एच-1बी वीजा के भंवर में फंसी भारतीय जिंदगियां, टूट रहा हजारों टेक प्रोफेशनल्स का अमेरिकी सपना
Jinesh Jain | May 08, 2026, 18:44 IST
Photograph: (the sootr)
अमेरिका में हजारों भारतीय टेक प्रोफेशनल्स का सपना टूट रहा है। उनकी जिंदगी एच-1बी वीजा की अनिश्चितता में फंसी हुई है। आइए एक टेक कंपनी से छंटनी हुए एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की कहानी से इसे विस्तार से समझते हैं।
अमेरिका में टेक्सास के डलास-फोर्ट वर्थ (Dallas-Fort Worth) के एक मॉडर्न घर के लिविंग रूम में बैठा 30 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपने लैपटॉप को नहीं, बल्कि दीवार पर टंगे कैलेंडर को घूर रहा है। 9 अप्रैल वह तारीख थी, जब उसकी दुनिया अचानक ठहर गई थी। उस दिन उसकी कंपनी ने प्रोजेक्ट बंद होने का हवाला देकर उसे ले-ऑफ का लेटर थमा दिया।
अमेरिका में एच-1बी वीजा पर काम कर रहे हजारों भारतीयों के लिए यह सिर्फ नौकरी जाना नहीं है। यह एक डेथ वारंट की तरह है, जिसकी मियाद मात्र 60 दिन है। उसने भारी आवाज में कहा, मैं अब महीनों में नहीं सोचता। मैं बस यह गिनता हूं कि कितने दिन बचे हैं। 8 जून मेरी लक्ष्मण रेखा है। उस दिन तक अगर कोई नया नियोक्ता मेरा एच-1बी ट्रांसफर फाइल नहीं करता तो एक दशक की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी।
एच-1बी वीजा की बात करें तो यह अमेरिका द्वारा दिया जाने वाला एक गैर-आप्रवासी वीज़ा है। यह अमेरिकी कंपनियों को उन कुशल विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है जो किसी विशेष क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हैं। सरल शब्दों में, यदि अमेरिका की किसी कंपनी को ऐसे कर्मचारी की जरूरत है जिसके पास विशेष तकनीकी या सैद्धांतिक ज्ञान हो (जैसे इंजीनियर, कंप्यूटर प्रोग्रामर, वैज्ञानिक), तो वह कंपनी उस व्यक्ति के लिए एच-1बी वीजा स्पॉन्सर कर सकती है।
इस युवक की कहानी उस ग्रेट अमेरिकन ड्रीम का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे हर साल हजारों भारतीय छात्र देखते हैं। 2018 में एफ-1 वीजा पर आगमन, 2020 में कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स, और फिर 2021 में किस्मत के सहारे तीसरे लॉटरी ड्रॉ में एच-1बी हासिल करना। 2024 तक आते-आते उसकी जिंदगी में स्थायित्व आने लगा था।
उसने घर खरीदा, क्रेडिट स्कोर बनाया और ग्रीन कार्ड की पहली सीढ़ी यानी PERM प्रक्रिया शुरू की। लेकिन छंटनी ने सब कुछ 'रिसेट' कर दिया। अब अगर वह नई नौकरी पा भी लेता है, तो उसे ग्रीन कार्ड की कतार में फिर से सबसे पीछे खड़ा होना होगा। बरसों की प्रतीक्षा और कागजी कार्रवाई शून्य हो चुकी है।
'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के अनुसार यह केवल एक आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि एक गहरा मानसिक आघात भी है। हाल के सालों में भारतीय मूल के टेक पेशेवरों और छात्रों के बीच आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने पूरे समुदाय को हिला कर रख दिया है।
एक हालिया विश्लेषण (Rest of World) के अनुसार 2017 से 2025 के बीच भारतीय टेक प्रोफेशनल्स में आत्महत्या के 227 मामले दर्ज किए गए। इनमें कार्य का दबाव, वीजा की अनिश्चितता और वित्तीय तनाव प्रमुख कारण बनकर उभरे हैं।
इमिग्रेशन का यह दबाव लोगों को आइसोलेशन (अलगाव) की ओर धकेल रहा है। घर की ईएमआई (EMI), बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक प्रतिष्ठा का डर, यह सब मिलकर एक ऐसा दमघोंटू माहौल बना देते हैं, जहां व्यक्ति खुद को पिंजरे में बंद महसूस करता है।
डलास का वह घर, जो कभी उसकी सफलता का प्रतीक था, अब एक बोझ बन गया है। वह पूछता है, मैं घर बेचने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन क्या यह समय पर बिक पाएगा? अगर नहीं बिका, तो मैं भारत से इसकी किश्तें कैसे भरूंगा?
इमिग्रेशन वकील एसेल विलियम्स (Asel Williams) बताती हैं कि कई पेशेवर बी-2 विजिटर वीजा का सहारा लेकर समय बढ़ाने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह आसान नहीं है। अब USCIS (अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा) ऐसे आवेदनों की कड़ी जांच कर रही है। आपको यह साबित करना होता है कि आप सच में वापस जाना चाहते हैं-उसी देश से, जिसे आपने अपना घर बनाने की कोशिश की थी।
B-2 वीजा (B-2 Visitor Visa) अमेरिका द्वारा जारी किया जाने वाला एक गैर-आप्रवासी (Non-Immigrant) वीजा है, जो मुख्य रूप से पर्यटन, सुख-सुविधाओं या चिकित्सा उपचार के लिए दिया जाता है। मतलब कोई अमेरिका में कुछ महीनों के लिए घूमने जाता है तो उसे B-2 वीजा दिया जाता है। जब एच-1बी वीजा की मियाद खत्म हो जाती है तो भारतीय आईटी प्रोफेशनल इसी का यूज करते हैं ताकि लिया हुआ घर बेच सकें।
इसे लेने के लिए निम्न दस्तावेज चाहिए -
संकट केवल उन लोगों के लिए नहीं है जिनकी नौकरी गई है, बल्कि उन युवाओं के लिए भी है जो अभी करियर शुरू कर रहे हैं।
सर्जिकल रोबोटिक्स में काम करने वाली एक बायोमेडिकल इंजीनियर की व्यथा अलग है। उसके पास दो साल का STEM OPT (वर्क ऑथराइजेशन) है, लेकिन उसकी कंपनी ने एच-1बी स्पॉन्सर करने से मना कर दिया है। कंपनी का कहना है कि वे जटिल इमिग्रेशन प्रक्रिया में नहीं पड़ना चाहते।
इसी तरह ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने बताया कि आईबीएम (IBM) जैसी बड़ी कंपनी ने अंतिम समय में उसका ऑफर सिर्फ इसलिए वापस ले लिया क्योंकि उसे भविष्य में स्पॉन्सरशिप की जरूरत पड़ती। छात्र का कहना है, यह निराशाजनक है। कंपनियां आपकी योग्यता नहीं देखतीं, वे आपका वीजा स्टेटस देखती हैं। आप सालों मेहनत करते हैं और अंत में आप सिर्फ एक 'केस नंबर' बनकर रह जाते हैं।
न्यूयॉर्क की इमिग्रेशन अटॉर्नी विलियम्स के अनुसार, समय ही सबसे बड़ा खिलाड़ी है। अगर H-1B ट्रांसफर की 60 दिनों के भीतर फाइल हो जाए, तो आप पेंडिंग स्टेटस में भी काम जारी रख सकते हैं।
यदि ट्रांसफर याचिका खारिज हो जाती है, तो आपको तुरंत देश छोड़ना होगा। आजकल USCIS बहुत अधिक स्पष्टीकरण मांग रहा है, जिससे प्रक्रिया और लंबी और अनिश्चित हो गई है।
जैसे-जैसे 8 जून की तारीख करीब आ रही है, डलास का वह इंजीनियर इमिग्रेशन मंचों (Forums) पर दूसरों के अनुभवों में अपनी उम्मीदें तलाश रहा है। वह सामान पैक करे या नई नौकरी का जश्न मनाने की तैयारी करे?
यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि उस ब्रेन ड्रेन की है जो भारत से प्रतिभाएं तो ले जाता है, लेकिन उन्हें एक ऐसी प्रणाली में छोड़ देता है जहां उनकी पूरी जिंदगी एक सॉफ्टवेयर ग्लिच या एक क्लाइंट कॉन्ट्रैक्ट की मोहताज होती है।
अमेरिका का तकनीकी ढांचा (Healthcare, Finance, Cloud Systems) इन्हीं हाथों से बना है, लेकिन आज इन्हीं हाथों के पास अपना भविष्य सुरक्षित रखने के लिए कोई ठोस जमीन नहीं है।
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अमेरिका में एच-1बी वीजा पर काम कर रहे हजारों भारतीयों के लिए यह सिर्फ नौकरी जाना नहीं है। यह एक डेथ वारंट की तरह है, जिसकी मियाद मात्र 60 दिन है। उसने भारी आवाज में कहा, मैं अब महीनों में नहीं सोचता। मैं बस यह गिनता हूं कि कितने दिन बचे हैं। 8 जून मेरी लक्ष्मण रेखा है। उस दिन तक अगर कोई नया नियोक्ता मेरा एच-1बी ट्रांसफर फाइल नहीं करता तो एक दशक की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी।
एच-1बी वीजा की बात करें तो यह अमेरिका द्वारा दिया जाने वाला एक गैर-आप्रवासी वीज़ा है। यह अमेरिकी कंपनियों को उन कुशल विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है जो किसी विशेष क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हैं। सरल शब्दों में, यदि अमेरिका की किसी कंपनी को ऐसे कर्मचारी की जरूरत है जिसके पास विशेष तकनीकी या सैद्धांतिक ज्ञान हो (जैसे इंजीनियर, कंप्यूटर प्रोग्रामर, वैज्ञानिक), तो वह कंपनी उस व्यक्ति के लिए एच-1बी वीजा स्पॉन्सर कर सकती है।
एक दशक की ईंटें, एक पल का मलबा
उसने घर खरीदा, क्रेडिट स्कोर बनाया और ग्रीन कार्ड की पहली सीढ़ी यानी PERM प्रक्रिया शुरू की। लेकिन छंटनी ने सब कुछ 'रिसेट' कर दिया। अब अगर वह नई नौकरी पा भी लेता है, तो उसे ग्रीन कार्ड की कतार में फिर से सबसे पीछे खड़ा होना होगा। बरसों की प्रतीक्षा और कागजी कार्रवाई शून्य हो चुकी है।
अकेलेपन का बोझ
एक हालिया विश्लेषण (Rest of World) के अनुसार 2017 से 2025 के बीच भारतीय टेक प्रोफेशनल्स में आत्महत्या के 227 मामले दर्ज किए गए। इनमें कार्य का दबाव, वीजा की अनिश्चितता और वित्तीय तनाव प्रमुख कारण बनकर उभरे हैं।
इमिग्रेशन का यह दबाव लोगों को आइसोलेशन (अलगाव) की ओर धकेल रहा है। घर की ईएमआई (EMI), बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक प्रतिष्ठा का डर, यह सब मिलकर एक ऐसा दमघोंटू माहौल बना देते हैं, जहां व्यक्ति खुद को पिंजरे में बंद महसूस करता है।
रियल एस्टेट और इमिग्रेशन का घातक गठजोड़
इमिग्रेशन वकील एसेल विलियम्स (Asel Williams) बताती हैं कि कई पेशेवर बी-2 विजिटर वीजा का सहारा लेकर समय बढ़ाने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह आसान नहीं है। अब USCIS (अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा) ऐसे आवेदनों की कड़ी जांच कर रही है। आपको यह साबित करना होता है कि आप सच में वापस जाना चाहते हैं-उसी देश से, जिसे आपने अपना घर बनाने की कोशिश की थी।
बी-2 वीजा और उसके लिए आवश्यक साक्ष्य
इसे लेने के लिए निम्न दस्तावेज चाहिए -
- घर बेचने के सक्रिय प्रयास के दस्तावेज।
- अपने मूल देश (भारत) से मजबूत संबंधों के प्रमाण।
- पर्याप्त बैंक बैलेंस।
- भविष्य की योजनाएं जो अमेरिका से बाहर हों।
स्पॉन्सरशिप का डर भी है बड़ी बाधा
सर्जिकल रोबोटिक्स में काम करने वाली एक बायोमेडिकल इंजीनियर की व्यथा अलग है। उसके पास दो साल का STEM OPT (वर्क ऑथराइजेशन) है, लेकिन उसकी कंपनी ने एच-1बी स्पॉन्सर करने से मना कर दिया है। कंपनी का कहना है कि वे जटिल इमिग्रेशन प्रक्रिया में नहीं पड़ना चाहते।
इसी तरह ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने बताया कि आईबीएम (IBM) जैसी बड़ी कंपनी ने अंतिम समय में उसका ऑफर सिर्फ इसलिए वापस ले लिया क्योंकि उसे भविष्य में स्पॉन्सरशिप की जरूरत पड़ती। छात्र का कहना है, यह निराशाजनक है। कंपनियां आपकी योग्यता नहीं देखतीं, वे आपका वीजा स्टेटस देखती हैं। आप सालों मेहनत करते हैं और अंत में आप सिर्फ एक 'केस नंबर' बनकर रह जाते हैं।
क्या है समाधान?
यदि ट्रांसफर याचिका खारिज हो जाती है, तो आपको तुरंत देश छोड़ना होगा। आजकल USCIS बहुत अधिक स्पष्टीकरण मांग रहा है, जिससे प्रक्रिया और लंबी और अनिश्चित हो गई है।
एक अधूरी दास्तां
यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि उस ब्रेन ड्रेन की है जो भारत से प्रतिभाएं तो ले जाता है, लेकिन उन्हें एक ऐसी प्रणाली में छोड़ देता है जहां उनकी पूरी जिंदगी एक सॉफ्टवेयर ग्लिच या एक क्लाइंट कॉन्ट्रैक्ट की मोहताज होती है।
अमेरिका का तकनीकी ढांचा (Healthcare, Finance, Cloud Systems) इन्हीं हाथों से बना है, लेकिन आज इन्हीं हाथों के पास अपना भविष्य सुरक्षित रखने के लिए कोई ठोस जमीन नहीं है।
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