सोना अब लॉकर में नहीं, गोल्ड लोन का बढ़ रहा क्रेज, जानिए पूरा गणित
Jaipur: भारत में सोना (Gold) सिर्फ एक धातु नहीं है। यह दादी-नानी के आशीर्वाद का हिस्सा है। यह शादियों का गौरव है। और मुश्किल वक्त में परिवार का सबसे भरोसेमंद साथी है। लेकिन पिछले कुछ सालों में भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में एक मूक क्रांति आई है।
जिस सोने को कभी अंतिम विकल्प के रूप में गिरवी रखा जाता था, आज वह देश के सबसे तेज़ी से बढ़ते लोन मार्केट की रीढ़ बन चुका है।
क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनी CRIF High Mark के हालिया आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि देश का गोल्ड लोन मार्केट सालाना 50.4% की अभूतपूर्व विकास दर (YoY) के साथ कुलांचे मार रहा है। मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार देश में कुल गोल्ड लोन आउटस्टैंडिंग 18.62 लाख करोड़ रुपए के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच चुका है।
लेकिन इस चमकती हुई कहानी के पीछे एक बेहद दिलचस्प और असमान क्षेत्रीय भूगोल छिपा है। जहां दक्षिण भारत इस पूरे खेल का एकछत्र राजा बना हुआ है, वहीं देश के सबसे बड़े मरुस्थलीय राज्य राजस्थान में भी अब सोने पर लोन को लेकर एक नई सामाजिक और आर्थिक चेतना अंगड़ाई ले रही है।
14 लाख करोड़ का साम्राज्य
देश के कुल गोल्ड लोन का लगभग 75% हिस्सा सिर्फ पांच दक्षिणी राज्यों-तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और केरल-के खातों में है। मार्च 2026 तक इन पांच राज्यों का कुल गोल्ड लोन आउटस्टैंडिंग 13.94 लाख करोड़ रुपए था।
यदि हम तालिका पर नज़र डालें, तो भारत के गोल्ड लोन मार्केट का ढांचा कुछ इस तरह दिखाई देता है:
दक्षिण भारत की इस बढ़त का कारण वहां की गहरी सांस्कृतिक विरासत है। दक्षिण में सोने को केवल लॉकर में बंद रखने के बजाय एक लिक्विड एसेट (तरल संपत्ति) माना जाता है। वहां के बैंकों और एनबीएफसी (NBFCs) का जाल इतना घना है कि चाय की दुकान से लेकर बड़े कारोबारी तक हर कोई अपनी जरूरत के लिए सोने का इस्तेमाल बिना किसी सामाजिक झिझक के करता है।
राजस्थान में बदलती सोच और 41,700 करोड़ की कहानी
अब अपनी नज़रें दक्षिण के समुद्र तटों से हटाकर राजस्थान के रेतीले धोरों, अरावली की पहाड़ियों और जयपुर-जोधपुर के व्यस्त व्यापारिक बाज़ारों की तरफ मोड़ते हैं।
राजस्थान अपनी आन-बान-शान और पारंपरिक आभूषणों (जैसे थेवा कला, कुंदन और भारी रखड़ी-बोरला) के लिए दुनिया भर में मशहूर है। अब यह प्रदेश गोल्ड लोन के मामले में देश के टॉप 10 राज्यों में सम्मानजनक स्थान बना चुका है। मार्च 2026 तक राजस्थान का गोल्ड लोन आउटस्टैंडिंग 41,700 करोड़ रुपए दर्ज किया गया है।
राजस्थान में पारंपरिक रूप से सोने को बेचना या गिरवी रखना परिवार के संकट या साख घटने की निशानी माना जाता था। लोग स्थानीय साहूकारों या ब्याजखोरों के पास गुपचुप तरीके से जाते थे, जहां शोषण की पूरी गुंजाइश होती थी। लेकिन आज का नया राजस्थान इस रूढ़िवादिता को तोड़ चुका है।
राजस्थान में इस उछाल के पीछे के 4 बड़े कारण
बढ़ती सोने की कीमतें और हाई कोलेटरल वैल्यू (Higher Collateral Value): हाल के महीनों में सोने की अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कीमतों में लगातार तेजी आई है। चूंकि सोने के दाम बढ़े हैं, इसलिए बैंक में रखे जाने वाले उसी सोने के बदले ग्राहकों को अब अधिक लोन राशि (Higher Ticket Size) मिल रही है। राजस्थान के किसानों और छोटे व्यापारियों के लिए यह एक लॉटरी जैसा है।
एमएसएमई (MSME) और छोटे व्यापारियों की तत्कालिक जरूरतें: जयपुर के जोहरी बाज़ार से लेकर जोधपुर के हस्तशिल्प उद्योग और कोटा के कोचिंग हब तक, छोटे और मध्यम उद्यमियों को अक्सर वर्किंग कैपिटल यानी दैनिक नकदी की जरूरत होती है। व्यावसायिक लोन की लंबी कागजी कार्रवाई से बचने के लिए राजस्थान के व्यापारी अब अपने घरेलू सोने को बैंकों में रखकर कुछ ही घंटों में लोन ले रहे हैं।
कृषि लोन का पुनर्वर्गीकरण (Agricultural Reclassification): CRIF High Mark की रिपोर्ट के अनुसार एक बड़ा बदलाव कृषि से जुड़े गोल्ड लोन को रिटेल लोन श्रेणी में बदलने से भी आया है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में विशेषकर श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, अलवर और भरतपुर जैसे कृषि-प्रधान जिलों में किसान बुवाई के सीजन में खाद-बीज के लिए गोल्ड लोन को सबसे मुफीद माध्यम मान रहे हैं।
संगठित वित्तीय संस्थाओं का विस्तार: अब राजस्थान के गांवों और कस्बों में केवल स्थानीय बनिए या महाजन नहीं हैं। मुथूट फाइनेंस, मणप्पुरम, आईआईएफएल (IIFL) के साथ-साथ एसबीआई (SBI) और बैंक ऑफ बड़ौदा जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने ग्रामीण राजस्थान में अपनी गोल्ड लोन विंग खोल दी है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और लोगों का डर खत्म हुआ है।
जरा तुलना करके देखिए, देश के सबसे आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश (UP) का गोल्ड लोन आउटस्टैंडिंग 42,300 करोड़ रुपए है, जबकि उसकी तुलना में बेहद कम आबादी वाले राजस्थान का आउटस्टैंडिंग 41,700 करोड़ रुपए है। यह साफ दिखाता है कि राजस्थान के लोग उत्तर प्रदेश के मुकाबले अपने सोने का आर्थिक इस्तेमाल करने में कहीं अधिक आगे और जागरूक हैं।
पीएसयू वर्सेस एनबीएफसी - बाज़ार पर कब्ज़े की जंग
इस पूरी रिपोर्ट में एक और बड़ा मोड़ बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के बीच छिड़ी जंग का है। कुछ साल पहले तक गोल्ड लोन के बाज़ार पर मुथूट और मणप्पुरम जैसी एनबीएफसी का एकछत्र राज हुआ करता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।
पब्लिक सेक्टर बैंक (PSUs) का दबदबा: एक्सिस बैंक के को-लेंडिंग और गोल्ड लोन हेड मोहित जैन के अनुसार, लोन बांटने (Origination) के मामले में अभी भी सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक मात्रा (Volume) के हिसाब से हावी हैं। हालांकि, उनका शेयर Q4FY24 के 51.1% से घटकर Q4FY26 में 44.6% रह गया है। सरकारी बैंक आमतौर पर बड़े लोन (Higher Ticket Size) देना पसंद करते हैं।
एनबीएफसी (NBFCs) की आक्रामक वापसी: दूसरी ओर एनबीएफसी ने छोटे लोन (Lower Ticket Size) के बाज़ार पर कब्जा कर लिया है। मार्च 2026 की तिमाही (Q4FY26) में एनबीएफसी की बाजार हिस्सेदारी बढ़कर 31.6% हो गई, जो दो साल पहले महज 20.7% थी।
राजस्थान के संदर्भ में यह डेटा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य के दूरदराज के क्षेत्रों (जैसे बाड़मेर, जैसलमेर या जालोर) में जहां बैंकों की कागजी प्रक्रिया जटिल लगती है, वहां एनबीएफसी अपनी गोल्ड लोन एट होम (घर बैठे गोल्ड लोन) जैसी सुविधाओं के दम पर पैर पसार रही हैं।
होम लोन और पर्सनल लोन के बीच गोल्ड लोन की चमक
यह पूरी रिपोर्ट भारतीय उपभोक्ताओं की बदलती मानसिकता का एक आईना है। होम लोन का बाज़ार अभी भी 9.4% की स्थिर गति से बढ़ रहा है क्योंकि रियल एस्टेट की मांग मजबूत है। वहीं, पर्सनल लोन (असुरक्षित ऋण) में भी बैंकों की सख्त शर्तों के बावजूद 12.9% की वृद्धि देखी गई है।
लेकिन इन सबके बीच गोल्ड लोन का 50.4% की दर से बढ़ना यह साबित करता है कि भारतीय अब असुरक्षित कर्ज (जैसे क्रेडिट कार्ड या बिना गारंटी वाले पर्सनल लोन) के जाल में फंसने के बजाय अपने पास मौजूद सुरक्षित संपत्ति (सोने) का उपयोग करना बेहतर समझ रहे हैं।
एक और राहत की बात जो इस रिपोर्ट में सामने आई है, वह है एसेट क्वालिटी (Asset Quality) में सुधार। मार्च 2025 से मार्च 2026 के बीच, सभी प्रकार के लोन आकारों में शुरुआती स्तर की चूक या एनपीए (Early-stage Delinquency) में भारी गिरावट आई है।
इसका मतलब है कि लोग न केवल लोन ले रहे हैं, बल्कि समय पर अपना सोना छुड़ाने के लिए ब्याज और मूलधन भी चुका रहे हैं। राजस्थान के बारे में वैसे भी कहा जाता है कि यहाँ का समाज अपनी साख और अपने परिवार के सोने को वापस पाने के लिए बेहद ईमानदार रहता है।
क्या राजस्थान बन पाएगा अगला बड़ा हब?
आज भले ही दक्षिण भारत के पांच राज्य मिलकर देश का 75% गोल्ड लोन बाज़ार नियंत्रित करते हों, लेकिन उत्तर और पश्चिम भारत के राज्यों में संतृप्ति (Saturation) अभी बहुत दूर है। 41,700 करोड़ के आंकड़े के साथ राजस्थान ने यह साबित कर दिया है कि वह इस रेस में पीछे नहीं रहने वाला।
जैसे-जैसे राज्य में वित्तीय साक्षरता बढ़ रही है, लोग यह समझने लगे हैं कि लॉकर में बंद पड़ा सोना देश की जीडीपी और उनके खुद के व्यवसाय में कोई योगदान नहीं दे रहा है। सोने को काम पर लगाना ही असली समझदारी है।
आने वाले वर्षों में यदि राजस्थान सरकार और वित्तीय संस्थान मिलकर ग्रामीण इलाकों में सोने के मूल्यांकन (Valuation) और लोन की प्रक्रिया को और आसान बनाते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब मरुधरा की यह तिजोरी देश के सबसे बड़े आर्थिक इंजनों में से एक बनकर उभरेगी।
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