दक्षिण एशिया पर सूखे का साया? दगा दे सकता है इस बार मानसून, जानिए मौसम चक्र की पूरी कहानी
Jinesh Jain | May 06, 2026, 18:43 IST
Photograph: (the sootr)
मानसून इस बार दगा दे सकता है। मौसम विज्ञानियों का आकलन है कि दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में कम बारिश हो सकती है। आखिर ऐसी स्थिति क्यों बन रही है, आइए समझते हैं मौसम के पूरे चक्र को।
दक्षिण एशिया की जीवनरेखा माना जाने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून इस वर्ष करोड़ों किसानों और नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बन सकता है। मालदीव में दक्षिण एशियाई जलवायु आउटलुक फोरम (SASCOF-34) की आयोजित बैठक में जलवायु वैज्ञानिकों ने चिंताजनक सर्वसम्मति व्यक्त की है।
उनके अनुसार इस वर्ष मानसून के दौरान दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। यह स्थिति न केवल भारत के लिए, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे कृषि प्रधान देशों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।
SASCOF की रिपोर्ट के अनुसार जून से सितंबर तक चलने वाले मानसून सत्र में दक्षिण एशिया के मध्य भागों में भारी कमी देखी जा सकती है। वर्षा की कमी वाले क्षेत्र:
भारत: देश के अधिकांश हिस्सों विशेषकर मध्य और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी इसे लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का 92 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है।
पड़ोसी देश: पाकिस्तान, उत्तरी श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और पश्चिमी म्यांमार में भी बारिश की कमी (Rainfall Deficit) दर्ज की जा सकती है।
सामान्य या अधिक वर्षा वाले क्षेत्र: अफगानिस्तान, पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्से, म्यांमार के शेष क्षेत्र और दक्षिण-पूर्वी श्रीलंका में मानसून की स्थिति सामान्य या उससे बेहतर रह सकती है।
इस वर्ष के कमजोर मानसून के पीछे सबसे बड़ा कारण अल-नीनो (El Niño) की स्थिति पैदा होना है। यह एक ऐसी जलवायु घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इसका सीधा प्रभाव वैश्विक पवन प्रणालियों पर पड़ता है, जो अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून की ताकत को कम कर देता है।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अल-नीनो की स्थिति केवल मानसून के दौरान ही नहीं, बल्कि 2026 के अंत तक बनी रह सकती है। यह एक दुर्लभ और चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि यह लगातार दो कृषि चक्रों को प्रभावित कर सकती है। ऐतिहासिक रूप से जब भी अल-नीनो सक्रिय होता है, भारत और पड़ोसी देशों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है।
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि केवल अल-नीनो ही मानसून की दिशा तय नहीं करता। अन्य जलवायु चालक (Climate Drivers) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
इंडियन ओशन डाइपोल (IOD): खुशखबरी यह है कि जून-सितंबर के दौरान हिंद महासागर में पॉजिटिव फेज (Positive IOD) विकसित होने की संभावना है। सकारात्मक IOD अक्सर मानसून को मजबूती देता है और अल-नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है।
![Meet ENSO's neighbor, the Indian Ocean Dipole | NOAA Climate.gov]()
यूरेशियाई भूमि का तापन (Eurasian Land Heating): यूरेशियाई क्षेत्र में होने वाली गर्मी और बर्फबारी का पैटर्न भी मानसून की हवाओं की गति को प्रभावित करता है।
अटलांटिक जोनल मोड: उष्णकटिबंधीय अटलांटिक समुद्र की सतह का तापमान भी इस जटिल मौसमी समीकरण का हिस्सा है।
भले ही कुल वर्षा कम रहने का अनुमान है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाढ़ का खतरा टल गया है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब कम वर्षा वाले वर्षों में भी अत्यधिक वर्षा (Extreme Rainfall Events) की घटनाएं होती हैं।
यानी भले ही महीने भर बारिश न हो, लेकिन एक ही दिन में इतनी बारिश हो सकती है कि बाढ़ आ जाए। यह स्थिति फसलों के लिए सूखे से भी अधिक हानिकारक हो सकती है।
खाद्य सुरक्षा: दक्षिण एशिया की 60% से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। कम बारिश से धान, मक्का और गन्ने जैसी फसलों की पैदावार घट सकती है।
जल संकट: कम वर्षा से जलाशयों (Reservoirs) का स्तर गिर सकता है, जिससे पीने के पानी और पनबिजली (Hydro-power) उत्पादन में समस्या आएगी।
महंगाई: कृषि उत्पादन कम होने से खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती होगी।
यह फोरम नौ दक्षिण एशियाई देशों का एक संयुक्त संगठन है। इसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, मालदीव, म्यांमार, श्रीलंका और अफगानिस्तान आते हैं।
फोरम में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO), जापान मौसम विज्ञान एजेंसी, कोरियाई मौसम प्रशासन और यूके मेट ऑफिस जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हैं।
यह फोरम क्षेत्र के लिए एक सर्वसम्मत मौसम विवरण जारी करने का काम करता है ताकि आपदा प्रबंधन और कृषि योजनाओं को बेहतर बनाया जा सके।
![cb39221e-90b]()
अभी
अमेरिकी विज्ञान एजेंसी NOAA (नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन) ने भी हाल ही में यह घोषणा की थी कि कई महीनों से सक्रिय 'ला नीना' का प्रभाव आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गया है। प्रशांत महासागर अब एक तटस्थ (Neutral) स्थिति में है। लेकिन यह शांति तूफान से पहले की खामोशी हो सकती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2026 के अंत तक बेहद शक्तिशाली 'सुपर अल नीनो' विकसित हो सकता है, जो दुनिया भर में मौसम के चक्र को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त करने की क्षमता रखता है।
इसे सरल भाषा में समझना हो तो इसे प्रशांत महासागर का बुखार और ठिठुरन कहा जा सकता है। यह ENSO (एल नीनो दक्षिणी दोलन) नामक एक प्राकृतिक चक्र के दो विपरीत चरण हैं।
अल नीनो (The Boy Child): स्पेनिश में इसका अर्थ है 'बाल यीशु'। 1600 के दशक में पेरू के मछुआरों ने देखा कि दिसंबर (क्रिसमस के आसपास) में समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। जब उष्णकटिबंधीय पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है तो इसे अल नीनो कहा जाता है।
ला नीना (The Girl Child): यह अल नीनो का ठीक उल्टा है। इसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से कहीं अधिक ठंडा हो जाता है।
![No El Nino expected this year - Civilsdaily]()
सामान्य परिस्थितियों में हवाएं (Trade Winds) पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं, जो गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं।
अल नीनो में: ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। गर्म पानी वापस अमेरिका के तटों की ओर लौटने लगता है।
ला नीना में: ये हवाऐ इतनी शक्तिशाली हो जाती हैं कि वे गर्म पानी को और ज्यादा पश्चिम में धकेल देती हैं, जिससे गहराई से ठंडा पानी सतह पर आ जाता है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब अल नीनो आता है, धरती का पारा चढ़ जाता है। वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) तो इसका कारण था ही, लेकिन अल नीनो ने इसमें आग में घी का काम किया।
अल नीनो के दौरान समुद्र की सतह से भारी मात्रा में ऊष्मा वायुमंडल में निकलती है, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है। वहीं, ला नीना के दौरान धरती थोड़ी ठंडी महसूस होती है, लेकिन यह केवल अल्पकालिक राहत होती है।
ये घटनाएं केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहतीं। इनके प्रभाव वैश्विक हैं:
अतिवृष्टि और बाढ़ (अमेरिका और मैक्सिको)
अल नीनो के दौरान, जेट स्ट्रीम का मार्ग बदल जाता है, जिससे दक्षिणी अमेरिका और मैक्सिको की खाड़ी में भारी वर्षा और विनाशकारी बाढ़ आने की संभावना बढ़ जाती है।
सूखा और अकाल (एशिया और ऑस्ट्रेलिया)
भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए अल नीनो किसी अभिशाप से कम नहीं है। यह मानसून को कमजोर कर देता है, जिससे फसलों की बर्बादी और जल संकट पैदा होता है। इसके विपरीत, ला नीना इन क्षेत्रों में प्रचुर वर्षा लाता है।
अल नीनो: प्रशांत महासागर में तूफानों की संख्या बढ़ती है, लेकिन अटलांटिक महासागर (अमेरिका का पूर्वी तट) में चक्रवात कम हो जाते हैं।
ला नीना: अटलांटिक में खतरनाक हरिकेन (Hurricanes) आने की संभावना बढ़ जाती है।
प्राकृतिक आपदाओं के अलावा इसके आर्थिक प्रभाव भी गहरे हैं। पेरू और दक्षिण अमेरिका के तटों पर जब ठंडा पानी ऊपर नहीं आ पाता, तो मछलियों को पोषक तत्व नहीं मिलते। इससे सैल्मन और स्क्विड जैसी प्रजातियां कम हो जाती हैं, जिससे मत्स्य उद्योग को अरबों का नुकसान होता है।
अल नीनो के कारण दक्षिण पूर्व एशिया के जंगलों में आग (Forest Fires) लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं, जिससे वायुमंडल में भारी मात्रा में CO2 उत्सर्जित होती है।
सूखे और बाढ़ के कारण गेहूं, चावल और गन्ने जैसी फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ती है।
NOAA के शुरुआती संकेत डराने वाले हैं। यदि 2026 में आने वाला अल नीनो वाकई 'सुपर' श्रेणी का होता है, तो हम निम्नलिखित देख सकते हैं:
रिकॉर्ड तोड़ समुद्री गर्मी (Marine Heatwaves)।
कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) का बड़े पैमाने पर सफेद होना (Bleaching)।
वैश्विक जीडीपी में गिरावट, जैसा कि पिछले शक्तिशाली अल नीनो के दौरान देखा गया था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इंसान ने इस प्राकृतिक चक्र को और खतरनाक बना दिया है? IPCC (संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संस्था) की रिपोर्ट के अनुसार 1950 के बाद से इन घटनाओं की तीव्रता बढ़ी है।
हालांकि, वैज्ञानिक अभी भी यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि जलवायु परिवर्तन ही इसका एकमात्र कारण है, क्योंकि 1400 के दशक के रिकॉर्ड भी ऐसी तीव्रता दर्शाते हैं।
फिर भी, अधिकांश मॉडल चेतावनी दे रहे हैं कि जैसे-जैसे धरती गर्म होगी, अल नीनो और ला नीना के बीच का उतार-चढ़ाव और अधिक उग्र होता जाएगा।
SASCOF की रिपोर्ट दक्षिण एशियाई देशों के लिए एक चेतावनी है। विशेषज्ञों का कहना है कि कम बारिश के पूर्वानुमान के बीच सरकारों को जल प्रबंधन, सूखा-रोधी फसलों के वितरण और आपदा राहत प्रणालियों को अभी से मजबूत करने की आवश्यकता है। आने वाले महीने यह तय करेंगे कि विज्ञान और सरकार की जुगलबंदी इस संभावित संकट से कितनी प्रभावी ढंग से निपट पाती है।
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उनके अनुसार इस वर्ष मानसून के दौरान दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। यह स्थिति न केवल भारत के लिए, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे कृषि प्रधान देशों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।
कहां बरसेगा पानी और कहां रहेगी कमी?
भारत: देश के अधिकांश हिस्सों विशेषकर मध्य और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी इसे लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का 92 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है।
पड़ोसी देश: पाकिस्तान, उत्तरी श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और पश्चिमी म्यांमार में भी बारिश की कमी (Rainfall Deficit) दर्ज की जा सकती है।
सामान्य या अधिक वर्षा वाले क्षेत्र: अफगानिस्तान, पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्से, म्यांमार के शेष क्षेत्र और दक्षिण-पूर्वी श्रीलंका में मानसून की स्थिति सामान्य या उससे बेहतर रह सकती है।
अल-नीनो (El Niño): मानसून का सबसे बड़ा दुश्मन
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अल-नीनो की स्थिति केवल मानसून के दौरान ही नहीं, बल्कि 2026 के अंत तक बनी रह सकती है। यह एक दुर्लभ और चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि यह लगातार दो कृषि चक्रों को प्रभावित कर सकती है। ऐतिहासिक रूप से जब भी अल-नीनो सक्रिय होता है, भारत और पड़ोसी देशों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है।
मानसून को प्रभावित करने वाले अन्य कारक
इंडियन ओशन डाइपोल (IOD): खुशखबरी यह है कि जून-सितंबर के दौरान हिंद महासागर में पॉजिटिव फेज (Positive IOD) विकसित होने की संभावना है। सकारात्मक IOD अक्सर मानसून को मजबूती देता है और अल-नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है।
Meet ENSO's neighbor, the Indian Ocean Dipole | NOAA Climate.gov
यूरेशियाई भूमि का तापन (Eurasian Land Heating): यूरेशियाई क्षेत्र में होने वाली गर्मी और बर्फबारी का पैटर्न भी मानसून की हवाओं की गति को प्रभावित करता है।
अटलांटिक जोनल मोड: उष्णकटिबंधीय अटलांटिक समुद्र की सतह का तापमान भी इस जटिल मौसमी समीकरण का हिस्सा है।
पानी का तनाव और बाढ़ का विरोधाभास
यानी भले ही महीने भर बारिश न हो, लेकिन एक ही दिन में इतनी बारिश हो सकती है कि बाढ़ आ जाए। यह स्थिति फसलों के लिए सूखे से भी अधिक हानिकारक हो सकती है।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
जल संकट: कम वर्षा से जलाशयों (Reservoirs) का स्तर गिर सकता है, जिससे पीने के पानी और पनबिजली (Hydro-power) उत्पादन में समस्या आएगी।
महंगाई: कृषि उत्पादन कम होने से खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती होगी।
ChatGPT Image May 6, 2026, 06_57_45 PM
क्या है SASCOF?
फोरम में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO), जापान मौसम विज्ञान एजेंसी, कोरियाई मौसम प्रशासन और यूके मेट ऑफिस जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हैं।
यह फोरम क्षेत्र के लिए एक सर्वसम्मत मौसम विवरण जारी करने का काम करता है ताकि आपदा प्रबंधन और कृषि योजनाओं को बेहतर बनाया जा सके।
cb39221e-90b
अभी ला नीना का प्रभाव खत्म
आखिर क्या हैं अल नीनो और ला नीना?
अल नीनो (The Boy Child): स्पेनिश में इसका अर्थ है 'बाल यीशु'। 1600 के दशक में पेरू के मछुआरों ने देखा कि दिसंबर (क्रिसमस के आसपास) में समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। जब उष्णकटिबंधीय पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है तो इसे अल नीनो कहा जाता है।
ला नीना (The Girl Child): यह अल नीनो का ठीक उल्टा है। इसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से कहीं अधिक ठंडा हो जाता है।
No El Nino expected this year - Civilsdaily
हवाओं का खेल और समुद्र की हलचल
अल नीनो में: ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। गर्म पानी वापस अमेरिका के तटों की ओर लौटने लगता है।
ला नीना में: ये हवाऐ इतनी शक्तिशाली हो जाती हैं कि वे गर्म पानी को और ज्यादा पश्चिम में धकेल देती हैं, जिससे गहराई से ठंडा पानी सतह पर आ जाता है।
2024 की गर्मी और भविष्य की चेतावनी
अल नीनो के दौरान समुद्र की सतह से भारी मात्रा में ऊष्मा वायुमंडल में निकलती है, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है। वहीं, ला नीना के दौरान धरती थोड़ी ठंडी महसूस होती है, लेकिन यह केवल अल्पकालिक राहत होती है।
दुनिया पर इसका क्या असर होगा?
अतिवृष्टि और बाढ़ (अमेरिका और मैक्सिको)
अल नीनो के दौरान, जेट स्ट्रीम का मार्ग बदल जाता है, जिससे दक्षिणी अमेरिका और मैक्सिको की खाड़ी में भारी वर्षा और विनाशकारी बाढ़ आने की संभावना बढ़ जाती है।
सूखा और अकाल (एशिया और ऑस्ट्रेलिया)
भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए अल नीनो किसी अभिशाप से कम नहीं है। यह मानसून को कमजोर कर देता है, जिससे फसलों की बर्बादी और जल संकट पैदा होता है। इसके विपरीत, ला नीना इन क्षेत्रों में प्रचुर वर्षा लाता है।
तूफानों का बदलता रास्ता
ला नीना: अटलांटिक में खतरनाक हरिकेन (Hurricanes) आने की संभावना बढ़ जाती है।
अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर चोट
अल नीनो के कारण दक्षिण पूर्व एशिया के जंगलों में आग (Forest Fires) लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं, जिससे वायुमंडल में भारी मात्रा में CO2 उत्सर्जित होती है।
सूखे और बाढ़ के कारण गेहूं, चावल और गन्ने जैसी फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ती है।
'सुपर अल नीनो' 2026: क्या हम तैयार हैं?
रिकॉर्ड तोड़ समुद्री गर्मी (Marine Heatwaves)।
कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) का बड़े पैमाने पर सफेद होना (Bleaching)।
वैश्विक जीडीपी में गिरावट, जैसा कि पिछले शक्तिशाली अल नीनो के दौरान देखा गया था।
जलवायु परिवर्तन का रहस्यमय हाथ
हालांकि, वैज्ञानिक अभी भी यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि जलवायु परिवर्तन ही इसका एकमात्र कारण है, क्योंकि 1400 के दशक के रिकॉर्ड भी ऐसी तीव्रता दर्शाते हैं।
फिर भी, अधिकांश मॉडल चेतावनी दे रहे हैं कि जैसे-जैसे धरती गर्म होगी, अल नीनो और ला नीना के बीच का उतार-चढ़ाव और अधिक उग्र होता जाएगा।
तैयारी का समय
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