35 लाख का पैकेज छोड़ा, फिर चुनी सिविल सेवा की राह, आईएएस अक्षय गोदारा की प्रेरणादायक कहानी

Jageshwar prasad | May 16, 2026, 08:09 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान कैडर के आईएएस अक्षय गोदारा का जोधपुर की गलियों से निकलकर सिविल सेवा में आने का सफर अद्भुत है। उन्होंने 35 लाख का पैकेज ठुकरा कर आईएएस की तैयारी की। आज वे करौली के कलेक्टर हैं।

राजस्थान कैडर के आईएएस अक्षय गोदारा का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के दौर में जब युवा लाखों-करोड़ों के कॉर्पोरेट पैकेज और आरामदायक जीवन का सपना देखते हैं, वहीं अक्षय गोदारा ने एक ऐसी मिसाल कायम की है जो न केवल युवाओं को प्रेरित करती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि यदि लक्ष्य बड़ा हो, तो बड़े से बड़े प्रलोभन भी छोटे लगने लगते हैं।



आईआईटी बॉम्बे का सफर

अक्षय गोदारा के व्यक्तित्व की नींव उनके बचपन में ही पड़ गई थी। जोधपुर के आदर्श विद्या मंदिर से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाले अक्षय शुरू से ही पढ़ाई में अव्वल रहे। उनकी बुद्धिमानी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने देश की सबसे कठिन इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा JEE पास की और आईआईटी बॉम्बे जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में जगह बनाई। वहां से उन्होंने कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया - एक ऐसा विषय जिसकी मांग पूरी दुनिया में सबसे अधिक है।



जब 35 लाख का पैकेज भी छोटा पड़ गया

आईआईटी बॉम्बे से पास आउट होते ही कैंपस प्लेसमेंट के दौरान अक्षय के पास अवसरों की भरमार थी। दिग्गज कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने उन्हें 35 लाख रुपए सालाना के पैकेज पर जॉब ऑफर की। एक 21 साल के युवक के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा था, लेकिन अक्षय के मन में कुछ और ही चल रहा था।



उन्हें लगा कि एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में वे केवल एक कंपनी की प्रगति में योगदान देंगे, जबकि सिविल सेवा में जाकर वे सीधे तौर पर लाखों लोगों के जीवन में बदलाव ला सकते हैं।



अक्षय ने उस आकर्षक ऑफर को ठुकरा दिया और साल 2014 में यूपीएससी की तैयारी के लिए कमर कस ली। यह फैसला जोखिम भरा था, लेकिन उनके पास खुद पर अटूट विश्वास था।



संघर्ष और सुधार की दास्तां

अक्षय की यूपीएससी यात्रा निरंतर सुधार का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने हार मानना कभी सीखा ही नहीं। साल 2015 की परीक्षा में, मात्र 22 वर्ष की उम्र में अक्षय ने पहले ही प्रयास में सफलता प्राप्त की। उनका चयन आईपीएस (IPS) के लिए हुआ और उन्हें उत्तर प्रदेश कैडर आवंटित किया गया।



अधिकांश लोग आईपीएस बनने के बाद अपनी तैयारी रोक देते हैं, लेकिन अक्षय का लक्ष्य आईएएस बनकर जमीनी स्तर पर प्रशासनिक बदलाव लाना था। उन्होंने आईपीएस की ट्रेनिंग के साथ-साथ अपनी पढ़ाई जारी रखी। साल 2016 की यूपीएससी परीक्षा में अक्षय ने अपनी मेहनत को और धार दी। इस बार उन्होंने ऑल इंडिया 40वीं रैंक हासिल की और अपने सपने को हकीकत में बदल दिया।



राजस्थान कैडर में जनसेवा

2017 बैच के आईएएस अधिकारी के रूप में अक्षय को अपना गृह राज्य राजस्थान मिला। उन्होंने भरतपुर में असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में काम शुरू किया। इसके बाद केंद्र सरकार में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में सहायक सचिव के रूप में प्रतिनियुक्ति पर रहे।



राजस्थान लौटने पर उन्होंने अजमेर, मावली और झाड़ोल (उदयपुर) में एसडीएम के रूप में अपनी सेवाएं दीं। झाड़ोल जैसे चुनौतीपूर्ण आदिवासी क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने जमीनी समस्याओं को करीब से समझा। अजमेर विकास प्राधिकरण (ADA) के आयुक्त और जयपुर में कार्मिक विभाग में संयुक्त शासन सचिव के पदों पर रहते हुए उन्होंने नीतिगत निर्णयों और शहरी विकास में अपनी कार्यक्षमता का परिचय दिया।



साल 2024 में उन्होंने बूंदी जिले के कलेक्टर के रूप में अपनी पहली जिला स्तरीय कमान संभाली। वहां उन्होंने डिजिटल गवर्नेंस को प्राथमिकता दी ताकि सरकारी सेवाएं पारदर्शी तरीके से लोगों तक पहुंच सकें। वर्तमान में वे करौली के जिला कलेक्टर के रूप में तैनात हैं और जिले के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयासरत हैं।



व्यक्तिगत जीवन

अक्षय गोदारा का व्यक्तिगत जीवन भी उतना ही प्रेरणादायक है। उन्होंने आईएएस डॉ. सौम्या झा से विवाह किया है। सौम्या झा मूल रूप से बिहार की रहने वाली हैं और उन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिविल सेवा में कदम रखा था।



वे दोनों 2017 बैच के ही आईएएस अधिकारी हैं। सौम्या झा को पहले हिमाचल प्रदेश कैडर मिला था, लेकिन अक्षय से विवाह के बाद उन्होंने अपना कैडर बदलकर राजस्थान करवा लिया। यह जोड़ा आज प्रशासनिक सेवाओं में अपनी सक्रियता और सादगी के लिए जाना जाता है।





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सफलता के मूल मंत्र

अक्षय गोदारा अपनी सफलता के पीछे कुछ प्रमुख सिद्धांतों को मानते हैं, जो हर अभ्यर्थी के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं:



सकारात्मक दृष्टिकोण: अक्षय कहते हैं कि तैयारी के दौरान उन्होंने कभी भी अपने मन में नकारात्मक विचार नहीं आने दिए। उनका मानना है कि यूपीएससी केवल ज्ञान की नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती की भी परीक्षा है।



पारिवारिक प्रेरणा: अक्षय के घर में शिक्षा का माहौल हमेशा से मजबूत रहा है। उनके पिता दुर्गादास चौधरी, जो जोधपुर डिस्कॉम में सहायक अभियंता रहे, और उनकी मां ने हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। प्रेरणा का ही असर है कि उनके दोनों छोटे भाई भी आईआईटी (दिल्ली और मुंबई) में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।



जोखिम लेने का साहस: यदि आप कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं, तो आपको सुरक्षित रास्तों को छोड़ने का साहस जुटाना होगा। 35 लाख का पैकेज छोड़ना इसी साहस का प्रतीक था।



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