कर्मचारी की पूर्व सेवा मानने में देरी, हाई कोर्ट ने दो अधिकारियों को भेजा नोटिस
समझें क्या है पूरा मामला
- कोर्ट के आदेश की अवहेलना पर जिला परिषद CEO और विकास अधिकारी को नोटिस।
- याचिकाकर्ता के पति की सेवा की गणना 1983 से न कर 2001 से की गई।
- राजस्थान हाई कोर्ट ने दिसंबर में याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया था।
- विकास अधिकारी ने मामला जिला परिषद भेजा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
- जस्टिस आनंद शर्मा ने अवमानना नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अदालती आदेश की अनदेखी पर कड़ा रुख अपनाया है। जयपुर जिला परिषद की CEO प्रतिभा वर्मा और कोटपूतली पंचायत समिति के BDO महेंद्र पाल को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह नोटिस पार्वती देवी की अवमानना याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई में दिए हैं।
1983 में नियुक्ति, 2001 में समायोजन
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विजय पाठक ने बताया कि पार्वती देवी के पति रविकांत शर्मा को साल 1983 में कोटपूतली नगर पालिका में नाकेदार पद पर नियुक्त किया गया था। साल 2001 में उन्हें सरप्लस घोषित कर ग्राम सेवक के पद पर समायोजित कर दिया गया।
साल 2015 में रविकांत शर्मा का निधन हो गया। विभाग ने पार्वती देवी को समस्त परिलाभ यानी रिटायरमेंट बेनिफिट तो दिए, लेकिन सेवाकाल की गणना 1983 की बजाय 2001 से की। यानी 1983 से 2001 के बीच की 18 साल की सेवा का लाभ नहीं दिया गया।
हाई कोर्ट ने दिया था पार्वती के पक्ष में फैसला
इस अन्याय के खिलाफ पार्वती देवी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। गत दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया और कहा कि 1983 से सेवाकाल मानकर समस्त परिलाभ दिए जाएं।
आदेश के बाद भी नहीं मिला लाभ
आदेश के बाद पार्वती देवी ने विभाग के सामने आवेदन पेश किया। इस पर कोटपूतली BDO ने मामला बनाकर जयपुर जिला परिषद को भेज दिया। लेकिन जिला परिषद की ओर से अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
हाई कोर्ट ने लिया सख्त संज्ञान
कोर्ट के आदेश की अनदेखी पर पार्वती देवी ने अवमानना याचिका दायर की। जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने CEO प्रतिभा वर्मा और BDO महेंद्र पाल को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
FAQ
- अवमानना नोटिस का क्या मतलब है?
जब कोई अधिकारी न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करता तो हाईकोर्ट अवमानना नोटिस जारी करता है। इसमें संबंधित अधिकारी को कारण बताना होता है कि आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ। जवाब संतोषजनक न हो तो सजा या जुर्माना हो सकता है।
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