मां मनरेगा मजदूर, यूट्यूब से की पढाई और क्रैक किया UPSC, आईएएस सोहनलाल की कहानी

Jageshwar prasad | Jun 20, 2026, 12:00 IST
IAS सोहनलाल
राजस्थान कैडर के आईएएस सोहनलाल, मनरेगा मजदूर के बेटे हैं जिन्होंने यूट्यूब से पढ़ाई कर UPSC क्रैक किया। तीन असफलताओं के बाद उन्होंने 681वीं रैंक हासिल कर सफलता पाई।

आज के इस सोशल मीडिया के दौर में जब लोग छोटी-छोटी असफलताओं से टूट जाते हैं और संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं, तब राजस्थान की मरुभूमि से एक ऐसी कहानी निकलती है जो बहानों की बैसाखी पर चलने वालों के मुंह पर करारा तमाचा जड़ देती है।



यह कहानी किसी राजा या रईस के बेटे की नहीं, बल्कि जोधपुर की तिवरी तहसील के एक छोटे से गांव के एक बेहद साधारण किसान और मनरेगा मजदूर के बेटे की है, जिसका नाम है, सोहनलाल।



आज सोहनलाल जयपुर में अतिरिक्त आयुक्त (Additional Commissioner, Commercial Taxes - AE Dept) के बेहद प्रतिष्ठित पद पर तैनात हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका रास्ता मखमली नहीं, बल्कि कांटों और संघर्षों से भरा था।



अभावों का बचपन

सोहनलाल का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां सुविधाओं के नाम पर सिर्फ माता-पिता का पसीना और कड़ी मेहनत थी। पिता गोरधन राम के पास गांव में महज 15 बीघा ज़मीन थी, जिससे बमुश्किल गुज़ारा होता था। घर की आर्थिक स्थिति को सहारा देने के लिए मां मीरा देवी कड़कती धूप में मनरेगा में मिट्टी खोदने और मजदूरी करने का काम करती थीं।



माता-पिता भले ही कम पढ़े लिखे थे, लेकिन वे शिक्षा की कीमत को बहुत अच्छे से पहचानते थे। सोहनलाल की शुरुआती 10वीं तक की पढ़ाई गांव के ही सरकारी स्कूल में हुई। लेकिन उनके भीतर की प्रतिभा को देखकर पिता ने तंगी के बावजूद उन्हें आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।



उन्हें 11वीं-12वीं की पढ़ाई के लिए कोटा भेजा गया, और सोहनलाल ने भी माता-पिता की मेहनत का मान रखते हुए देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान IIT बॉम्बे में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में दाखिला लेकर अपनी पहली बड़ी सफलता दर्ज की।



लाखों का कॉर्पोरेट पैकेज ठुकराया

साल 2018 में जब सोहनलाल IIT बॉम्बे के फाइनल ईयर में थे, तो उनके सामने देश-विदेश की बड़ी कंपनियों में लाखों रुपए के पैकेज वाले आलीशान जॉब के विकल्प खुले थे। कोई भी सामान्य युवा होता तो शायद वह गरीबी से तुरंत बाहर निकलने के लिए उस नौकरी को गले लगा लेता।



लेकिन इसी बीच आईआईटी में उनके एक सीनियर का चयन आईएएस (IAS) के पद पर हुआ। यहीं से सोहनलाल को समझ आया कि एक आईएएस अधिकारी बनकर समाज के अंतिम छोर पर खड़े लोगों की जिंदगी कैसे बदली जा सकती है।



उनके बड़े भाई श्रवण जो खुद एक साइबर एक्सपर्ट हैं और अमेरिका से PhD कर रहे हैं) ने उन्हें मोटिवेट करते हुए कहा - अगर प्राइवेट नौकरी ही करनी है, तो वह तो बाद में भी की जा सकती है, लेकिन देश सेवा का यह मौका फिर नहीं मिलेगा।



भाई की इस बात ने सोहनलाल के इरादों को पत्थर की लकीर बना दिया और उन्होंने प्लेसमेंट के लिए अप्लाई तक नहीं किया।



लगातार तीन बड़ी असफलताएं

सपना देखना जितना आसान होता है, उसे हकीकत में बदलना उतना ही दर्दनाक। सोहनलाल ने 2018 में अपनी तैयारी शुरू की।



पहला प्रयास: वे सीधे इंटरव्यू तक पहुंचे, लेकिन अंतिम चयन सूची में जगह नहीं बना पाए। मंज़िल के करीब आकर चूक जाना बेहद तकलीफदेह था।



दूसरा और तीसरा प्रयास: किस्मत ने ऐसी करवट बदली कि वे इंटरव्यू तो दूर, प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) भी पास नहीं कर पाए।



लगातार तीन बार असफल होने के बाद सोहनलाल पूरी तरह हताश हो चुके थे। 4 साल बीत चुके थे और घर की आर्थिक स्थिति वैसी ही थी। उनके मन में विचार आया कि अब तैयारी छोड़ देनी चाहिए और कोई प्राइवेट जॉब पकड़ लेनी चाहिए। लेकिन तभी उनके भीतर की ज़िद ने एक बार फिर करवट बदली। उन्होंने खुद से कहा - बस एक आखिरी मौका और!



यूट्यूब को बनाया द्रोणाचार्य

राजस्थान कैडर के आईएएस सोहनलाल की इस सफलता की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि उन्होंने दिल्ली या किसी बड़े शहर के महंगे कोचिंग संस्थानों में पैर तक नहीं रखा। उनके पास कोई लाखों की फीस देने के पैसे नहीं थे। उन्होंने अपने स्मार्टफोन और इंटरनेट को ही अपनी ताकत बनाया।



वे रोज़ाना 7 से 8 घंटे कड़ी पढ़ाई करते थे, यूट्यूब पर उपलब्ध फ्री वीडियो लेक्चर्स देखते थे और खुद अपने हाथों से कस्टमाइज्ड नोट्स तैयार करते थे।



आखिरकार, उनकी यह फौलादी निरंतरता और खुद पर अटूट भरोसा साल 2022 में रंग लाया, जब उन्होंने यूपीएससी परीक्षा में 681वीं रैंक हासिल कर अपने माता-पिता के संघर्ष को साकार कर दिया।



आज के युवाओं के लिए इस कहानी से 3 बड़े सबक

IAS सोहनलाल


जो मां कभी मनरेगा के मस्टरोल पर अंगूठा लगाती थी, आज उसका बेटा राजस्थान सरकार के कड़क और रसूखदार प्रशासनिक पदों पर बैठकर फाइलों पर हस्ताक्षर करता है।



सोहनलाल का आज भी सिर्फ एक ही विज़न है कि वे व्यवस्था के शीर्ष पर रहकर ग्रामीण इलाकों के उन तमाम लोगों तक बिजली, पानी, सड़क और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंचा सकें, जिनसे वे खुद कभी बचपन में तरसे थे।



सोहनलाल की यह कहानी साबित करती है कि सिंहासन महलों या पैसों के मोहताज नहीं होते, इरादे अगर फौलादी हों तो एक झोपड़ी से निकलकर भी देश की तकदीर लिखी जा सकती है।



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