8वीं क्लास में रोशनी गई, फिर भी नहीं छोड़ा सपना; IAS मनु गर्ग से सीखें जीत का जज्बा
जिंदगी में मुश्किलें किसी के लिए भी आ सकती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई उनके सामने हार मान लेता है और कोई उन्हीं मुश्किलों को अपनी ताकत बना लेता है। अगर इरादा मजबूत हो तो हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, इंसान अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है।
जयपुर के मनु गर्ग इसकी मिसाल हैं। आठवीं कक्षा में आंखों की रोशनी चली गई, पढ़ाई का तरीका पूरी तरह बदलना पड़ा और हर कदम पर नई चुनौती सामने आई। लेकिन मनु ने न पढ़ाई छोड़ी, न अपना सपना।
मनु गर्ग ने 2024 में UPSC में 91वीं रैंक हासिल की थी
मां के साथ और तकनीक की मदद से उन्होंने अपनी राह बनाई और UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2024 में 91वीं रैंक हासिल कर IAS बनने का सपना पूरा किया। ये उनकी दूसरी कोशिश थी। आज मनु राजस्थान कैडर के आईएस अधिकारी हैं और फिलहाल बीकानेर में असिस्टेंट कलेक्टर (अंडर ट्रेनिंग) के तौर पर प्रशासनिक प्रशिक्षण ले रहे।
मनु की कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि ठान लिया जाए तो मुश्किल हालात भी मंजिल का रास्ता नहीं रोक सकते।
IAS मुन गर्ग की 8वीं क्लास में आंखों की रोशनी चली गई थी
राजस्थान कैडर के आईएएस अधिकारी मनु का बचपन जयपुर में बीता। पढ़ाई में वे शुरू से होशियार थे और स्कूल में अच्छे प्रदर्शन के लिए जाने जाते थे। लेकिन आठवीं क्लास में उनकी आंखों की रोशनी धीरे-धीरे कम होने लगी। इस वजह से उनका क्लास में कितान पढ़ना मुश्किल हो गया। यहां तक कि क्लास में रीडिंग के दौरान भी परेशानी होने लगी। मनु ने इसका रास्ता निकाला।
वो पहले से ही घर में पाठ तैयार करते जाते, ताकि क्लास में कम से कम पढ़ाई का हिस्सा खुद संभाल सकें। लेकिन, किस्मत को कुछ और मंजूर था, उम्र बढ़ने के साथ उनकी बीमारी बढ़ती गई और आखिरकार उन्होंने आंखों की रोशनी पूरी तरह खो दी।
यह मनु और उनके परिवार के लिए बड़ा झटका था। सवाल सिर्फ आंखों की रोशनी का नहीं था। सवाल यह था कि आगे की पढ़ाई कैसे होगी? इसके बाद मां आगे आईं और मनु के लिए मोर्चा संभाला।
मां ने संभाली थी मनु की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी
मुश्किल समय में मनु की मां वंदना जैन उनके साथ मजबूती से खड़ी रहीं। 10वीं के बाद उन्होंने मनु के लिए अलग तरह से पढ़ाई का इंतजाम किया। वे स्कूल जातीं, शिक्षकों से नोट्स लेतीं और घर आकर मनु को पढ़कर सुनातीं। साइंस, हिंदी, इंग्लिश और सोशल साइंस जैसे विषयों की किताबें मां पढ़ती थीं और मनु उन्हें सुनकर याद करते थे। मनु जो जवाब बोलकर बताते, मां उन्हें लिखती थीं।
गणित के सवालों को हल करने में उनके मामा ने उनकी मदद की। वे बड़े बोर्ड पर सवाल लिखकर मनु को समझाते थे। यानी जिस काम के लिए आम तौर पर किताब और आंखें जरूरी होती हैं, मनु के परिवार ने उसका दूसरा रास्ता खोज लिया।
तकनीक बनी पढ़ाई की नई आंखें
समय के साथ मनु ने अपनी पढ़ाई में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया। उन्होंने स्क्रीन रीडर, ऑडियो नोट्स, मोबाइल ऐप और दूसरे डिजिटल टूल्स की मदद ली। इससे किताबों और पढ़ाई की सामग्री तक उनकी पहुंच आसान हुई। तकनीक ने उनकी निर्भरता भी कम की। अब वे सिर्फ किसी के पढ़कर सुनाने पर निर्भर नहीं थे। डिजिटल मीडिया से वे खुद भी पढ़ाई से जुड़ा कॉन्टेंट सुन सकते थे और अपनी तैयारी आगे बढ़ा सकते थे।
इसी दौरान उन्होंने कंप्यूटर साइंस में भी अपनी रुचि डेवलप की और 12वीं में इस विषय में 100 में से 100 अंक हासिल किए। मनु का बचपन से ही सपना था कि वो प्रशासनिक अधिकारी बने। लेकिन, आंखों की रोशनी से जुड़ी बीमारी के कारण शुरुआत में जरूर परेशानी आई लेकिन परिवार ने मनु की पढ़ाई नहीं रुकने दी।
मां की इच्छा थी कि बेटे की पढ़ाई अच्छे अंग्रेजी मीडियम स्कूल में हो। परिवार की कोशिशों से मनु का दाखिला जयपुर के सेंट जेवियर्स स्कूल में हुआ। बाद में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से राजनीति शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया।
आंखों की रोशनी जाने के बाद भी परिवार ने मनु गर्ग की पढ़ाई रुकने नहीं दी। यही साथ आगे चलकर उनके IAS बनने की नींव बना।
ग्रेजुएशन के दौरान ही मनु ने देखा था IAS बनने का सपना
मनु ने सिविल सेवा में जाने का फैसला ग्रेजुएशन के दौरान किया। इसके बाद उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू कर दी। पहले प्रयास में उन्हें सफलता नहीं मिली। लेकिन नाकामी के बाद उन्होंने तैयारी छोड़ी नहीं। अपनी कमियों को समझा और दूसरे प्रयास की तैयारी में जुट गए। इस दौरान मां लगातार उनके साथ रहीं। मनु ने पढ़ाई के लिए ऑडियो सामग्री, तकनीक और दूसरे डिजिटल मीडियम और टूल्स का इस्तेमाल किया।
उन्होंने अपनी कमजोरी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उनका फोकस इस बात पर रहा कि जो लक्ष्य तय किया है, उसे पाने के लिए उपलब्ध साधनों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कैसे किया जाए।
दूसरे प्रयास में UPSC में हासिल की 91वीं रैंक
मनु गर्ग ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2024 में दूसरा प्रयास दिया और इस बार उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 91 हासिल की। वे देश के उन सफल अभ्यर्थियों में शामिल रहे, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद सिविल सेवा परीक्षा पास की।
मनु की सफलता की सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने दृष्टिबाधित होने को अपनी तैयारी की अंतिम सीमा नहीं बनने दिया। मां की मदद और तकनीक को साथ लेकर उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और आखिरकार IAS बनने का सपना पूरा किया।
आज राजस्थान कैडर के IAS अधिकारी हैं मनु
यूपीएससी (UPSC) में चयन के बाद मनु को राजस्थान कैडर मिला। वे 2025 बैच के IAS अधिकारी हैं। फिलहाल वे बीकानेर में Assistant Collector (Under Training) के तौर पर काम कर रहे। यानी जिस लड़के ने कभी आंखों की रोशनी जाने के बाद आगे की पढ़ाई को लेकर सवाल खड़े होते देखे थे, आज वही प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनकर काम कर रहा।
मनु गर्ग की कहानी से युवा क्या सीख सकते?
हालात खराब हों तो रास्ता बदलें, लक्ष्य नहीं: मनु गर्ग की आंखों की रोशनी कम उम्र में ही चली गई थी, लेकिन उन्होंने IAS बनने का लक्ष्य नहीं छोड़ा। रास्ता बदलना पड़ा, पढ़ाई का तरीका बदलना पड़ा, लेकिन मंजिल वही रही। ये उन युवाओं के लिए सीख है, जो इक्का-दुक्का नाकामी के बाद अपने सपने का पीछा करना छोड़ देते।
मदद मांगना कमजोरी नहीं है: मनु की मां ने उन्हें पढ़ाया, मामा ने गणित समझाया और परिवार ने हर कदम पर साथ दिया। सफलता अकेले हासिल करने की जिद के बजाय सही लोगों की मदद लेना भी आगे बढ़ने का तरीका है।
तकनीक को कमजोरी नहीं, ताकत बनाइए: मनु ने स्क्रीन रीडर, ऑडियो सामग्री और मोबाइल ऐप को अपनी पढ़ाई का हिस्सा बनाया। सीख यह है कि नई तकनीक का इस्तेमाल मुश्किल काम को आसान बनाने के लिए किया जा सकता।
पहली असफलता को अंतिम फैसला मत मानिए: UPSC के पहले प्रयास में मनु सफल नहीं हुए। लेकिन उन्होंने तैयारी छोड़ी नहीं। दूसरे प्रयास में 91वीं रैंक हासिल की। असफलता कई बार मंजिल नहीं, तैयारी का अगला चरण होती है।
अपनी कमजोरी को अपनी पहचान मत बनने दीजिए: मनु की पहचान उनकी दृष्टिबाधिता नहीं, उनकी मेहनत और उपलब्धि बनी। जिंदगी में किसी कमी या मुश्किल को अपनी पूरी पहचान बना लेना सबसे बड़ी हार हो सकती है। मनु की कहानी बताती है कि परिस्थितियां आपकी गति रोक सकती हैं, लेकिन अगर आप ठान लें तो मंजिल तय करने से नहीं रोक सकतीं।
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