दुनिया में हर पांचवां नाविक भारतीय, आखिर गहरे समुद्र में ऐसा क्या है आकर्षण?
Mumbai: उस सुबह 27 साल के अब्दुर रहमान मंडल को यकीन सा हो गया था कि आज उसकी जिंदगी का सूरज हमेशा के लिए डूबने वाला है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) का वह खौफनाक पानी मानो उन्हें निगलने के लिए हिलोरे ले रहा था।
पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के मिर्जापुर गांव में बना उनका घर उस वक्त दुनिया का सबसे दूरस्थ कोना लग रहा था। मेरे दिमाग में बस मेरे बूढ़े माता-पिता, पत्नी और बहनों के चेहरे घूम रहे थे। एक अजीब सी कसमसाहट थी कि क्या मैं उन्हें कभी दोबारा देख पाऊंगा? अब्दुर उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए सिहर उठते हैं।
एबल सीमैन (Able Seaman) के पद पर तैनात मंडल 1 मार्च को पलाऊ के झंडे वाले एक विशाल तेल टैंकर पर सवार थे। ईरान की ओर से दागी गई एक मिसाइल सीधे उनके जहाज से आ टकराई। धमाका इतना जोरदार था कि समंदर की लहरें भी कांप उठी थीं।
इसके कुछ दिन बाद 28 वर्षीय इलेक्ट्रो-टेक्निकल ऑफिसर विनीत शर्मा उसी अशांत समुद्री क्षेत्र से गुजरे। विनीत का जहाज ईरानी बंदरगाह से कच्चे तेल से पूरी तरह लदा हुआ भारत की ओर बढ़ रहा था। वे उत्तराखंड में नैनीताल के पास एक गांव के रहने वाले हैं। वे बताते हैं - खुशकिस्मती से हमारा सफर शांतिपूर्ण रहा, लेकिन मानसिक तनाव था। हम चौबीसों घंटे हाई-अलर्ट पर थे।
भारतीय नाविकों का दबदबा
पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में महीनों की भीषण सैन्य तनातनी के बाद ईरान और अमेरिका के बीच राजनयिक समझौता हो गया है। इसके तहत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने की तैयारी है।
इसके खुलते ही दुनिया के सबसे व्यस्त संवेदनशील समुद्री रास्तों में से एक पर व्यापारिक जहाजों (कमर्शियल वेसल्स) की आवाजाही फिर से बहाल हो जाएगी। सबसे अहम यह है कि इन जहाजों को अपनी जान हथेली पर रखकर चलाने वाले जांबाज नाविकों में एक बहुत बड़ी हिस्सेदारी भारतीयों की है। भारतीय नाविक आज वैश्विक समुद्री व्यापार की रीढ़ बन चुके हैं।
यह है हमारी समंदर में ताकत
कर्मचारियों की संख्या: वर्ष 2024 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत के पास 3.08 लाख सक्रिय नाविक हैं।
वैश्विक रैंकिंग: समुद्री जनशक्ति (Maritime Personnel) की आपूर्ति के मामले में भारत दुनिया में फिलीपींस और चीन के साथ शीर्ष तीन देशों में शामिल है।
वैश्विक हिस्सेदारी: दुनिया भर के जहाजों पर तैनात कुल क्रू (चालक दल) में भारत की हिस्सेदारी लगभग 17% है। सीधे शब्दों में कहें तो आज दुनिया भर के समंदरों में तैर रहे जहाजों पर हर पांचवा नाविक एक भारतीय है।
लेकिन यह रुतबा और हिस्सेदारी भारी कीमत मांगती है। हालिया संघर्ष में 550 भारतीय नाविकों के साथ ही भारत के झंडे वाले 13 जहाज 100 से अधिक दिन तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बंधक जैसे हालातों में फंसे रहे।
अगर पूरे खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) की बात करें तो 18,000 से अधिक भारतीय सेफारर्स (नाविक) युद्ध की इस अनिश्चितता और खौफ के साए में जीने को मजबूर थे।
ग्लैमर की चमक के पीछे छिपा अवसाद
एक दौर था जब मर्चेंट नेवी को युवाओं के बीच बेहद ग्लैमरस, राजसी और मोटी कमाई वाले करियर के रूप में देखा जाता था। सफेद कड़क यूनिफॉर्म, दुनिया भर की मुफ्त सैर और डॉलर में आने वाली सैलरी-यही इस करियर का विज्ञापन था। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे का स्याह अंधेरा अक्सर जहाज के डेक पर ही दफन हो जाता है।
महीनों तक अथाह समंदर के बीच रहने का अकेलापन, परिवार से कटी दुनिया और मानसिक तनाव इस नौकरी का हिस्सा है। प्रकृति के कहर, तकनीकी विफलताएं, सोमाली डाकुओं का आतंक और अब फारस की खाड़ी में तैरते जहाजों पर आसमान से मंडराते आत्मघाती ड्रोन या मिसाइल हमलों का डर। एक तेल टैंकर पर मिसाइल का गिरना यानी पलक झपकते ही पूरे क्रू का जिंदा जलकर खाक हो जाना है।
इसके बावजूद सच यह है कि खतरों के इस नए और बदसूरत दौर में भी भारत के महानगरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों और गांवों तक हजारों युवा हर साल मर्चेंट नेवी का हिस्सा बनने के लिए कतार में हैं।
लोनावला की वादियों में तैयार हो रहे हैं समंदर के सिपाही
मुंबई से कुछ दूर लोनावला में स्थित समुद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मैरीटाइम स्टडीज (SIMS) भारत की सबसे प्रतिष्ठित समुद्री अकादमियों में से एक है।
यहां वर्तमान में 390 कैडेट्स को एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार किया जा रहा है, जो बाहर की दुनिया के किसी भी दफ्तर या कॉर्पोरेट जॉब से हजार गुना ज्यादा सख्त है।
संस्थान मुख्य रूप से चार कड़े प्रोग्राम ऑफर करता है:
DNS (डेक नेविगेशन साइंस - एक वर्ष)
GME (ग्रेजुएट मरीन इंजीनियरिंग - एक वर्ष)
BTech (मरीन इंजीनियरिंग - चार वर्ष)
ETO (इलेक्ट्रो-टेक्निकल ऑफिसर कोर्स)
SIMS के वाइस-प्रिंसिपल कैप्टन सुभेंदु हाती दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा करते हैं। वे बताते हैं, कुछ समय में मैकेनिकल इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वाले पोस्टग्रेजुएट कोर्सेज (जैसे GME) की मांग में थोड़ी गिरावट आई है, लेकिन अंडरग्रेजुएट कोर्सेज की कहानी अविश्वसनीय रूप से बढ़ रही है।
दो साल पहले इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित प्रवेश परीक्षा (IMU-CET) में 39,000 आवेदक थे। पिछले साल यह संख्या 55,000 हुई। इस साल रिकॉर्ड 72,000 आवेदकों ने परीक्षा दी। खास बात यह है कि हमारे पास आने वाले अधिकांश कैडेट टियर-2 शहरों, छोटे कस्बों और सुदूर ग्रामीण इलाकों से आ रहे हैं।
यह संस्थान एग्जीक्यूटिव शिप मैनेजमेंट जैसी बड़ी शिपिंग कंपनियों द्वारा संचालित होते हैं। ये इन कैडेट्स को ट्रेनिंग पूरी होते ही सीधे अपने जहाजों पर 100% प्लेसमेंट की गारंटी देते हैं।
युद्ध अब हमारी रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा
IMS कैंपस में सुबह 5:30 बजे बजने वाले सायरन से लेकर रात 10:30 बजे तक पढ़ाई, शारीरिक प्रशिक्षण और कड़े प्रैक्टिकल का दौर चलता है।
इस थका देने वाले रूटीन के बीच, हालिया युद्ध, मिसाइल हमलों और समुद्री हादसों की खबरें अब डराती नहीं, बल्कि कैडेट्स की रोजमर्रा की चर्चा का हिस्सा बन चुकी हैं।
गोवा के रहने वाले 20 वर्षीय कैडेट ओरेन पाचेको कहते हैं, क्लासरूम और मेस में युद्ध की बातें लगातार होती हैं। हमारे प्रोफेसर्स और फैकल्टी अपने अनुभव साझा करते हैं। यह सब अब हमारी ट्रेनिंग का हिस्सा बन चुका है।
इसी तरह चेन्नई के 23 वर्षीय जीवा भारती दो महीने बाद जहाज पर जाने को तैयार हैं। वे अपने परिवार से समंदर का रुख करने वाले पहले व्यक्ति हैं। उन्होंने आरामदेह दफ्तरों की एयरो-कंडीशंड नौकरियों को लात मारकर इस कड़े रास्ते को चुना।
रूढ़ियों को तोड़तीं महिलाएं
SIMS के इस बैच में 19 महिला कैडेट्स भी हैं। ये पुरुष वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में अपनी योग्यता और साहस का लोहा मनवाने आई हैं।
गुजरात के एक पारंपरिक परिवार से आने वाली 19 वर्षीय खेता पटेल बताती हैं कि जब वे आठवीं कक्षा में थीं, तभी उन्होंने ठान लिया था कि वे वर्दी वाली नौकरी करेंगी।
जब वे नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) की परीक्षा पास नहीं कर पाईं तो उन्होंने मर्चेंट नेवी का रास्ता चुना। भारी-भरकम मशीनों और इंजनों के बीच काम करना चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन लड़कियां इसे भी बखूबी कर सकती हैं और हम कर रही हैं।
यह बदलाव इतना आसान नहीं रहा है। खेता की शिक्षिका कैप्टन राजविंदर कौर खुद लंबे समय तक जहाजों पर मास्टर (जहाज के सर्वोच्च अधिकारी) के पद पर रहीं। वे 2005 में शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) में शामिल हुई थीं।
वे बताती हैं, उस दौर में एक महिला होने के नाते मुझे खुद को साबित करने के लिए पुरुषों से दोगुनी मेहनत करनी पड़ती थी। चाहे वह भारी रस्सियों को उठाना हो, जहाज को गोदी से बांधना हो या पोर्ट पर बिना सोए घंटों काम करना हो।
इसके अलावा सबसे बड़ी चुनौती थी भावनात्मक अकेलापन। आज की तरह तब इंटरनेट नहीं था। सैटेलाइट फोन से बात करना बेहद महंगा था।
समुद्री डाकुओं के चंगुल में 8 महीने
पूर्व चीफ इंजीनियर मकरंद दाते अब कैडेट्स को इंजीनियरिंग पढ़ाते हैं। वे अपने करियर में खतरनाक समुद्री डकैती (Piracy) का सामना कर चुके हैं। वे बताते हैं, मैं कैडेट्स को सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं देता, बल्कि उन्हें उस मानसिक और शारीरिक कड़ेपन के लिए तैयार करता हूं जिसकी जरूरत तब होती है जब आपकी मौत आपके सामने खड़ी हो।
वे 1999 की एक घटना साझा करते हैं जब ब्राजील के एक बंदरगाह पर रात के अंधेरे में स्थानीय सशस्त्र लुटेरे चाकू और बंदूकें लेकर जहाज पर चढ़ आए थे। कैप्टन से सब कुछ लूटकर फरार हो गए थे। दाते कहते हैं, दो दशक बाद भी वह रात मुझे डराती है, लेकिन मर्चेंट नेवी का नियम है- आपको रुकना नहीं है।
इससे भी ज्यादा रूह कंपाने वाली दास्तान चिराग बाहरी की है, जिसे वे जिंदगी बदल देने वाला खौफ कहते हैं। अप्रैल 2010 में 28 वर्षीय मरीन इंजीनियर चिराग गुजरात के कांडला से बेल्जियम जा रहे एक केमिकल टैंकर एमवी मारिडा मार्गरीट पर सवार हुए थे।
8 मई 2010 को जब जहाज अदन की खाड़ी (Gulf of Aden) से गुजर रहा था, तब खूंखार सोमाली समुद्री डाकुओं ने अत्याधुनिक हथियारों के साथ जहाज पर धावा बोल दिया।
चिराग बताते हैं, उन्हें आठ महीनों (करीब 240 दिन) तक बंधक बनाकर रखा गया, भूखा रखा गया और बर्बर तरीके से प्रताड़ित किया गया। आखिरकार दिसंबर 2010 में शिपिंग कंपनी द्वारा डाकुओं को 5.5 मिलियन डॉलर (करोड़ों रुपए) की भारी-भरकम फिरौती देने के बाद उन्हें रिहा किया गया। चिराग 7 जनवरी 2011 को दिल्ली लौटे।
इस भयानक आघात के बावजूद वे कुछ समय के लिए दोबारा समंदर पर गए। अब वे इंटरनेशनल सेफारर्स वेलफेयर एंड असिस्टेंस नेटवर्क (ISWAN) के जरिए संकट में फंसे नाविकों की मदद करते हैं।
खतरा सिर्फ इंसानों या युद्ध से नहीं है, खुद कुदरत भी यहां रौद्र रूप दिखाती है। नाम न छापने की शर्त पर एक मास्टर मरीनियर ने बताया कि ग्रीनलैंड के बर्फीले पानी में लोडिंग के दौरान अचानक उन्हें मैसेज मिला कि समुद्री बर्फ तेजी से जम रही है। अगर वे तुरंत नहीं निकले तो उनका जहाज महीनों के लिए वहीं बर्फ में दब जाएगा।
वे आनन-फानन में निकले, लेकिन कुछ ही दूर जाकर उनका जहाज एक विशाल आइसबर्ग (बर्फ के पहाड़) से टकरा गया। जहाज का निचला हिस्सा फट गया और पानी अंदर भरने लगा। शून्य से नीचे के तापमान में पूरा क्रू रात भर डेक पर पानी रोकने की जंग लड़ता रहा। नजदीकी पोर्ट एक दिन दूर था, वे किसी तरह सुरक्षित पहुंचे, लेकिन उस कैप्टन के शब्दों में, उस एक रात के खौफ ने हम सबकी उम्र 10 साल बढ़ा दी थी।
हाई-टेक सिमुलेशन और पाठ्यक्रम में बदलाव
इन नए दौर के खतरों को देखते हुए देश भर की समुद्री अकादमियों ने अपने पारंपरिक ढर्रे को बदल दिया है। अब सुरक्षा ट्रेनिंग के सिलेबस में एक्टिव वॉर जोन (सक्रिय युद्ध क्षेत्र) से सुरक्षित निकलने की रणनीतियों को अनिवार्य रूप से शामिल किया गया है।
मुंबई के पास न्हावे में स्थित 116 साल पुराने संस्थान टी एस रहमान (T S Rehman) में सालाना लगभग 700 अधिकारी और रेटिंग्स ट्रेनिंग लेते हैं। वहां पिछले तीन महीनों से शनिवार के रूटीन लेक्चर्स को पूरी तरह वॉर केस स्टडीज (युद्ध सुरक्षा चर्चाओं) में बदल दिया गया है।
संस्थान के प्रिंसिपल कैप्टन आशुतोष अपांकर कहते हैं, हम कैडेट्स को शिपिंग कंपनियों से आने वाले वास्तविक डेटा के आधार पर सिखाते हैं कि जब मिसाइल या ड्रोन हमला हो तो आर्म्ड गार्ड्स (सशस्त्र गार्डों) का इस्तेमाल कैसे करना है, जोखिम को कैसे कम करना है, और संकट के समय उनका इंश्योरेंस और मेडिकल कवर कैसे काम करेगा। कैंपस में मनोवैज्ञानिक भी तैनात हैं जो छात्रों को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं।
90 सेकंड की अग्निपरीक्षा
इतना ही नहीं अब नाविकों को आधुनिक तकनीकों और सिमुलेटर के जरिए कड़ा अभ्यास कराया जा रहा है। एक कंप्यूटर सिमुलेशन में रात के ठीक 2 बजे जहाज पर ईरानी शाहेद-136 आत्मघाती ड्रोन के हमले का दृश्य (Scenario) तैयार किया जाता है।
इस दौरान कैडेट के पास अपनी जान और जहाज बचाने के लिए सिर्फ 90 सेकंड होते हैं। इन 90 सेकंड में उसे आपातकालीन संदेश भेजना होता है, क्रू के डर और भगदड़ को संभालना होता है, और जहाज को तेजी से मोड़ने (Evasive Action) का निर्णय लेना होता है।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कंप्यूटर कैडेट की हार्ट रेट (धड़कन), आंखों की पुतलियों की हलचल और आवाज के तनाव (Voice Stress) को ट्रैक करता है, ताकि यह जांचा जा सके कि क्या वह सच में दबाव में सही फैसला ले सकता है।
बड़ी शिपिंग कंपनियां जैसे मर्श (Maersk) भी अब नाविकों के परिवारों के लिए विशेष व्हाट्सएप ग्रुप और मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल कर रही हैं, ताकि जब जहाज किसी संवेदनशील इलाके में हो और सुरक्षा कारणों से ब्लैकआउट (संचार बंद) किया जाए। तब भी पीछे भारत में बैठे परिवारों को उनके सुरक्षित होने की पल-पल की जानकारी मिलती रहे।
मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर
वीआर मैरीटाइम सर्विसेज के सीईओ और राष्ट्रीय नौवहन बोर्ड के पूर्व सदस्य कैप्टन संजय पराशर बताते हैं कि मांग और आपूर्ति के बीच एक बहुत बड़ा अंतर पैदा हो गया है।
आज भारत में लगभग 25,000 से 40,000 सक्रिय कैप्टनों (Masters) की जरूरत है, लेकिन उपलब्धता केवल 12,000 की ही है।
इसकी वजह साफ है - आज की शहरी और आधुनिक पीढ़ी इस नौकरी के कड़े शारीरिक श्रम और अलगाव को झेलने के लिए तैयार नहीं है।
यही वजह है कि आज मर्चेंट नेवी में आने वाले अधिकांश युवा या तो बेहद जुनूनी हैं या फिर भारत के उन सुदूर छोटे शहरों और गांवों से आ रहे हैं, जहां इस नौकरी से मिलने वाली सैलरी उनके पूरे परिवार की तकदीर बदल देती है।
मर्चेंट नेवी का सैलरी स्ट्रक्चर (एक नजर में)
पद / रैंकऔसतन मासिक सैलरी (भारतीय रुपये में)
शुरुआती कैडेट (ट्रेनी) ₹40,000 - ₹50,000
जूनियर इंजीनियर / थर्ड ऑफिसर ₹1,00,000 - ₹1,50,000
सीनियर ऑफिसर (कुछ वर्षों के अनुभव के बाद) ₹10,00000 - ₹15,00000
मास्टर (कैप्टन) / चीफ इंजीनियर (शिखर पर) ₹10,00000 - ₹20,00000
नोट: एलएनजी (LNG) कैरियर्स, विशाल केमिकल टैंकर्स और गैस कैरियर्स पर जोखिम अधिक होने के कारण सबसे ज्यादा सैलरी दी जाती है।
कैप्टन पराशर कहते हैं, मर्चेंट नेवी के 90% रेटिंग्स हिमाचल, उत्तराखंड और तमिलनाडु के रामेश्वरम के तटीय इलाकों से आते हैं। ये नॉन-ऑफिसर क्रू, जो डेक की सफाई, वेल्डिंग और कड़े शारीरिक काम करते हैं।
जिस ग्रामीण परिवार की कुल मासिक आय मुश्किल से करीब 8-9 हजार रुपए होती है, जब उस घर का एक लड़का रेटिंग बनकर हर महीने करीब 1.6 लाख से 1.7 लाख रुपए घर भेजता है, तो वह सिर्फ एक जिंदगी नहीं बदलता, बल्कि समाज में उस पूरे परिवार का रुतबा और आर्थिक स्तर हमेशा के लिए बदल जाता है।
इसके अलावा, मणिपुर और उत्तर-पूर्व के राज्यों से बड़ी संख्या में महिलाएं अब आलीशान क्रूज और पैसेंजर जहाजों (जहां सालाना 50,000 भारतीय तैनात होते हैं) पर नौकरियां पा रही हैं।
अबांडनमेंट (Abandonment) - इस करियर का कड़वा सच
इस अकूत पैसे के सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। कई बार कम पढ़े-लिखे गरीब नाविक कुछ फर्जी एजेंटों के चक्कर में पड़कर पश्चिम अफ्रीका या खाड़ी देशों की ऐसी संदिग्ध छोटी शिपिंग कंपनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लेते हैं, जिनके मालिकों का कोई अता-पता नहीं होता।
ये जहाज फ्लैग्स ऑफ कन्वेनियन (Flags of Convenience-टैक्स चोरी और ढीले कानूनों वाले देशों में पंजीकृत जहाज) के तहत चलते हैं।
जब ये जहाज किसी कानूनी पचड़े में फंसते हैं या दिवालिया होते हैं, तो मालिक रातों-रात जहाज को समंदर में छोड़कर भाग जाते हैं। जहाज का बीमा खत्म हो जाता है, राशन और पानी खत्म हो जाता है। महीनों तक ये नाविक बिना सैलरी के अंतरराष्ट्रीय पानी में भूखे-प्यासे लावारिस फंसे रह जाते हैं।
वैश्विक स्तर पर जहाजों पर नाविकों को इस तरह लावारिस छोड़ दिए जाने के कुल मामलों में अकेले भारत की हिस्सेदारी 18% है, जो एक बेहद चिंताजनक आंकड़ा है।
FAQ
- पूरी दुनिया में कितने भारतीय जहाजों पर नौकरी करते हैं?
वर्ष 2024 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत के पास 3.08 लाख सक्रिय नाविक हैं। समुद्री जनशक्ति (Maritime Personnel) की आपूर्ति के मामले में भारत दुनिया में फिलीपींस और चीन के साथ शीर्ष तीन देशों में शामिल है। दुनिया भर के जहाजों पर तैनात कुल क्रू (चालक दल) में भारत की हिस्सेदारी लगभग 17% है। - आईएमयूसीईटी (IMU-CET) में आवेदकों की क्या स्थिति है?
दो साल पहले इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित प्रवेश परीक्षा (IMU-CET) में 39,000 आवेदक थे। पिछले साल यह संख्या 55,000 हुई। इस साल रिकॉर्ड 72,000 आवेदकों ने परीक्षा दी।
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