अब सोना-चांदी नहीं, तांबे के पीछे पागल हो रही दुनिया!

Amresh Kushwaha | Aug 19, 2026, 13:52 IST
दुनिया में तांबे की डिमांड बढ़ी
सोना-चांदी छोड़कर अब दुनिया तांबे के पीछे भाग रही है। अगस्त 2026 में भारत में कॉपर का भाव 1400 रुपए प्रति किलो के करीब पहुंचा। EV, सोलर और AI डेटा सेंटर की मांग से सप्लाई कम पड़ रही है। इससे कंपनियां भारी कीमत चुका रही हैं।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • अब निवेशक सोना-चांदी की जगह तांबे के पीछे भाग रहे हैं।
  • अगस्त 2026 में भारत में कॉपर का भाव 1,400 रुपए प्रति किलो के करीब पहुंचा।
  • EV, सोलर और AI डेटा सेंटर से तांबे की मांग तेजी से बढ़ी है।
  • सप्लाई कम होने से कंपनियां तुरंत डिलीवरी के लिए भारी प्रीमियम दे रही हैं।
  • S&P Global के मुताबिक 2040 तक मांग 50% तक बढ़ सकती है।

अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार से एक दिलचस्प खबर सामने आई है। अब तक निवेशक सोना और चांदी की चमक के पीछे भागते थे। लेकिन अब तांबा दुनिया की अर्थव्यवस्था का केंद्र बनता जा रहा है। स्थिति यह हैं कि कंपनियां तुरंत डिलीवरी पाने के लिए तय भाव से भी ज्यादा पैसे दे रही हैं।



MCX पर कॉपर का नया रिकॉर्ड

भारतीय बाजार में तांबे की कीमत ने नया रिकॉर्ड बनाया है। अगस्त 2026 में भारत में कॉपर का भाव करीब एक हजार 400 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया। 17 अगस्त 2026 को MCX (Multi Commodity Exchange of India Limited) पर भी कॉपर का वायदा अनुबंध इसी स्तर के आसपास कारोबार कर रहा था। सिर्फ कीमत ही नहीं बढ़ी है। तुरंत माल पाने के लिए खरीदार भारी प्रीमियम भी दे रहे हैं।



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क्यों बढ़ी तांबे की मांग?

मांग और सप्लाई के बीच बढ़ता अंतर ही इस उछाल की सबसे बड़ी वजह है। पावर ग्रिड, इलेक्ट्रिक व्हीकल यानी EV, रिन्यूएबल एनर्जी और AI (Artificial Intelligence) डेटा सेंटर में कॉपर की खपत तेजी से बढ़ी है। इसी वजह से LME (London Metal Exchange) पर भी कॉपर का भाव रिकॉर्ड स्तर के करीब बना हुआ है। बिजली और इलेक्ट्रिफिकेशन के इस दौर में तांबे की भूमिका बहुत बड़ी हो गई है। यही वजह है कि विश्लेषक अब कॉपर को एनर्जी ट्रांजिशन का नया तेल कहने लगे हैं।



सप्लाई बढ़ाना क्यों मुश्किल

मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन सप्लाई रातों-रात नहीं बढ़ाई जा सकती। नई कॉपर खदान शुरू करने में कई साल लग जाते हैं। सही भंडार खोजना खुद एक लंबा काम है। इसके बाद सरकारी मंजूरी लेनी पड़ती है। खदान का विकास करने में भी समय और पैसा दोनों लगता है। इसके अलावा पुरानी खदानों में अयस्क की गुणवत्ता भी घट रही है। परिचालन दिक्कतों ने उत्पादन लागत को और बढ़ा दिया है। इन सभी वजहों से सप्लाई पर दबाव बना हुआ है।



2040 तक मांग में 50% उछाल

मार्केट रिसर्च एजेंसी S&P Global ने एक बड़ा अनुमान जारी किया है। इसके मुताबिक 2025 में वैश्विक कॉपर मांग 28 मिलियन टन दर्ज हुई थी। साल 2040 तक यह मांग बढ़कर 42 मिलियन टन तक पहुंच सकती है। यानी अगले डेढ़ दशक में मांग में करीब 50% की बढ़ोतरी होगी।



बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन में तांबे की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। इसलिए EV, रिन्यूएबल एनर्जी और AI डेटा सेंटर आने वाले समय में कॉपर के सबसे बड़े खरीदार बने रहेंगे।



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स्मेल्टर संकट और प्रीमियम

मौजूदा संकट की एक बड़ी वजह कॉपर कंसन्ट्रेट की भारी कमी है। इसी कंसन्ट्रेट को प्रोसेस करके रिफाइंड कॉपर तैयार किया जाता है। जब कच्चा माल कम मिलता है, तो स्मेल्टर आपस में होड़ करते हैं। इससे उनकी परिचालन लागत बढ़ जाती है और मुनाफा घट जाता है। दूसरी तरफ किसी कंपनी के लिए फैक्ट्री रोकना ज्यादा महंगा पड़ता है। इसलिए वे थोड़ा ज्यादा प्रीमियम देकर भी कॉपर खरीदना पसंद करती हैं। यही कारण है कि तुरंत डिलीवरी के लिए भारी प्रीमियम चुकाया जा रहा है।



LME भाव बनाम प्रीमियम

तांबे का वैश्विक मूल्य तय करने में LME के भाव का इस्तेमाल होता है। वहीं, खरीदार की असली लागत सिर्फ इसी भाव से तय नहीं होती। केबल और ट्रांसफॉर्मर बनाने वाली कंपनियों को असली फिजिकल कॉपर चाहिए होता है।



LME भाव वैश्विक स्तर का संकेत देता है। इसके ऊपर दिया गया प्रीमियम बताता है कि माल पहुंचाने में कितना अतिरिक्त खर्च आ रहा है। भारत रिफाइंड कॉपर के लिए आयात पर बहुत निर्भर है। इसलिए वैश्विक सप्लाई संकट का असर सीधे भारतीय खरीदारों पर पड़ता है।



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भारत में कहां खपत ज्यादा

ICAI (Institute of Chartered Accountants of India) के आंकड़े इस बारे में साफ तस्वीर देते हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत की कुल कॉपर मांग 9.3% बढ़कर 1.878 मिलियन टन पहुंच गई। बिल्डिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही, करीब 25%।



इंडस्ट्रियल एप्लिकेशन की हिस्सेदारी 19% रही। इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की हिस्सेदारी 17% दर्ज हुई। इन आंकड़ों से साफ है कि भारत में तांबे का ज्यादातर इस्तेमाल अभी भी पारंपरिक निर्माण क्षेत्र में हो रहा है।



ग्रीन सेक्टर में तेज ग्रोथ

पारंपरिक क्षेत्रों के अलावा नई तकनीकों में भी तांबे का इस्तेमाल बढ़ रहा है। सोलर पावर, विंड एनर्जी, EV, बैटरी स्टोरेज और इलेक्ट्रोलाइजर्स जैसे सेक्टर इसमें शामिल हैं। FY25 में इन क्षेत्रों में कॉपर की खपत 32% तक बढ़ी। हालांकि कुल मांग में इन नए सेक्टर की हिस्सेदारी अभी सिर्फ 4.6% है। इसका मतलब साफ है कि आगे चलकर एनर्जी ट्रांजिशन से जुड़े क्षेत्र ही कॉपर मांग के मुख्य चालक बनेंगे।



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भारतीय उद्योगों पर असर

तांबे की बढ़ती कीमत का असर सिर्फ ट्रेडर्स तक सीमित नहीं है। केबल, ट्रांसफॉर्मर, मोटर और इलेक्ट्रिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों की लागत बढ़ रही है। जो कंपनियां तुरंत माल के लिए प्रीमियम दे रही हैं, उनका मुनाफा घट रहा है। भारत की आयात पर निर्भरता इस जोखिम को और बढ़ा देती है। शिपिंग में कोई भी रुकावट या वैश्विक कीमतों में उछाल सीधे भारतीय बाजार को प्रभावित करता है।



आगे क्या होगा

कॉपर बाजार का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्पादन क्षमता मांग की रफ्तार पकड़ पाएगी। अगर नई खदानें समय पर शुरू नहीं हुईं, तो कीमतों में तेजी बनी रह सकती है। भारत के लिए यह मुद्दा और भी अहम है। मई 2026 में देश की पीक बिजली मांग 270.8 GW (गीगावाट) के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुकी थी। आने वाले सालों में इलेक्ट्रिफिकेशन, रिन्यूएबल प्रोजेक्ट और EV अपनाने से कॉपर की मांग और बढ़ना तय माना जा रहा है।



FAQ

  1. तांबे की कीमत अचानक क्यों बढ़ रही है?
    तांबे की मांग EV, सोलर, विंड एनर्जी और AI डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ी है। वहीं सप्लाई बढ़ाना आसान नहीं है, क्योंकि नई खदान शुरू करने में कई साल लगते हैं। इसी मांग-सप्लाई अंतर के कारण अगस्त 2026 में भारत में कॉपर का भाव 1,400 रुपए प्रति किलो के करीब पहुंच गया।
  2. भारत में तांबे का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कहां होता है?
    ICAI के आंकड़ों के मुताबिक FY25 में बिल्डिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही, करीब 25%। इसके बाद इंडस्ट्रियल एप्लिकेशन 19% और इंफ्रास्ट्रक्चर 17% रहा। सोलर, विंड और EV जैसे नए सेक्टर की हिस्सेदारी अभी सिर्फ 4.6% है, लेकिन इसमें 32% की तेज ग्रोथ दर्ज हुई है।
  3. कॉपर की कीमत बढ़ने से आम आदमी पर क्या असर होगा?
    कॉपर महंगा होने से केबल, ट्रांसफॉर्मर, मोटर और इलेक्ट्रिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों की लागत बढ़ेगी। इसका असर आगे चलकर इन उत्पादों की कीमत पर पड़ सकता है। भारत आयात पर निर्भर है, इसलिए वैश्विक कीमतों का असर सीधे घरेलू बाजार पर भी दिखेगा।

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