10वीं और 12वीं प्राइवेट की, मजदूरी की फिर लाए UPSC में 270वीं रैंक, IPS चूनाराम जाट की प्रेरक कहानी

Jageshwar prasad | May 19, 2026, 18:11 IST
Photograph: (the sootr)
बीकानेर के केसर देसर गांव में ₹50 की दिहाड़ी मजदूरी और प्राइवेट स्कूलिंग करने वाले IPS चूनाराम जाट ने अभावों से लड़कर UPSC में 270वीं रैंक हासिल की। इस 2013 बैच के IPS अधिकारी को उत्कृष्ट कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जाना जाता है।

जब किस्मत आपको बार-बार पीछे धकेलती है, जब गरीबी आपके रास्तों में कांटों की तरह बिछ जाती है, और जब आपके पास पढ़ने के लिए किताबें खरीदने तक के पैसे नहीं होते - तब इंसान के पास दो ही रास्ते बचते हैं। या तो वह अपनी परिस्थितियों के आगे घुटने टेक दे और किस्मत को दोष देकर पूरी जिंदगी गुमनामी में गुजार दे, या फिर वह परिस्थितियों लड़े और ऐसा इतिहास लिख दे जिसे आने वाली पीढ़ियां एक मिसाल की तरह याद रखें।



यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लग सकती है, लेकिन यह सौ फीसदी हकीकत है। यह कहानी है राजस्थान के बीकानेर जिले के एक ऐसे लड़के की, जिसने दिहाड़ी पर मजदूरी की, दूसरों की दी हुई किताबों से पढ़ाई की, लेकिन अपने भीतर जलने वाली सिविल सेवा की मशाल को कभी बुझने नहीं दिया। आज वही लड़का 2013 बैच का एक जांबाज IPS अधिकारी है, जिसे राजस्थान प्रशासनिक हलकों में चूनाराम जाट के नाम से जाना जाता है।



अभावों का बचपन

राजस्थान के बीकानेर जिले का एक छोटा सा, शांत गांव है - केसर देसर। इसी गांव के एक सीधे-सादे किसान उदाराम जाट के घर चूनाराम का जन्म हुआ। पिता उदाराम दिन-रात खेतों में पसीना बहाते, लेकिन घर की आर्थिक तंगी का साया हमेशा परिवार पर मंडराता रहता था।



हालात इतने बदतर हो गए कि चूनाराम को अपनी नियमित स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। एक तरफ पढ़ाई का शौक था और दूसरी तरफ परिवार को पालने की मजबूरी। लेकिन चूनाराम ने परिस्थितियों के सामने समर्पण करने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने हार नहीं मानी और स्कूल छोड़े जाने के बावजूद 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं प्राइवेट छात्र के रूप में फॉर्म भरकर दीं।



₹50 की दिहाड़ी, दूसरों की मदद और जयपुर का सफर

अक्सर लोग कहते हैं कि पढ़ाई के लिए लाखों रुपये की फीस और बड़े-बड़े कोचिंग संस्थानों की जरूरत होती है, लेकिन चूनाराम के पास तो किताबों के पैसे भी नहीं थे। परीक्षा फॉर्म की फीस भरने और अपने लिए कॉपियां खरीदने के लिए चूनाराम ने गांव में ही ₹50 रोज की दिहाड़ी पर मजदूरी करना शुरू किया। वे दिन भर मजदूरी करते और रात को पढ़ाई।



चूनाराम के इस बेमिसाल जज्बे और पढ़ने की ललक को गांव के कुछ पारखी लोगों ने भांप लिया। गांव के ही प्रबुद्ध नागरिक भगवानाराम और तुलसीराम गोदारा ने उनकी लगन को देखते हुए ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद का हाथ आगे बढ़ाया।



गांव वालों की इसी छोटी-छोटी मदद के सहारे चूनाराम जयपुर पहुंचे। जयपुर में उनकी मुलाकात उनके जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक और गुरु नारायण भादू से हुई। नारायण भादू ने चूनाराम की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें लगातार तीन सालों तक बिना एक पैसा लिए पूरी तरह मुफ्त पढ़ाया। इतना ही नहीं, उन्होंने चूनाराम की किताबों का खर्च भी उठाया। इसी निस्वार्थ मदद की बदौलत चूनाराम ने राजस्थान यूनिवर्सिटी से न केवल ग्रेजुएशन किया, बल्कि एम.ए. और बाद में एम.फिल की उच्च डिग्रियां भी हासिल कीं।



दिल्ली का रुख

जब चूनाराम ने जेआरएफ (JRF) की परीक्षा पास की, तो उन्हें स्कॉलरशिप मिलने लगी। इस स्कॉलरशिप ने उनके जीवन की सबसे बड़ी आर्थिक चिंता को कुछ हद तक दूर कर दिया। अब उनकी आंखों में एक ही सपना तैर रहा था - UPSC पास करना।



वर्ष 2009 में, चूनाराम राजस्थान की सीमाओं को लांघकर देश की राजधानी दिल्ली के यूपीएससी हब कहे जाने वाले मुखर्जी नगर पहुंचे। यहां उन्होंने अपने दो दोस्तों - अशोक सुथार और कृष्णकुमार के साथ मिलकर एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया।



मुखर्जी नगर की संघर्षपूर्ण जिंदगी आसान नहीं थी। तैयारी के इसी लंबे दौर में चूनाराम की एक अच्छी सरकारी नौकरी भी लग गई थी। एक आम गरीब परिवार के लड़के के लिए सरकारी नौकरी मिलना मरुस्थल में पानी मिलने जैसा होता है, लेकिन चूनाराम का लक्ष्य तो कुछ और ही था। उन्होंने बिना झिझके उस सरकारी नौकरी को ठुकरा दिया।





निरंतरता का चमत्कार

कमरे में रहते हुए तीनों दोस्त अक्सर निराशा के दौर से भी गुजरते थे। जब भी वे किसी परीक्षा में असफल होते, तो वे कमरे की दीवार पर लिखे एक प्रेरक जुमले को पढ़कर एक-दूसरे को ढांढस बंधाते थे। और अंततः, नियति को इन तीनों दोस्तों की मेहनत के आगे झुकना ही पड़ा। यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा के अपने तीसरे प्रयास में इन तीनों दोस्तों ने एक साथ, एक ही साल सफलता का परचम लहराया।



चूनाराम जाट ने पूरे देश में 270वीं रैंक हासिल की और वे भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के लिए चुने गए। उनके रूम पार्टनर अशोक सुथार ने 505वीं रैंक हासिल की। उनके तीसरे दोस्त कृष्णकुमार ने 788वीं रैंक के साथ सफलता पाई।



अजमेर एसपी की साइकिल गश्त ने बढ़ाया पुलिसकर्मियों का हौसला


लीक से हटकर पुलिसिंग

वर्ष 2013 बैच के आईपीएस अधिकारी के रूप में चूनाराम जाट ने जब राजस्थान कैडर संभाला, तो उन्होंने निश्चय किया कि वे पुलिस की छवि को केवल एक दमनकारी बल नहीं, बल्कि जनता का मददगार बनाएंगे। उन्होंने टोंक, दौसा, प्रतापगढ़, पाली और अजमेर जैसे चुनौतीपूर्ण जिलों में एसपी (SP) के रूप में काम किया। अपनी सख्त कानून-व्यवस्था और साफ-सुथरी प्रशासनिक छवि के कारण वे आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुए।



अजमेर में तैनाती के दौरान एसपी चूनाराम जाट ने एक ऐसा संवेदनशील फैसला लिया, जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया। उनके अधीन काम करने वाला एक पुलिस कांस्टेबल अत्यधिक शराब पीने का आदी था। वह अपनी पूरी तनख्वाह शराब में उड़ा देता था, जिससे उसके बच्चों का भविष्य प्रभावित हो रहा था।



जब यह मामला एसपी चूनाराम के पास पहुंचा, तो उन्होंने एक कड़ा और अभूतपूर्व प्रशासनिक आदेश जारी किया। उन्होंने उस कांस्टेबल के वेतन का सीधे 50% हिस्सा उसकी पत्नी के बैंक खाते में ट्रांसफर करने का आदेश दिया। इस एक फैसले ने उस बिखरते हुए परिवार को बचा लिया और बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित की।



एक मजदूर के दर्द को समझने वाले चूनाराम ने पुलिस महकमे के निचले स्तर के कर्मचारियों के तनाव को समझा। उन्होंने पुलिसकर्मियों के लिए साप्ताहिक अवकाश की व्यवस्था को बेहद कड़ाई से लागू किया, ताकि वे अपने परिवारों को समय दे सकें। इसके साथ ही उन्होंने थानों में आम जनता की जनसुनवाई को अनिवार्य बनाया और शाम की गश्त को कड़ा करके महिलाओं और बुजुर्गों में सुरक्षा का भाव पैदा किया।



वर्तमान कमान

जयपुर में आरएसी (RAC) की 5वीं बटालियन के कमांडेंट के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद, मार्च 2026 में राज्य सरकार ने उनकी काबिलियत और बेदाग रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें सीमावर्ती और बेहद संवेदनशील जिले बाड़मेर के पुलिस अधीक्षक (SP) की कमान सौंपी। बाड़मेर के एसपी के रूप में चूनाराम जाट आज अपनी उसी चिरपरिचित ईमानदारी और कड़क प्रशासनिक शैली से अपराध और अपराधियों पर नकेल कस रहे हैं।



IPS चूनाराम जाट के जीवन से युवाओं के लिए 5 अनमोल सूत्र

यदि आप एक छात्र हैं, एक प्रतियोगी हैं या जीवन के किसी भी मोड़ पर संघर्ष कर रहे हैं, तो चूनाराम जाट की इस जीवन यात्रा को अपने स्टडी रूम की दीवार पर लिख लीजिए:



परिस्थितियां कभी बाधा नहीं बनतीं: अगर ₹50 रोज की मजदूरी करने वाला लड़का बिना रेगुलर स्कूल जाए देश का IPS अफसर बन सकता है, तो आपके पास मौजूद साधन आपकी सफलता के लिए पर्याप्त हैं।



बड़ी सोच रखें: तैयारी के दौरान मिली छोटी सरकारी नौकरी को ठुकराना यह सिखाता है कि बड़े लक्ष्य को पाने के लिए छोटे प्रलोभनों का त्याग करना पड़ता है।



सही संगति का चुनाव करें: मुखर्जी नगर के उस कमरे की कहानी बताती है कि आपके दोस्त ऐसे होने चाहिए जो आपकी कमजोरी नहीं, बल्कि आपकी ताकत बनें और आपको आगे बढ़ाएं।



अपनी जड़ों और मददगारों को कभी न भूलें: चूनाराम आज भी अपने गुरु नारायण भादू और अपने गांव के उन लोगों का नाम बेहद आदर से लेते हैं जिन्होंने उनके बुरे वक्त में मदद की थी। कृतज्ञता ही महानता की पहली सीढ़ी है।



सफलता के बाद भी संवेदनशीलता बनाए रखें: एक बड़ा अफसर बनने के बाद भी समाज के सबसे निचले तबके और अपने मातहत कर्मचारियों के दर्द को समझना ही एक सच्चे प्रशासनिक अधिकारी की पहचान है।



कल तक जो मजदूरी कर रहा था, आज वही शख्स देश की आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की मजबूत दीवार बनकर खड़ा है। चूनाराम जाट की कहानी इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि सफलता कभी किसी की बपौती नहीं होती। यह न तो अमीरी की मोहताज है और न ही किसी बड़े शहर के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की।



सफलता सिर्फ एक चीज मांगती है - अटूट जिद और कभी न खत्म होने वाली मेहनत। यदि आपके इरादों में चूनाराम जाट जैसी शिद्दत है, तो यकीन मानिए, आज भले ही आपकी जेब खाली हो, लेकिन आपका आने वाला कल आपकी कामयाबी की गवाही खुद चिल्लाकर देगा।



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