लोकसेवकों की सुरक्षा से लेकर आरक्षण के दायरे तक, जानिए हाई कोर्ट के 5 बड़े फैसले
Mukesh Sharma | Apr 19, 2026, 10:27 IST
Photograph: (the sootr)
इस सप्ताह के कोर्ट निर्णयों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि राजस्थान हाई कोर्ट प्रक्रियाओं के मशीनी उपयोग के सख्त खिलाफ है। चाहे वह लोक सेवकों के खिलाफ एफआईआर का मामला हो या किसी को भगोड़ा घोषित करने का।
Jaipur: इस सप्ताह राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायशास्त्र के विभिन्न पहलुओं पर कई दूरगामी और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए हैं। वैवाहिक विवादों में पारदर्शिता से लेकर लोक सेवकों की सुरक्षा और आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों तक कोर्ट के इन फैसलों ने न केवल कानूनी प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया है, बल्कि नागरिक अधिकारों और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के बीच एक संतुलन भी स्थापित किया है।
वैवाहिक विवादों, विशेषकर भरण-पोषण (Maintenance) के मामलों में अक्सर आय को लेकर विवाद रहता है। राजस्थान हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि पति को अपनी पत्नी की नौकरी और आय से संबंधित दस्तावेज प्राप्त करने का पूर्ण कानूनी अधिकार है, ताकि वह भरण-पोषण के दावे का प्रभावी ढंग से विरोध कर सके।
हाई कोर्ट ने रजनीश बनाम नेहा (2020) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि वैवाहिक विवादों में दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति और आय का हलफनामा (Affidavit of Disclosure) देना अनिवार्य है।
कोर्ट ने माना कि न्याय के हित में यह आवश्यक है कि भरण-पोषण की राशि का निर्धारण वास्तविक तथ्यों पर आधारित हो। यदि पत्नी आय अर्जित कर रही है और पति के पास इसके सबूत नहीं हैं, तो वह संबंधित विभागों या नियोक्ता से दस्तावेज मंगवाने के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकता है।
चेक बाउंस (NI Act) के मामलों में अक्सर देखा गया है कि आरोपी के अनुपस्थित होने पर उसे तुरंत भगोड़ा घोषित कर दिया जाता है। हाई कोर्ट ने इस परिपाटी पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक व्यक्ति को राहत प्रदान की है।
कोर्ट ने कहा कि केवल कुछ तारीखों पर पेश न होने या जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने मात्र से किसी व्यक्ति पर भगोड़ा का ठप्पा नहीं लगाया जा सकता।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए 'सभी उचित प्रयास' किए गए हैं या नहीं।
धारा 82/83 (CrPC/BNSS) की कार्यवाही से पहले कोर्ट को यह संतुष्ट होना चाहिए कि आरोपी जानबूझकर न्याय से बचने के लिए छिपा हुआ है। यह निर्णय आरोपियों के मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोपों के बीच लोक सेवकों को झूठी शिकायतों से बचाने के लिए हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को सतर्क रहने का निर्देश दिया है।
बीएनएसएस (BNSS) की नई धाराओं का संदर्भ: कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट BNSS की धारा 175(3) के तहत लोक सेवकों के खिलाफ मशीनी अंदाज (Mechanical manner) में एफआईआर दर्ज करने के आदेश नहीं दे सकते।
एफआईआर का आदेश देने से पहले BNSS की धारा 223(2) के तहत प्रदान किए गए वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन करना अनिवार्य है। इसमें अक्सर सक्षम अधिकारी से पूर्व स्वीकृति (Sanction) की आवश्यकता को देखा जाता है।
कोर्ट का तर्क है कि लोक सेवकों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान डराने-धमकाने या प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई जाने वाली फर्जी शिकायतों से बचाया जा सके।
राजस्थान सरकार की उस दलील को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि एड-हॉक (तदर्थ) आधार पर की गई नियुक्तियां नियमितीकरण के दावे को विफल कर देती हैं।
एक कर्मचारी जिसने 28 वर्षों से अधिक समय तक सेवा दी थी, उसे केवल इस आधार पर नियमित नहीं किया जा रहा था कि उसकी नियुक्ति स्वीकृत पद के विरुद्ध नहीं बल्कि एड-हॉक थी।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी दशकों तक निरंतर कार्य कर रहा है, तो उसकी शुरुआती नियुक्ति का 'एड-हॉक' स्वरूप उसके नियमितीकरण के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। यह फैसला उन हजारों संविदा और तदर्थ कर्मचारियों के लिए उम्मीद की किरण है जो लंबे समय से सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
आरक्षण के मुद्दे पर संवैधानिक स्पष्टता प्रदान करते हुए हाई कोर्ट ने एक बार फिर 'डोमिसाइल' (मूल निवास) और आरक्षण के अंतर्संबंधों को स्पष्ट किया है।
अदालत ने कहा कि प्रत्येक राज्य में पिछड़े वर्गों (OBC/SC/ST) की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थितियां अलग-अलग होती हैं।
यह मान लेना गलत होगा कि एक राज्य का पिछड़ा वर्ग दूसरे राज्य में भी उसी समान परिस्थितियों में है। इसलिए, उत्तर प्रदेश या हरियाणा जैसे अन्य राज्यों के आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार राजस्थान में केवल 'सामान्य' श्रेणी में ही विचारणीय होंगे।
यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों की पुष्टि करता है जो कहते हैं कि आरक्षण का लाभ केवल उसी राज्य के मूल निवासियों तक सीमित है जहां वह श्रेणी अधिसूचित है।
सुशासन की कसौटी पर रसूखदार, भ्रष्टाचार के जाल में फंसी टॉपर और रेगिस्तान का नया सूरज
SI भर्ती रद्द होने के बाद संकट में था भविष्य, अब RAS परीक्षा में इन 8 अभ्यर्थियों ने लहराया सफलता का परचम
आज की तारीख में एक भी ट्रोमा सेंटर सही नहीं, कैग के हवाले से भाजपा विधायक ने अपनी सरकार की खोली पोल
RAS 2024 Result: लगातार मेहनत और दृढ़ संकल्प से हासिल की तीसरी रैंक, जानिए नवनीत शर्मा की सफलता की कहानी
पत्नी की आय के दस्तावेज प्राप्त करना पति का अधिकार
हाई कोर्ट ने रजनीश बनाम नेहा (2020) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि वैवाहिक विवादों में दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति और आय का हलफनामा (Affidavit of Disclosure) देना अनिवार्य है।
कोर्ट ने माना कि न्याय के हित में यह आवश्यक है कि भरण-पोषण की राशि का निर्धारण वास्तविक तथ्यों पर आधारित हो। यदि पत्नी आय अर्जित कर रही है और पति के पास इसके सबूत नहीं हैं, तो वह संबंधित विभागों या नियोक्ता से दस्तावेज मंगवाने के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकता है।
'भगोड़ा' घोषित करने की प्रक्रिया: जल्दबाजी पर रोक
कोर्ट ने कहा कि केवल कुछ तारीखों पर पेश न होने या जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने मात्र से किसी व्यक्ति पर भगोड़ा का ठप्पा नहीं लगाया जा सकता।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए 'सभी उचित प्रयास' किए गए हैं या नहीं।
धारा 82/83 (CrPC/BNSS) की कार्यवाही से पहले कोर्ट को यह संतुष्ट होना चाहिए कि आरोपी जानबूझकर न्याय से बचने के लिए छिपा हुआ है। यह निर्णय आरोपियों के मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
मजिस्ट्रेट की शक्तियों पर अंकुश
बीएनएसएस (BNSS) की नई धाराओं का संदर्भ: कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट BNSS की धारा 175(3) के तहत लोक सेवकों के खिलाफ मशीनी अंदाज (Mechanical manner) में एफआईआर दर्ज करने के आदेश नहीं दे सकते।
एफआईआर का आदेश देने से पहले BNSS की धारा 223(2) के तहत प्रदान किए गए वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन करना अनिवार्य है। इसमें अक्सर सक्षम अधिकारी से पूर्व स्वीकृति (Sanction) की आवश्यकता को देखा जाता है।
कोर्ट का तर्क है कि लोक सेवकों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान डराने-धमकाने या प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई जाने वाली फर्जी शिकायतों से बचाया जा सके।
एड-हॉक नियुक्ति और कर्मचारियों को बड़ी राहत
एक कर्मचारी जिसने 28 वर्षों से अधिक समय तक सेवा दी थी, उसे केवल इस आधार पर नियमित नहीं किया जा रहा था कि उसकी नियुक्ति स्वीकृत पद के विरुद्ध नहीं बल्कि एड-हॉक थी।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी दशकों तक निरंतर कार्य कर रहा है, तो उसकी शुरुआती नियुक्ति का 'एड-हॉक' स्वरूप उसके नियमितीकरण के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। यह फैसला उन हजारों संविदा और तदर्थ कर्मचारियों के लिए उम्मीद की किरण है जो लंबे समय से सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
एक राज्य का लाभ दूसरे राज्य में देय नहीं
अदालत ने कहा कि प्रत्येक राज्य में पिछड़े वर्गों (OBC/SC/ST) की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थितियां अलग-अलग होती हैं।
यह मान लेना गलत होगा कि एक राज्य का पिछड़ा वर्ग दूसरे राज्य में भी उसी समान परिस्थितियों में है। इसलिए, उत्तर प्रदेश या हरियाणा जैसे अन्य राज्यों के आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार राजस्थान में केवल 'सामान्य' श्रेणी में ही विचारणीय होंगे।
यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों की पुष्टि करता है जो कहते हैं कि आरक्षण का लाभ केवल उसी राज्य के मूल निवासियों तक सीमित है जहां वह श्रेणी अधिसूचित है।
ये भी पढे़:-
SI भर्ती रद्द होने के बाद संकट में था भविष्य, अब RAS परीक्षा में इन 8 अभ्यर्थियों ने लहराया सफलता का परचम
आज की तारीख में एक भी ट्रोमा सेंटर सही नहीं, कैग के हवाले से भाजपा विधायक ने अपनी सरकार की खोली पोल
RAS 2024 Result: लगातार मेहनत और दृढ़ संकल्प से हासिल की तीसरी रैंक, जानिए नवनीत शर्मा की सफलता की कहानी
MP कर्मचारी प्रमोशन: 10 साल बाद पदोन्नति, अब 4 साल की छूट पर अटका मामला, राज्य कर्मचारी संघ ने सीएम मोहन यादव से की मांग
By Atul Dwivedi
एमपी भाजपा में 30 सितंबर को तीन दिग्गजों की एकसाथ आमद, 236 दिन बाद मिला प्रदेश संगठन महामंत्री
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश भाजपा में अब लक्ष्मण रेखा कौन खींचेगा? चंद्रशेखर की होगी असली परीक्षा
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश के किसानों को बड़ी राहत: मिनी ट्रैक्टर पर मिलेगी 50 प्रतिशत तक सब्सिडी, ऑनलाइन पोर्टल पर ऐसे करें आवेदन
By Jitendra Shrivastava
mp-top-news: खबरें काम की... ब्राह्मणों ने कभी शासन नहीं किया, नरोत्तम मिश्रा बोले खामोशी को कमजोरी न समझें
By Sanjay Dhiman
झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे
By Sanjay Gupta
बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा
By Arun Tiwari