अफसरों की बेरुखी से जन्मा संकल्प, ₹5 लाख महीना छोड़ IAS बने धीरज कुमार सिंह
Jageshwar prasad | Jun 11, 2026, 18:17 IST
आईएएस डॉ. धीरज कुमार सिंह
राजस्थान कैडर के आईएएस डॉ. धीरज कुमार सिंह ने अफसरों की बेरुखी से आहत होकर आईएएस बनने का निर्णय लिया। ₹5 लाख मासिक का पैकेज ठुकराया और पहले ही प्रयास में UPSC में AIR 64 हासिल कर IAS बने।
कहते हैं कि जब किसी इंसान की आत्मा को समाज या व्यवस्था की बेरुखी झकझोर देती है, तो उसके भीतर एक ऐसे संकल्प का जन्म होता है जो इतिहास बदल देता है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा को देश की सबसे कठिन परीक्षा माना जाता है।
यहां लोग पंचवर्षीय योजना बनाकर आते हैं और बरसों तक तैयारी के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं। लेकिन जब इरादे मजबूत हों और तैयारी के पीछे का मकसद नेक हो, तो मंज़िल पहले ही प्रयास में मिल सकती है।
ऐसी ही एक अद्भुत मिसाल पेश की है उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के रहने वाले डॉ. धीरज कुमार सिंह ने। उन्होंने न केवल एमडी (MD) डॉक्टर बनने के बाद मिलने वाले ₹5 लाख महीने के शानदार कॉर्पोरेट ऑफर को ठुकराया, बल्कि अपनी एक अनूठी जिद (कि केवल एक ही अटेंप्ट दूंगा) के दम पर साल 2019 की यूपीएससी परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में पूरे भारत में 64वीं रैंक (AIR 64) हासिल कर सबको चौंका दिया। आइए जानते हैं उनके इस ऐतिहासिक सफर की पूरी कहानी।
धीरज कुमार सिंह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के एक बेहद साधारण लोअर मिडिल क्लास (निम्न मध्यम वर्गीय) परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके परिवार में माता-पिता के अलावा उनका एक भाई है। धीरज की शुरुआती स्कूली शिक्षा गांव के ही एक बहुत ही सामान्य हिंदी मीडियम स्कूल से हुई और वे कक्षा 12वीं तक इसी हिंदी माध्यम से पढ़े।
धीरज बचपन से ही पढ़ाई में असाधारण रूप से कुशाग्र थे। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने देश के प्रतिष्ठित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) की बेहद कठिन प्रवेश परीक्षा पास की और वहां से एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री पूरी की।
उनकी प्रतिभा का सफर यहीं नहीं रुका; उन्होंने इसके बाद और भी कठिन एंट्रेंस एग्जाम को क्रैक करते हुए चिकित्सा विज्ञान की सर्वोच्च डिग्री एमडी (MD) भी अच्छे नंबरों से हासिल की।
धीरज एमबीबीएस के बाद ही सिविल सेवा में आना चाहते थे, लेकिन नियति ने उनके आईएएस बनने की पटकथा कुछ अलग ढंग से लिखी थी। धीरज की माता जी को गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं थीं और उनके पिता दूसरे शहर में नौकरी करते थे।
मां की देखभाल और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाने के लिए धीरज को हर हफ्ते बनारस से अपने गांव का लंबा सफर तय करना पड़ता था, जिससे उनकी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही थी।
अपनी इस पारिवारिक समस्या के समाधान के लिए धीरज अपने पिता के विभाग के उच्च अधिकारियों से मिलने गए। वे केवल इतना चाहते थे कि उनकी बीमार मां की स्थिति को देखते हुए उनके पिता का ट्रांसफर उनके होम टाउन (गृह जनपद) में कर दिया जाए।
लेकिन उन प्रशासनिक अधिकारियों का व्यवहार बेहद रूखा और संवेदनहीन था। उन्होंने एक होनहार डॉक्टर बेटे की जायज बात को सुनने से साफ इनकार कर दिया और कोई मदद नहीं की।
उस दिन धीरज के मन को गहरी ठेस पहुंची। उन्होंने सोचा कि आज जब देश के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान के एक डॉक्टर की बात को ये अधिकारी इस तरह अनसुना कर रहे हैं, तो समाज के सबसे गरीब, लाचार और अंडर प्रिविलेज्ड (वंचित) लोगों की स्थिति क्या होती होगी? उनकी समस्याओं को कौन सुनता होगा?
बस इसी एक घटना ने धीरज के भीतर के डॉक्टर को एक प्रशासनिक अधिकारी बनने की राह पर धकेल दिया। उन्होंने तय कर लिया कि वे आईएएस बनेंगे और ऐसे लोगों की आवाज बनेंगे जिनकी कोई नहीं सुनता।
धीरज जब एमबीबीएस के बाद ही यूपीएससी में आना चाहते थे, तो उनके माता-पिता डर गए। एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बनी-बनाई डॉक्टरी की फील्ड को छोड़कर एक ऐसे अनिश्चित रास्ते पर जाना जहां सफलता की कोई गारंटी नहीं है, बहुत बड़ा रिस्क था। माता-पिता की तसल्ली के लिए धीरज रुके और उन्होंने पहले अपनी एमडी (MD) की पढ़ाई पूरी की।
एमडी पूरी करने के बाद धीरज को महीने के ₹5 लाख (सालाना ₹60 लाख) कमाने के बेहतरीन अवसर मिल रहे थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए यह रकम बहुत बड़ी थी। लेकिन धीरज के दिमाग में व्यवस्था को बदलने का जुनून सवार था। उन्होंने इस भारी-भरकम पैकेज को ठुकरा दिया।
खास बात यह है कि तैयारी के लिए वे दिल्ली के मुखर्जी नगर या राजेंद्र नगर की भारी भीड़-भाड़ में नहीं गए। धीरज का मानना था कि दिल्ली की भीड़ उन्हें विचलित कर सकती है, इसलिए उन्होंने बंगलुरू को अपना ठिकाना बनाया। बंगलुरू का सुहाना और शांत मौसम उन्हें पढ़ाई के लिए सबसे अनुकूल लगा।
पूरी तरह से प्योर साइंस बैकग्राउंड से आने वाले धीरज के लिए यूपीएससी की राह आसान नहीं थी। उन्होंने स्कूल के बाद कभी ह्यूमैनिटीज (इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान) के विषय छुए तक नहीं थे। लेकिन धीरज ने अपने सामने एक बेहद कठिन और जोखिम भरी शर्त रखी थी।
उन्होंने अपनेआप से वादा किया था कि यह मेरा पहला प्रयास होगा और यही मेरा आखिरी प्रयास भी होगा। अगर मैं पहली बार में सेलेक्ट नहीं हुआ, तो मैं दोबारा यूपीएससी का फॉर्म नहीं भरूंगा और वापस अपनी मेडिकल की दुनिया में लौट जाऊंगा।
इस एक जिद ने धीरज के भीतर करो या मरो की स्थिति पैदा कर दी। उनके पास खोने के लिए बहुत कुछ था और दांव पर उनका पूरा करियर लगा था। धीरज ने बंगलुरू के एक कमरे में खुद को बंद किया और लगभग डेढ़ साल (1.5 वर्ष) तक रोजाना 10 से 12 घंटे की कड़ी और अनुशासित पढ़ाई की।
उन्होंने अपने नोट्स को घोंटा। टॉपर्स के इंटरव्यू और उनकी आंसर राइटिंग (उत्तर लेखन) शैलियों का बारीक विश्लेषण किया। पिछले कई सालों के पेपर्स को बार-बार सॉल्व किया।
धीरज ने तैयारी के हर उस पहलू पर अपना शत-प्रतिशत दिया जो परीक्षा के लिए जरूरी था। नतीजा यह हुआ कि साल 2019 के अपने पहले ही प्रयास में 64वीं रैंक (AIR 64) हासिल कर उन्होंने इतिहास रच दिया और सीधे राजस्थान कैडर में आईएएस (IAS) के पद पर काबिज हुए।
बैकग्राउंड और मीडियम कभी बाधा नहीं बनते:
एक साधारण गांव के हिंदी मीडियम स्कूल से पढ़कर अगर धीरज देश के टॉप मेडिकल संस्थान में जा सकते हैं और पहले ही प्रयास में यूपीएससी में AIR 64 ला सकते हैं, तो आपका माध्यम कभी आपकी कमजोरी नहीं हो सकता।
तगड़ा मोटिवेशन ही असली ईंधन है:
जब धीरज के पिता का ट्रांसफर नहीं किया गया, तो उन्होंने उस अपमान और दुख को एक सकारात्मक ऊर्जा में बदल दिया। आपकी तैयारी के पीछे का कारण जितना मजबूत होगा, आपकी सफलता उतनी ही निश्चित होगी।
अपना एक डेडलाइन तय करें:
धीरज की यह जिद कि पहली और आखिरी बार परीक्षा दूंगा यह सिखाती है कि जब आपके पास पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं होता, तो आपका दिमाग अपनी पूरी क्षमता से काम करता है।
भीड़ का हिस्सा बनने से बचें:
सब लोग दिल्ली जा रहे हैं तो मुझे भी दिल्ली जाना है - इस भेड़चाल से अलग धीरज ने अपनी सुविधा के अनुसार बंगलुरू को चुना। सफलता के लिए माहौल से ज्यादा आपकी एकाग्रता जरूरी है।
उतार-चढ़ाव से बाहर निकलना सीखें:
तैयारी के दौरान हर किसी के जीवन में लो मोमेंट्स आते हैं। धीरज के मुताबिक, बुद्धिमान वही है जो उन क्षणों से तुरंत बाहर निकलकर अपनी कमियों पर काम करे।
![आईएएस डॉ. धीरज कुमार सिंह]()
कल तक जो धीरज कुमार सिंह अपनी बीमार मां के लिए अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे और बेरुखी झेल रहे थे, आज वे खुद भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक जांबाज अधिकारी के रूप में व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे हैं। ₹5 लाख महीने की आलीशान नौकरी को छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुनना उनकी महान सोच को दर्शाता है।
डॉ. धीरज कुमार सिंह की यह कहानी इस बात का सबसे बड़ा सुबूत है कि अगर आपके इरादों में ईमानदारी है और आपकी जिद के पीछे समाज का कल्याण छुपा है, तो आपकी मेहनत कभी जाया नहीं जा सकती। उनका यह सफर देश के करोड़ों हिंदी माध्यम और साधारण पृष्ठभूमि के युवाओं की आंखों में यह विश्वास जगाता है कि वे भी पहले ही प्रयास में आसमान को छू सकते हैं।
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यहां लोग पंचवर्षीय योजना बनाकर आते हैं और बरसों तक तैयारी के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं। लेकिन जब इरादे मजबूत हों और तैयारी के पीछे का मकसद नेक हो, तो मंज़िल पहले ही प्रयास में मिल सकती है।
ऐसी ही एक अद्भुत मिसाल पेश की है उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के रहने वाले डॉ. धीरज कुमार सिंह ने। उन्होंने न केवल एमडी (MD) डॉक्टर बनने के बाद मिलने वाले ₹5 लाख महीने के शानदार कॉर्पोरेट ऑफर को ठुकराया, बल्कि अपनी एक अनूठी जिद (कि केवल एक ही अटेंप्ट दूंगा) के दम पर साल 2019 की यूपीएससी परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में पूरे भारत में 64वीं रैंक (AIR 64) हासिल कर सबको चौंका दिया। आइए जानते हैं उनके इस ऐतिहासिक सफर की पूरी कहानी।
साधारण बैकग्राउंड और हिंदी मीडियम से शुरुआत
धीरज बचपन से ही पढ़ाई में असाधारण रूप से कुशाग्र थे। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने देश के प्रतिष्ठित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) की बेहद कठिन प्रवेश परीक्षा पास की और वहां से एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री पूरी की।
उनकी प्रतिभा का सफर यहीं नहीं रुका; उन्होंने इसके बाद और भी कठिन एंट्रेंस एग्जाम को क्रैक करते हुए चिकित्सा विज्ञान की सर्वोच्च डिग्री एमडी (MD) भी अच्छे नंबरों से हासिल की।
जब अफसरों की रूडनेस ने बदला जीवन का रास्ता
मां की देखभाल और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाने के लिए धीरज को हर हफ्ते बनारस से अपने गांव का लंबा सफर तय करना पड़ता था, जिससे उनकी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही थी।
अपनी इस पारिवारिक समस्या के समाधान के लिए धीरज अपने पिता के विभाग के उच्च अधिकारियों से मिलने गए। वे केवल इतना चाहते थे कि उनकी बीमार मां की स्थिति को देखते हुए उनके पिता का ट्रांसफर उनके होम टाउन (गृह जनपद) में कर दिया जाए।
लेकिन उन प्रशासनिक अधिकारियों का व्यवहार बेहद रूखा और संवेदनहीन था। उन्होंने एक होनहार डॉक्टर बेटे की जायज बात को सुनने से साफ इनकार कर दिया और कोई मदद नहीं की।
उस दिन धीरज के मन को गहरी ठेस पहुंची। उन्होंने सोचा कि आज जब देश के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान के एक डॉक्टर की बात को ये अधिकारी इस तरह अनसुना कर रहे हैं, तो समाज के सबसे गरीब, लाचार और अंडर प्रिविलेज्ड (वंचित) लोगों की स्थिति क्या होती होगी? उनकी समस्याओं को कौन सुनता होगा?
बस इसी एक घटना ने धीरज के भीतर के डॉक्टर को एक प्रशासनिक अधिकारी बनने की राह पर धकेल दिया। उन्होंने तय कर लिया कि वे आईएएस बनेंगे और ऐसे लोगों की आवाज बनेंगे जिनकी कोई नहीं सुनता।
माता-पिता का डर और बंगलुरू का शांत ठिकाना
एमडी पूरी करने के बाद धीरज को महीने के ₹5 लाख (सालाना ₹60 लाख) कमाने के बेहतरीन अवसर मिल रहे थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए यह रकम बहुत बड़ी थी। लेकिन धीरज के दिमाग में व्यवस्था को बदलने का जुनून सवार था। उन्होंने इस भारी-भरकम पैकेज को ठुकरा दिया।
खास बात यह है कि तैयारी के लिए वे दिल्ली के मुखर्जी नगर या राजेंद्र नगर की भारी भीड़-भाड़ में नहीं गए। धीरज का मानना था कि दिल्ली की भीड़ उन्हें विचलित कर सकती है, इसलिए उन्होंने बंगलुरू को अपना ठिकाना बनाया। बंगलुरू का सुहाना और शांत मौसम उन्हें पढ़ाई के लिए सबसे अनुकूल लगा।
पहली और आखिरी जिद
उन्होंने अपनेआप से वादा किया था कि यह मेरा पहला प्रयास होगा और यही मेरा आखिरी प्रयास भी होगा। अगर मैं पहली बार में सेलेक्ट नहीं हुआ, तो मैं दोबारा यूपीएससी का फॉर्म नहीं भरूंगा और वापस अपनी मेडिकल की दुनिया में लौट जाऊंगा।
इस एक जिद ने धीरज के भीतर करो या मरो की स्थिति पैदा कर दी। उनके पास खोने के लिए बहुत कुछ था और दांव पर उनका पूरा करियर लगा था। धीरज ने बंगलुरू के एक कमरे में खुद को बंद किया और लगभग डेढ़ साल (1.5 वर्ष) तक रोजाना 10 से 12 घंटे की कड़ी और अनुशासित पढ़ाई की।
उन्होंने अपने नोट्स को घोंटा। टॉपर्स के इंटरव्यू और उनकी आंसर राइटिंग (उत्तर लेखन) शैलियों का बारीक विश्लेषण किया। पिछले कई सालों के पेपर्स को बार-बार सॉल्व किया।
धीरज ने तैयारी के हर उस पहलू पर अपना शत-प्रतिशत दिया जो परीक्षा के लिए जरूरी था। नतीजा यह हुआ कि साल 2019 के अपने पहले ही प्रयास में 64वीं रैंक (AIR 64) हासिल कर उन्होंने इतिहास रच दिया और सीधे राजस्थान कैडर में आईएएस (IAS) के पद पर काबिज हुए।
आईएएस डॉ. धीरज कुमार सिंह के जीवन से युवाओं के लिए 5 अमूल्य सूत्र
एक साधारण गांव के हिंदी मीडियम स्कूल से पढ़कर अगर धीरज देश के टॉप मेडिकल संस्थान में जा सकते हैं और पहले ही प्रयास में यूपीएससी में AIR 64 ला सकते हैं, तो आपका माध्यम कभी आपकी कमजोरी नहीं हो सकता।
तगड़ा मोटिवेशन ही असली ईंधन है:
जब धीरज के पिता का ट्रांसफर नहीं किया गया, तो उन्होंने उस अपमान और दुख को एक सकारात्मक ऊर्जा में बदल दिया। आपकी तैयारी के पीछे का कारण जितना मजबूत होगा, आपकी सफलता उतनी ही निश्चित होगी।
अपना एक डेडलाइन तय करें:
धीरज की यह जिद कि पहली और आखिरी बार परीक्षा दूंगा यह सिखाती है कि जब आपके पास पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं होता, तो आपका दिमाग अपनी पूरी क्षमता से काम करता है।
भीड़ का हिस्सा बनने से बचें:
सब लोग दिल्ली जा रहे हैं तो मुझे भी दिल्ली जाना है - इस भेड़चाल से अलग धीरज ने अपनी सुविधा के अनुसार बंगलुरू को चुना। सफलता के लिए माहौल से ज्यादा आपकी एकाग्रता जरूरी है।
उतार-चढ़ाव से बाहर निकलना सीखें:
तैयारी के दौरान हर किसी के जीवन में लो मोमेंट्स आते हैं। धीरज के मुताबिक, बुद्धिमान वही है जो उन क्षणों से तुरंत बाहर निकलकर अपनी कमियों पर काम करे।
आईएएस डॉ. धीरज कुमार सिंह
कल तक जो धीरज कुमार सिंह अपनी बीमार मां के लिए अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे और बेरुखी झेल रहे थे, आज वे खुद भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक जांबाज अधिकारी के रूप में व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे हैं। ₹5 लाख महीने की आलीशान नौकरी को छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुनना उनकी महान सोच को दर्शाता है।
डॉ. धीरज कुमार सिंह की यह कहानी इस बात का सबसे बड़ा सुबूत है कि अगर आपके इरादों में ईमानदारी है और आपकी जिद के पीछे समाज का कल्याण छुपा है, तो आपकी मेहनत कभी जाया नहीं जा सकती। उनका यह सफर देश के करोड़ों हिंदी माध्यम और साधारण पृष्ठभूमि के युवाओं की आंखों में यह विश्वास जगाता है कि वे भी पहले ही प्रयास में आसमान को छू सकते हैं।
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