बेहद कम कर दी। ऐसी शारीरिक स्थिति के बावजूद राजवीर ने हार नहीं मानी। बिना किसी कोचिंग के सिर्फ सेल्फ स्टडी के दम पर उन्होंने दिव्यांग कोटे में पूरे प्रदेश में चौथी रैंक हासिल की है। 2021 में वे इंटरव्यू तक पहुंचे थे लेकिन चयन नहीं हुआ। इस बार उनके माता-पिता, विक्रम सिंह और अंगूरी देवी का सपना सच हो गया।
पिता चराते थे भेड़-बकरी, जीजा ने भरी फीस; लोकेंद्र बने अफसर
बीकानेर के छत्तरगढ़ निवासी लोकेंद्र सिंह ने आरएएस में 33वीं रैंक हासिल की है। लोकेंद्र का परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर था। लोकेंद्र के पिता भेड़-बकरी पालकर परिवार का गुजारा करते थे। कई बार बेटे की पढ़ाई के लिए उन्होंने अपने पशु तक बेच दिए। जब जयपुर में कोचिंग की भारी-भरकम फीस देने की बारी आई, तो लोकेंद्र के फौजी जीजा ने अपनी जमापूंजी से फीस भरी। आज लोकेंद्र की सफलता ने पूरे बीकानेर का मान बढ़ाया है।
सिलाई मशीन की खटखट के बीच बुना 'अफसर' बनने का ख्वाब
जोधपुर के महेंद्र भाटी की 72वीं रैंक इस बात का सबूत है कि काम छोटा होता है, पर सपने नहीं। महेंद्र का पूरा परिवार लेडीज कपड़ों की सिलाई का काम करता है। महेंद्र ने अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए खुद भी सिलाई का काम किया। दिन भर कपड़ों की सिलाई करने के बाद जो समय बचता, उसे वे किताबों को देते थे। आज उनकी मेहनत ने उनके परिवार के हाथों की सुई को 'कलम की ताकत' में बदल दिया है।
बकरी चराकर पाला परिवार, बेटे ने एसटी कैटेगरी में किया टॉप
बस्सी के झोपला ढाणी के रहने वाले सुशील मीणा की कहानी भी कम प्रेरक नहीं है। उनके पिता छुट्टनलाल ने पूरी उम्र बकरियां चराकर अपने बेटे को पढ़ाया। सुशील ने आरएएस में एसटी (ST) कैटेगरी में पूरे राजस्थान में तीसरा स्थान हासिल किया है। एक चरवाहे के बेटे का प्रशासनिक अधिकारी बनना उस पूरे इलाके के लिए गौरव का विषय बन गया है।
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