चाय की दुकान से कलेक्ट्रेट तक का सफर, यह है आईएएस देशल दान की दिलचस्प कहानी
राजस्थान की तपती, रेतीली धरती ने देश को कई शूरवीर दिए हैं, लेकिन आज की पीढ़ी के लिए शौर्य की परिभाषा बदल चुकी है। आज के समय में शौर्य केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहा। यह कठिन परिस्थितियों का सामना करने और समाज के लिए योगदान देने की क्षमता बन गया है।
जैसलमेर के एक छोटे से गांव से निकलकर अभावों और संघर्षों को पार करने वाले आईएएस देशल दान आधुनिक युग के साहस और लगन के प्रतीक हैं। एक चाय बेचने वाले के बेटे के रूप में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों और पारिवारिक त्रासदियों का सामना किया। आज वह डूंगरपुर के जिला कलेक्टर के रूप में जनता की सेवा कर रहे हैं।
अभावों में बीता बचपन और पिता का त्याग
जैसलमेर जिले के सुमालाई गांव में रहने वाले देशल दान का परिवार बड़ा था। 10 सदस्यों के इस परिवार का पेट पालने का एकमात्र जरिया उनके पिता कुशलदान चारण की एक छोटी सी चाय की दुकान थी। गांव के चौराहे पर चाय की चुस्कियां परोसने वाले कुशलदान के पास दौलत तो नहीं थी, लेकिन उनके पास एक विजन जरूर था। पिता जानते थे कि गरीबी की बेड़ियों को केवल शिक्षा की चाबी से ही खोला जा सकता है। घर का खर्च चलाना मुश्किल था, फिर भी उन्होंने कभी बच्चों पर काम का दबाव नहीं डाला। जब पढ़ाई के लिए पैसों की कमी हुई, तो पिता ने लोगों से कर्ज लेने में संकोच नहीं किया। उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी और साख अपने बच्चों के भविष्य पर लगा दी।
एक भाई का बलिदान और अधूरा सपना
देशल जब 10वीं कक्षा में थे, तब उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके बड़े भाई, जो भारतीय नौसेना में तैनात थे, एक पनडुब्बी हादसे में शहीद हो गए। पूरा परिवार इस सदमे से बिखर गया था। देशल के लिए उनके भाई केवल एक प्रेरणा नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक थे। उनके भाई का सपना था कि देशल एक बड़ा प्रशासनिक अधिकारी बने। भाई की शहादत ने देशल के मन में एक ऐसी आग जला दी, जिसे केवल सफलता ही शांत कर सकती थी। पिता के संघर्ष और भाई के अधूरे सपने ने उन्हें हार न मानने की शक्ति दी।
IIT और सपनों का विस्तार
देशल पढ़ाई में शुरू से ही मेधावी थे। 12वीं के बाद उन्होंने अपनी वैज्ञानिक सोच और कड़ी मेहनत के दम पर देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक IIT-JEE क्रैक की। उन्होंने IIT जबलपुर से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। एक इंजीनियर के रूप में उनके पास विदेश जाने या किसी मल्टीनेशनल कंपनी में लाखों का पैकेज लेने का विकल्प था। लेकिन, उनकी आंखों में सुमालाई की वो चाय की दुकान और शहीद भाई का वो सपना अभी भी ताजा था। उन्होंने सुरक्षित करियर को छोड़ अनिश्चितता के रास्ते यानी यूपीएससी को चुना।
न कोचिंग, न साधन, बस संकल्प
इंजीनियरिंग के बाद देशल दिल्ली आ गए। उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे महंगी कोचिंग की फीस भर सकें। ऐसे में उन्होंने सेल्फ स्टडी का रास्ता चुना। उन्होंने इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों को अपना गुरु बनाया और ऑनलाइन उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग कर अपनी रणनीति तैयार की। उन्होंने अपनी आर्थिक तंगी को कभी कमजोरी नहीं बनने दिया। कमजोर विषयों पर दोगुना समय दिया और लगातार खुद को बेहतर बनाने के लिए रणनीति पर काम किया। बिना किसी शोर-शराबे के, एक छोटे से कमरे में देशल ने खुद को दुनिया से काट लिया और केवल अपनी किताबों से नाता जोड़ा।
पहले प्रयास में ही फतह
साल 2017 का रिजल्ट जब आया, तो पूरे राजस्थान में खुशी की लहर दौड़ गई। देशल दान ने अपने पहले ही प्रयास में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 82वीं रैंक हासिल की। जैसलमेर के एक चाय वाले का बेटा अब IAS अधिकारी बन चुका था। इस रैंक ने न केवल उनके पिता को गर्व का मौका दिया, बल्कि उनके त्याग को एक ऐसी ऊंचाई दी, जिस पर पूरा गांव गर्व कर रहा था। यह सफलता इस बात का प्रमाण थी कि यदि इरादे मजबूत हों, तो संसाधन कभी रास्ते की रुकावट नहीं बनते।
सहायक कलेक्टर से जिला कलेक्टर तक
राजस्थान कैडर के2018 बैच के आईएएस अधिकारी के रूप में देशल दान का प्रशासनिक सफर बहुत ही शानदार रहा है। उन्होंने सहायक कलेक्टर (प्रशिक्षु) के रूप में अपनी पारी शुरू की और फिर कोटा के रामगंज मंडी और पाली में एसडीएम के पद पर कार्य किया। अपनी कार्यकुशलता और ईमानदारी से उन्होंने बहुत कम समय में पहचान बनाई। इसके बाद उन्होंने अजमेर नगर निगम के आयुक्त के रूप में शहर के बुनियादी ढांचे पर काम किया। वर्तमान में वे डूंगरपुर के जिला कलेक्टर के रूप में सेवा दे रहे हैं।
युवाओं के लिए संदेश
देशल दान की कहानी से कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। वे कहते हैं कि संसाधनों का रोना रोने के बजाय अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत करें। बहुत ज्यादा सामग्री पढ़ने से बेहतर है कि सीमित किताबों का बार-बार रिवीजन किया जाए। वे युवाओं को सलाह देते हैं कि अपने संघर्षों और अपने परिवार की स्थिति को अपनी प्रेरणा बनाएं। तैयारी के दौरान मौन रहकर अपनी मेहनत पर ध्यान दें और अपनी सफलता को शोर करने दें।
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