सरिस्का टाइगर रिजर्व के खौफनाक रास्तों पर 157 किमी पैदल गश्त, बाघों के बीच काटी रातें

Ashish Bhardwaj | Apr 19, 2026, 10:43 IST
Photograph: (the sootr)
यह कहानी सरिस्का की जाबांज महिला वन रक्षक कोमल सैनी की है। उसने न केवल जंगल के खौफनाक रास्तों पर 157 किलोमीटर पैदल गश्त की, बल्कि टाइगर से भी सामना हुआ। वह आज इस टाइगर रिजर्व की पहचान बन गई है।

सुनील जैन @ अलवर



शाम का धुंधलका राजस्थान के टाइगर रिजर्व सरिस्का के घने जंगलों पर उतर रहा था। परिंदों का शोर थमने लगा था और रात के शिकारियों की आहटें शुरू होने वाली थीं। ऐसे में एक दुबली-पतली, लेकिन फौलादी इरादों वाली परछाईं हाथ में डंडा और पीठ पर बैग टांगे सूखी पत्तियों की चरचराहट के बीच आगे बढ़ रही थी। यह कोमल थीं—सरिस्का टाइगर रिजर्व की वनरक्षक कोमल सैनी। मार्च 2026 की एक तारीख जब इतिहास के पन्नों में दर्ज हुई, तो आंकड़ा चौंकाने वाला था। कोमल ने एक महीने में 157 किलोमीटर पैदल गश्त की। यह कोई आम सड़क नहीं थी, यह पत्थरों, कंटीली झाड़ियों और आदमखोरों के इलाके का रास्ता था।



जहां मौत और जिंदगी के बीच बस एक पल का फासला

अलवर बफर जोन के प्रतापबंध चौकी के अधीन आती है-अंधेरी बीट। नाम जैसा, वैसा ही इसका काम। यह इलाका सरिस्का के सबसे खतरनाक हिस्सों में गिना जाता है। घना जंगल इतना कि सूरज की रोशनी भी जमीन को छूने के लिए संघर्ष करती है।



​यहीं कोमल सैनी की ड्यूटी है। ढाई साल पहले जब उन्होंने वन विभाग जॉइन किया था, तब शायद उन्होंने नहीं सोचा था कि उनका सामना जंगल के राजा से इतनी जल्दी और इतनी बार होगा। कोमल बताती हैं, सुबह की ट्रैकिंग हो या शाम की पेट्रोलिंग, हमें हर पल सतर्क रहना पड़ता है। यहां बाघ, बाघिन और उनके शावकों का मूवमेंट लगातार बना रहता है।



​वो रात... और बाघिन से सामना

​जंगल में ड्यूटी करना सिर्फ नौकरी नहीं, मौत से आंख मिचौली है। कोमल याद करती हैं कि कई बार गश्त के दौरान उनका सामना बाघिन और उसके शावकों से हुआ।



वे कहती हैं, जब आप पैदल होते हैं और सामने अचानक कोई शिकारी जानवर आ जाए, तो दिल की धड़कन रुक सी जाती है। लेकिन वर्दी का साहस हमें पीछे हटने नहीं देता।



​रात के वक्त जब अंधेरा गहरा जाता है, तब कोमल वाहनों के जरिए गश्त करती हैं। साथ में होमगार्ड के जवान होते हैं। वह बताती हैं कि रात के सन्नाटे में जब हेडलाइट की रोशनी में बाघिन के शावक खेलते हुए दिखते हैं, तो डर और गर्व का एक मिला-जुला अहसास होता है कि हम इन बेजुबानों की सुरक्षा के लिए तैनात हैं।



​157 किलोमीटर की गश्त बनी मिसाल

​सरिस्का प्रशासन ने अब एक नई और सराहनीय पहल शुरू की है। एम-स्ट्राइप्स (M-STrIPES) पैट्रोलिंग ऐप के डेटा के आधार पर जो कर्मचारी सबसे ज्यादा पैदल गश्त करता है, उसे सम्मानित किया जाता है।



मार्च 2026 में कोमल सैनी ने सबको पीछे छोड़ दिया। उन्होंने 157 किलोमीटर की दूरी पैदल चलकर तय की। यह दूरी सिर्फ आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि एक महिला वनरक्षक ने उन दुर्गम पहाड़ियों और नालों को अपने पैरों से नापा है, जहां पहुंचना नामुमकिन सा लगता है।



चुनौतियों का पहाड़ और हौसलों की उड़ान

​एक महिला वनरक्षक की जिंदगी फूलों की सेज नहीं है। चिलचिलाती धूप हो या कड़ाके की ठंड, ड्यूटी कभी नहीं रुकती। त्योहार हो या कोई निजी संकट, कोमल जैसे वनकर्मियों के लिए जंगल ही उनका पहला घर है।घने जंगलों में कई बार मोबाइल के सिग्नल गायब हो जाते हैं। ऐसे में वॉकी-टॉकी ही एकमात्र सहारा होता है। अवैध शिकारियों से लेकर जंगली जानवरों तक, खतरा हर कदम पर मौजूद है।



इन सबके बावजूद कोमल के चेहरे पर शिकन नहीं दिखती। वह आज उन तमाम लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं जो खाकी वर्दी पहनकर देश और प्रकृति की सेवा करना चाहती हैं।



​सम्मान और प्रोत्साहन

​कोमल सैनी की इस असाधारण उपलब्धि के लिए उन्हें वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक स्तर पर सम्मानित किया जाएगा। उन्हें नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र दिया जाएगा। लेकिन सम्मान का सिलसिला यहीं नहीं रुकने वाला।



​राजस्थान अधीनस्थ वन कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री रामवीर गुर्जर ने इस पहल का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों द्वारा कर्मचारियों को इस तरह प्रोत्साहित करना एक अनूठी पहल है। इससे कर्मचारियों का मनोबल बढ़ता है।


गुर्जर ने घोषणा की है कि संगठन जल्द ही एक भव्य समारोह आयोजित करेगा, जिसमें कोमल सैनी और उनके साथी घनश्याम सैनी को सम्मानित किया जाएगा।



​जंगल की असली रक्षक

​कोमल सैनी की कहानी हमें सिखाती है कि साहस किसी जेंडर का मोहताज नहीं होता। सरिस्का के पत्थरों पर कोमल के जूतों के निशान इस बात की गवाही दे रहे हैं कि अब महिलाएं भी जंगल की रक्षक बनकर अवैध शिकार और प्राकृतिक असंतुलन के खिलाफ दीवार बनकर खड़ी हैं।



जब अगली बार आप सरिस्का की वादियों में बाघ की दहाड़ सुनें, तो याद रखिएगा कि उस दहाड़ को सुरक्षित रखने के लिए कोमल जैसी बेटियां दिन-रात जंगलों में पहरा दे रही हैं। कोमल सैनी का 157 किलोमीटर का सफर राजस्थान के हर उस युवा के लिए एक सबक है जो मेहनत और ईमानदारी से अपनी पहचान बनाना चाहता है।



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