ढ़ाई साल बाद भी राजनीतिक नियुक्तियों का इंतजार, क्या भाजपा की आंतरिक गुटबाजी बन रही रोड़ा
News In Short
- भाजपा सरकार बनने के ढ़ाई साल भी निगम-मंडलों में राजनीतिक नियुक्तियां नहीं।
- राजनीतिक नियुक्तियां नहीं होने से भाजपा के एक वर्ग का सब्र जवाब दे रहा है।
- प्रदेश में 52 प्रमुख आयोग और बोर्ड ऐसे हैं, जहां अध्यक्षों और सदस्यों के पद खाली।
- पार्टी सूत्र नियुक्तियां नहीं होने के पीछे कारण भाजपा की आंतरिक गुटबाजी को मान रहे।
- हालांकि, पार्टी रणनीतिकार नियुक्तियों की पहली बड़ी खेप जल्द जारी होने की उम्मीद जता रहे।
News In Detail
Jaipur: राजस्थान में एक कहावत मशहूर है कि सत्ता तक पहुंचने का रास्ता जितना कठिन होता है, उसे संभालना और कार्यकर्ताओं को संतुष्ट रखना उससे कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है। वर्तमान में राजस्थान भाजपा के भीतर कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है।
प्रदेश में भाजपा की सरकार बने हुए ढ़ाई साल का लंबा समय बीत चुका है, लेकिन पार्टी के भीतर बड़ा वर्ग आज भी निगम-मंडलों में नियुक्तियों के इंतजार में है। यह वर्ग उन वरिष्ठ नेताओं, पूर्व विधायकों और समर्पित कार्यकर्ताओं का है, जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए लाठियां खाईं, जेल गए और पार्टी की जीत के लिए जमीन तैयार की, लेकिन आज वे राजनीतिक नियुक्तियों की राह देख रहे हैं। भाजपा के गलियारों में यह सवाल भी गूंज रहा है कि लंबे समय से नियुक्तियां नहीं होने के पीछे क्या नेताओं की आंतरिक गुटबाजी भी बड़ा कारण है।
आखिर पेंच कहां फंसा है?
प्रदेश में लगभग 52 प्रमुख आयोग और बोर्ड ऐसे हैं, जहां अध्यक्षों और सदस्यों के पद खाली पड़े हैं। इन पदों पर नियुक्तियां न केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि राजनीतिक रूप से कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने का सबसे बड़ा साधन होती हैं।
पार्टी के भीतर से आ रही खबरों के अनुसार, इस देरी के पीछे कई बड़े कारण बताए जा रहे हैं।
पार्टी आलाकमान और प्रदेश नेतृत्व वर्तमान में नेताओं के रिपोर्ट कार्ड की बारीकी से जांच कर रहा है। भाजपा का मानना है कि नियुक्तियां केवल नाम के आधार पर नहीं, बल्कि प्रदर्शन और भविष्य की उपयोगिता के आधार पर होनी चाहिए।
राजस्थान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने हाल ही स्पष्ट किया कि पार्टी का ध्यान फिलहाल अन्य राज्यों (जैसे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम) के चुनावों और वहां के सांगठनिक कार्यों पर भी था। उनके अनुसार इन राज्यों में सरकार बनने और प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही राजस्थान की सूची को अंतिम रूप दिया जाएगा।
अक्टूबर 2024 में जब 78 शहरी स्थानीय निकायों में 550 मनोनीत सदस्यों की सूची जारी की गई थी, तो उसे कुछ ही घंटों में वापस लेना पड़ा था। इसका मुख्य कारण कुछ विधानसभा क्षेत्रों के स्थानीय विधायकों और जिला अध्यक्षों की नाराजगी थी, जो अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को सूची में न पाकर आक्रोशित थे। बताया जाता है कि भाजपा में नेताओं के बीच काफी अंदरुनी खींचतान है। ऐसे में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा राजनीतिक नियुक्तियों के जरिए कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं।
विपक्ष में लाठियां हमने खाईं, तो फल किसे मिलेगा?
पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और उन वरिष्ठ नेताओं के बीच असंतोष गहरा रहा है, जिन्होंने कांग्रेस शासन के पांच साल के दौरान लगातार संघर्ष किया। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कार्यकर्ताओं ने पुलिस के डंडे झेले और सड़कों पर आंदोलन किए। अब जब सरकार है, तो वे स्थानीय निकायों और बोर्डों में अपनी जगह की उम्मीद कर रहे हैं।
विशेष रूप से वे उम्मीदवार जो विधानसभा चुनाव में बहुत कम अंतर से हार गए थे, वे इन राजनीतिक पदों के जरिए अपनी क्षेत्र में सक्रियता बनाए रखना चाहते हैं। उनके लिए यह सांत्वना पुरस्कार नहीं, बल्कि आगामी चुनावों के लिए अपनी जमीन बचाने का एक जरिया है।
बंगाल मॉडल और नियुक्तियों का नया मापदंड
सूत्रों का कहना है कि राजस्थान में नियुक्तियों के लिए एक नया मापदंड सामने आ रहा है। चर्चा है कि उन नेताओं को प्राथमिकता दी जाएगी जिन्होंने न केवल राजस्थान में बल्कि अन्य राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए कड़ी मेहनत की थी।
कुछ समय पहले अरुण चतुर्वेदी को वित्त आयोग का प्रमुख बनाया गया था, जो एक संकेत है कि अनुभवी चेहरों को धीरे-धीरे मुख्यधारा में लाया जा रहा है। हालांकि, अन्य कई दिग्गज अब भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
केवल पद नहीं, प्रतिष्ठा की बात
इन नियुक्तियों का महत्व केवल दफ्तर या सरकारी वाहन तक सीमित नहीं है। राजस्थान में कुछ बोर्ड और आयोगों के अध्यक्ष का पद कैबिनेट मंत्री या राज्य मंत्री के दर्जे के समान होता है। इसके साथ मिलने वाली सुविधाएं, वेतन और सबसे महत्वपूर्ण प्रोटोकॉल एक नेता के कद को पार्टी में काफी बढ़ा देता है।
वर्तमान में जो कुछ नियुक्तियां हुई हैं, उनमें 'राज्य मंत्री' का दर्जा न दिए जाने पर भी कुछ नेताओं ने दबी जुबान में निराशा व्यक्त की है। उनका तर्क है कि बिना पर्याप्त अधिकारों और दर्जे के इन पदों पर बैठने का राजनीतिक लाभ सीमित हो जाता है।
पंचायत चुनाव और चुनावी गणित
भाजपा नेतृत्व इस बात से भली-भांति परिचित है कि आगामी पंचायत चुनाव और अन्य स्थानीय निकाय चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कैडर का सक्रिय होना अनिवार्य है। यदि नियुक्तियों में और अधिक देरी होती है तो कार्यकर्ताओं की सक्रियता कम हो सकती है, जिसका सीधा असर वोट बैंक पर पड़ सकता है।
पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि नियुक्तियों की पहली बड़ी खेप जल्द ही जारी की जा सकती है, ताकि असंतुष्ट धड़ों को शांत किया जा सके और संगठन को नई ऊर्जा प्रदान की जा सके।
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